बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

वेतन में लैंगिक भेदभाव



आज  महिलाएं रोजगार के हर  क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, वे हर उस क्षेत्र में कदम रख रही हैं, जहां पर अभी तक पुरुष का आधिपत्य था। कई  बाधाओं को पारकर वे आगे बढ़ रही हैं, और वे निरंतर ही अपनी पहचान को मुकम्मल करती हुई  चल रही हैं। इस  समय सोशल मीडिया पर महिलाओं की उपलब्धियों का बखान करते हुए तमाम पेज और ग्रुप हैं, जिनमें न केवल उपलब्धियों की बातें बल्कि महिलाओं के संघर्षों के भी किस्से हैं।

भारत में एक महिलाओं का एक बड़ा तबका कामकाजी है। आज के दौर में महिलाएं शिक्षा, पत्रकारिता, क़ानून, चिकित्सा या इंजीनियरिंग, वकालत आदि के साथ साथ राजनीति, पुलिस और सेना जैसे क्षेत्रों में भी अपनी सेवाएं प्रदान कर रही हैं।

बदलता दौर अगर हम देखें तो महिला सशक्तिकरण के लिए जाना जाएगा। पर इतने जगमगाते चित्र के बावजूद कहीं कुछ धुंधला सा है क्या? कहीं कुछ अँधेरा सा है? आखिर वह अंधेरा या धुंधलापन क्या है? कभी कभी महिलाएं कुंठित हो जाती हैं, और उन्हें एक दायरे में सीमित कर दिया जाता है? महिलाएं इस समय दोहरे मोर्चे पर लड़ रही हैं।  पहले महिलाओं को केवल शायद बच्चे पैदा करने की मशीन माना जाता था, जबकि अब इस आधुनिक युग में महिलाएं न केवल बच्चे पैदा करने बल्कि मनचाहा पैसा घर लाने की भी मशीन हो गयी हैं।  ऐसे में कई महिलाएं एक विकल्प चुनने के लिए विवश हो जाती हैं, और वह विकल्प होता है, उनके कैरियर को बलिदान करने का।
आज के युग में कई महिलाएं मां बनने के बाद नौकरी छोड़ देती हैं। एक सर्वे के मुताबिक़ लगभग 40% महिलाएं अपने बच्चों के लिए यह कदम उठाती हैं। क्या यह भी दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि ऑफिस और घर की दोहरी जिम्मेदारी निभाने के कारण वह अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करती है और इस खिलवाड़ में उसका साथ देता है समाज। क्योंकि वह अपेक्षा और उम्मीदों का एक ऐसा बोझ महिलाओं के कन्धों पर लाद देता है कि वह न चाहते हुए भी एक लाइफस्टाइलडिसऑर्डर का शिकार हो जाती हैं। एसोचैम के एक सर्वे के अनुसार लगभग 78प्रतिशत महिलाएं किसी न किसी लाइफस्टाइल डिसआर्डर का शिकार हैं। आज युवा महिलाओं में दिल की बीमारी का खतरा बढ़ रहा है।
वे घर और कैरियर में इतना बंट गयी हैं कि अपने बच्चों को होने वाली छोटी बीमारी के लिए भी खुद के कैरियर को दोषी ठहरा देती हैं। और वे अपने बच्चों और परिवार को समय न दिए जाने के अपराधबोध से पीड़ित होने के कारण जो भी समय मिलता है उसमें अपने बच्चों को ज्यादा से ज्यादा समय देने का प्रयास करती हैं। क्योंकि उन्हें लगता है कि यदि वे घरेलू जिम्मेदारी न सही से उठा सकीं तो समाज की नज़र में दोषी साबित हो जाएँगी। वैसे भी हमारा समाज इतना उदार नहीं है कि महिलाओं के द्वारा की गयी गलती को क्षमा कर सके।
इतनी समस्याओं एवं पूर्वाग्रहों का सामना करती हुई महिलाओं को क्या पुरुषों के समान वेतन प्राप्त होता है? जबकि वर्क प्रोफाइल और काम तो वे पुरुषों के समान ही करती हैं। असंगठित क्षेत्र तो महिला श्रमिकों को दोयम दर्जे का व्यवहार मजदूरी के स्तर पर झेलना होता है। उन्हें पुरुषों से कम दैनिक मजदूरी मिलती है। इसी बारे में एक ईंट उठाने वाली एक महिला रिंकू (बदला हुआ नाम) से बात की तो, उसने कहा “दीदी, हम औरतों को मर्दों जितना पैसा नहीं मिलता है, चाहे उनसे ज्यादा ईंटें उठा लें या उनसे बढ़िया मसाला मिला दें। पर क्या करें, अपनी देहरी छोड़कर आ गए हैं, चार पैसा कमान खातिर, तो का करें, अब जो है सो है। अब चाहे हम पंद्रह या बीस ईंटें लेकर चढ़ें। आपसे क्या कहें, बाथरूम जाने तक पर ठेकेदार चीखता है।”
आज हर छोटे बड़े शहर में तमाम बड़ी छोटी इमारतें बन रही हैं उनमें गावों से रोज़ ही कई परिवार रोजगार के लालच में आ रहे हैं, उन परिवारों की महिलाएं भी पुरुषों के साथ मिलकर बेलदारी का काम कर रही हैं, पर उन्हें अपने पति या पुरुष  सदस्य की तुलना में काफी कम मजदूरी मिलती है। इस भेदभाव के खिलाफ शायद ही कोई आवाज़ कहीं सुनाई देती हो।
और अगर आपको यह लगता है कि यह भेदभाव केवल असंगठित क्षेत्रों या मजदूरों में है तो ऐसे में हालिया प्रकाशित कई रिपोर्ट इस भ्रम से पर्दा उठाने के लिए पर्याप्त हैं। कुछ दिन पूर्व मोंस्टर की सेलेरी इंडेक्स के अनुसार भारत में पुरुषों और महिलाओं के बीच वेतन में 27% का अंतर है।

इस रिपोर्ट के अनुसार सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में स्त्री-पुरुष कर्मचारियों के वेतन में अंतर सबसे अधिक 34 प्रतिशत है। सूचना प्रौद्योगिक सेवाओं में पुरुष 360.9 रुपए प्रति घंटा कमाते हैं जबकि महिलाओं की आय 239.6 रुपए प्रति घंटा है। अलग अलग क्षेत्रों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि स्त्री-पुरुष वेतन में सबसे ज्यादा अंतर विनिर्माण क्षेत्र में (34.9 प्रतिशत) है और सबसे कम बैंक, फाइनेंस और बीमा क्षेत्र में हैं। परिवहन, लाजिस्टिक्स, संचार में यह फासला समान रूप से 17.7 प्रतिशत है। (स्रोत इन्डियन एक्सप्रेस)

इस रिपोर्ट के अनुसार पुरुषों का औसत सकल वेतन 288.68 रुपए प्रति घंटा है जबकि महिलाओं की आय 207.85 रुपए प्रति घंटा तक है। इस रिपोर्ट के लिए 8 विभिन्न क्षेत्रों- सूचना प्रोद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा, समाज सेवा के क्षेत्र, शिक्षा, शोध, वित्तीय सेवाओं, बैंकिंग, बीमा, परिवहन, लॉजिस्टिक्स, संचार, निर्माण और तकनीकी कंसल्टेंसी, विनिर्माण, व्यापारिक गतिविधियों एवं कानूनी व मार्केट कंसल्टेंसी में अध्ययन किया गया।

इस विश्लेषण के अनुसार “इस वेतन में अंतर में मुख्य कारण महिलाओं के स्थान पर पुरुष कर्मियों की नियुक्ति को प्राथमिकता देना है, सुपरवाइज़री स्तर पर पुरुषों को प्राथमिकता देना, और बच्चे होने पर महिलाओं का कैरियर से ब्रेक लेना और अन्य सामाजिक सांस्कृतिक कारक हैं।”

मॉन्स्टर इंडिया के एमडी संजय मोदी ने कहा है कि अधिकतर देशों में वेतन में अंतर अब मुख्य मुद्दा बन गया है, कि एक ही काम करने वाले में पुरुष और महिला के आधार पर पारिश्रमिक में कमी नहीं होनी चाहिए। पर भारत में अभी हालात संतोषजनक नहीं है, जबकि देश विकास की तरफ राह तक रहा है”

हालांकि उनके अनुसार कुछ आलोचक इस रिपोर्ट में बताए गए अंतर को महिलाओं के द्वारा शिक्षा, पेशे या परिवार के स्तर पर चुने गए विकल्पों का परिणाम कहते हैं, पर यह सत्य से कोसों दूर है।

मोदी के अनुसार सभी के लिए समान अवसरों का निर्माण करना इस समय की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है जो भारतीय नौकरी के बाज़ार में मुख्य योगदानकर्ता है।

ऐसा नहीं है कि मोंस्टर की यह रिपोर्ट ही इस भेदभाव की तरफ इशारा करती है। वर्ल्‍ड इकोनॉमिक फोरम (डब्‍ल्‍यूईएफ) की ग्‍लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2015 के अनुसार भारत 145 देशों की सूची में 139वें पायदान पर है। 2014 की रिपोर्ट में 142 देशों की सूची में भारत का स्‍थान 134 था। इस रिपोर्ट में आर्थिक समानता पर भारत का स्‍कोर 0.383 है, जहां शून्य असमानता को प्रदर्शित करता है और 1 उचित समानता का परिचायक है। इसमें यह भी कहा गया है कि भारत में आर्थिक भागीदारी और अवसर इंडेक्‍स में गिरावट की वजह समान काम के लिए वेतन में असमानता और महिला कर्मियों की कम प्रतिभागिता है। महिला और पुरुषों की अनुमानित आय का अनुपात भारत में 0.25 है, इसका मतलब यह हुआ कि पुरुषों की तुलना में महिला कर्मी को एक चौथाई वेतन मिलता है।

डब्‍ल्‍यूईएफ रिपोर्ट के मुताबिक,  हालांकि भारत की कुल रैंकिंग में आर्थिक, राजनीतिक, शिक्षा और स्वास्थ्य  श्रेणी के औसत प्रदर्शन के आधार पर सुधार हुआ है। 145 देशों की सूची में भारत 108वें पायदान पर है। 2014 में 142 देशों की सूची में भारत का स्‍थान 114 था। इस सूची में आइसलैंड सबसे ऊपर है। इसके बाद नॉर्वे और फि‍नलैंड का नंबर आता है। अमेरिका का स्‍थान 28 और चीन का 91 है। सीरिया, पाकिस्‍तान और यमन इस सूची के अंतिम तीन देश हैं।

पिछले दिनों मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीटयूट की रिपोर्ट के अनुसार अगर देश में लैंगिक भेदभाव को ख़त्म करने पर जोर दिया जाए तो देश की जीडीपी में 2025 तक 46 लाख करोड़ रुपयों को जोड़ा जा असकता है। अगर लैंगिक भेदभाव को समाप्त कर दिया जाए तो भारत की सालाना जीडीपी प्रगति 1.4 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि लैंगिक समानता को बढ़ावा देने से दुनियाभर में आर्थिक संतुलन में वृद्धि होगी।

इसी बीच वूमेन इन दि वर्ल्‍ड सम्मेलन के दौरान समूह चर्चा में इस बात का खुलासा हुआ है अपना व्‍हाइट कॉलर जॉब छोड़ने वाली महिलाओं की संख्‍या 48 फीसदी है, जो एशिया के औसत 21 फीसदी से बहुत अधिक है।

कहा जा सकता है कि तमाम रिपोर्ट भारतीय नौकरी के बाज़ार में लैंगिक भेदभाव की तरफ इशारा करती हैं, यह उन पूर्वाग्रहों को भी प्रदर्शित करती हैं जिनके अनुसार महिलाएं दोयम दर्जे की कामगार होती हैं। महिलाओं को परिवार व कई सामाजिक पहलुओं को भी देखना होता है। यह भी सत्य है कि बच्चा होने पर महिलाओं को नौकरी से ब्रेक चाहिए ही होता है, चाहे वह किसी भी पद पर क्यों न हो। अभी महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय के द्वारा मातृत्व अवकाश की अवधि में वृद्धि की गयी है, जो एक सकारात्मक पहल है। पर कई कोर्पोरेट इससे बचने के लिए ऐसी महिलाओं को नौकरी देते हैं, जिन्हें मातृत्व अवकाश की आवश्यकता ही न हो।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हालांकि नौकरी और अर्थव्यवस्था का आसमान बहुत ही सुहाना है पर महिलाओं के लिए बेहतर होने में और समय लगेगा।


सोनाली मिश्रा

sonalitranslators@gmail.com

चिड़िया की उड़ान

अभी अभी विधान सभा के चुनाव हुए थे। रिकोर्डतोड़ मतों से जीते थी अम्बर जी! जीत का स्वाद कितना सुन्दर होता है! वह जब सारे अवरोध तोड़कर झोली में गिरती है तो मानो दुनिया भर के चाँद सितारे अपने साथ ले आती है! कितने पापड़ बेले थे अम्बर जी ने! बहुत मेहनत की थी। इतनी मेहनत के बाद तो जीत होनी ही थी। इस जीत के साथ साथ न जाने उनके फौलोवर (वैसे पहले उन्हें चमचा कहा जाता था, मगर ये डिजिटल युग है, सोशल मीडिया का युग है तो फौलोवर ही ठीक!) के भी भाग्य खुल गए थे।
“उहं! न जाने कितने लोग अम्बर जी की फोटो दिखा दिखा कर लोगों को बरगला रहे हैं!” राधिका जी, मन ही मन सोचती आ रही थीं।
“अब देखो तो मैं कितनी नज़दीक हूँ, अम्बर जी के! मगर मज़ाल जो मैंने कभी कुछ दिखाया हो!” राधिका जी अपने मन में कहती हुई जा रही थीं। अम्बर जी के साथ नज़दीकी का बहुत गुमान था राधिका जी को! अब देखो न! क्या थीं राधिका जी? कुछ भी तो नहीं! और आज? आज देखो! मजाल कि मोहल्ले का किसी भी काम का ठेका उनके घर पर चढ़ावे के बिना किसी को मिल जाए? उहं! देखा कितनी नज़दीकी है? अम्बर जी ने उन्हें बहुत अधिकार दे रखे हैं, अम्बर जी ही तो थे जिन्होंने उनकी मुलाक़ात इत्ते बड़े बड़े ठेकेदारों से कराई थी! वरना! ये मुए मोटे मोटे ठेकेदार तो दूसरी पार्टी के ही लोगों के घर पर अपना माथा टिकाते थे!
मगर अम्बर जी की अक्ल की तो दाद देनी होगी! उनके महिला मंडल के साथ मिलकर ठेकेदारों की घटिया सामग्री का इतना ढोल पीटा और उसके मोहल्ले की औरतें भी कम थोड़े ही नहीं हैं! खूब चप्पल दिखा दिखा कर आन्दोलन और प्रदर्शन किए, न जाने कितने मटके फोड़े! ये मुआ ठेकेदार, मानने के लिए ही तैयार नहीं था! बताइए न! इन ठेकेदारों से पैसे निकलवाने के लिए न जाने कितनी बार रास्ता रोका था!
“पर आज अम्बर जी फोन क्यों नहीं उठा रहे?” राधिका ने सरला जी से पूछा!
सरला जी इस पार्टी की महिला मंडल की बहुत पुरानी कार्यकर्ता थीं! सरला जी के दिखाए गए रास्ते पर चलकर ही महिलामंडल इस आकार में आ पाया था। सरला जी ने इस पार्टी के लिए बहुत त्याग किए थे। सरला देवी ने ही राधिका को मटके फोड़ना, चूड़ी देना, हंगामा करना सिखाया था। सुनते थे कि सरला जी अम्बर जी की बहुत नज़दीक थीं। इतनी नज़दीक कि किस्से आज भी महिला मंडल की कार्यकर्ताओं की जुबां पर हैं। मगर पुरानी कार्यकर्ताओं की, नई कार्यकर्ताओं के लिए तो अम्बर जी देवता हैं। वे तो उनके हर कार्यक्रम में चली ही जातीं हैं! और महिला मंडल का कोई भी कार्यक्रम तो अम्बर जी के बिना हो ही नहीं सकता था!
अम्बर जी ने चुन चुन कर ही महिला मंडल की टीम बनाई थी। सरला जी से लेकर राधिका जी! सारे हीरे उन्होंने ही चुने थे! कभी कभी तो उन्हें भी यकीन नहीं होता था कि ये सब उन्हीं की माया थी। खैर माया का क्या कहना, वो तो हर नेता की व्यक्तिगत बात होती है! उसका मायामंडल होता ही इतना आकर्षक है कि स्त्रियाँ खींची आती हैं! अब आभामंडल का क्या किया जाए! और उस पर महिला मंडल! उसके तो कहने ही क्या? उसकी ख़ूबसूरती तो अब दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की पर थी!
इस सोशल मीडिया ने हर राजनीतिक दल के महिला मंडल को ग्लैमरस बना दिया था। पहले जहां महिला कार्यकर्ताओं को अपनी प्रतिभा दिखाने में कुछ बरस लगते थे और कई बार तो बेचारी राजनीतिक गगन  पर ध्रुव तारा बनने की आस लिए किसी घर की क्रांति बन जाया करती थीं, वहीं अब सोशल मीडिया ने एक क्लिक से ही सारी महिला कार्यकर्ताओं को एक कतार में ला दिया था। अब प्रतिभा निखर कर आ रही थी। नेताओं के सामने प्रतिभा हर तरह से खिलने लगी थी, और उस पर अम्बर जी जैसे नेता!
भगवान उन्हें हर बुरी बला से बचाए!” राधिका जी ने पच्चीसवीं बार उनका नंबर नॉट रीचेबल पाकर अपने साईं बाबा से कहा।
“अरे, राधिका, तुमने सही सुना था न! अम्बर जी यहीं से होकर गुजरेंगे न!” सरला जी ने धूप से बचते हुए पेड़ के नीचे बैठते हुए कहा
“जी दीदी! बात तो पार्टी अध्यक्ष से यही हुई थी कि आज हमारे विजयी विधायक हमारे महिला मंडल की कार्यकर्ताओं का शुक्रिया अदा करने आएँगे! दीदी, देखिये न! हमारी महिलाओं ने कितनी मेहनत की थी! अपने अपने बच्चों को न जाने कहाँ कहाँ छोड़कर अम्बर जी के लिए प्रचार करने गईं थीं! आज तो मीडिया का कवरेज मिलना ही चाहिए!” राधिका ने निराश होते हुए कहा
“कह तो तुम ठीक रही हो!” सरला जी ने हामी भरते हुए कहा
“दीदी, न जाने कितनों ने अपने घर की चायपत्ती पूरी की पूरी एक ही दिन में अपने मोहल्ले के लोगों की खातिर में खर्च कर दी, तो कईयों ने तो नेट डेटा पैक भी अपने पतियों से मार खा खा कर भरवाया था!” राधिका जी का गला रुंध गया! न जाने अपनी कार्यकर्ताओं की कुर्बानी की बात थी या अम्बर जी की बेरुखी! न जाने क्यों उनका फोन नॉट रीचेबल आ रहा था! आखिर ये कैसे हो सकता था? उन्होंने तो अपना प्राइवेट नंबर भी दे रखा था! न जाने प्राइवेट नंबर पर कितना प्राइवेट  टॉक हुआ था उन लोगों का! गला रुंध रहा था, उन प्राइवेट टॉक को याद कर कर के!
“कसम से राधिका जी! बहुत स्त्रियाँ आँखों के सामने से गुजरी होंगी! मगर कसम पार्टी की, जो कभी आपके जैसी कोई कर्मठ और दिल जान से फिदा कार्यकर्ता देखी हो!” अम्बर जी ने एक दिन उससे अपने कार्यालय में कहा था।
सच, जादू ही तो था! जादू था अम्बर जी के शब्दों में! घुल घुल रहा था! उसे तो यकीन नहीं हो रहा था कि वह इतने महान नेता के सामने बैठी है! और वह भी उनके प्राइवेट रूम में! उसकी आँखों में बहुत कुछ आ जा रहा था!
राधिका जी क्या थीं? कुछ भी तो नहीं! किट्टी पार्टी से बोर हो गयी थी, और उनके घर में खर्च इतने थे कि किट्टी पार्टी वे एफोर्ड नहीं कर पा रही थीं! ऐसे में मन बहलाने के लिए एक दिन पार्क में महिला मंडल की बैठक में वह चली गयी थीं। तब उन्हें नहीं पता था कि उनकी ज़िन्दगी इस तरह से नया मोड़ लेगी! मगर ऐसा हो गया था! उस दिन पार्टी की बैठक में ही अम्बर जी को देखा था! और सभी महिला कार्यकर्ताओं की निगाहों में अथाह श्रद्धा भाव तैर रहा था! बहुत मुद्दे थे किसी के बच्चे का इलाज होना था, किसी के बच्चे का एडमिशन होना था!
“जी, आप! आपकी कोई समस्या!” अम्बर जी ने पूछा था
“जी नहीं! जी नहीं! वो तो मैं उधर बैठी थी, तो ऐसे ही इधर आ गयी!” वह अचकचा गयी थी! अम्बर ही सफेद कुरते पजामे में बहुत सुन्दर लग रहे थे! सुदर्शन पुरुष जैसे शब्द तो मानो अम्बर जी जैसे पुरुषों के लिए ही रचे गए होंगे! कसम साईं बाबा की! उस दिन तो जैसे अम्बर जी ने उसके मन की चोरी पकड़ ली थी! उन्होंने एक गहरी निगाह उन पर डाली और कहा
“तो आ जाइए इधर, पार्टी को आप जैसे ही युवाओं की आवश्यकता है! अब हम जैसे लोगों के बाद आप ही को तो आना है! सरला जी, इन्हें भी लीजिए न अपनी टीम में! और इनकी आवश्यकता अनुसार काम दीजिए, बाद में हम इन्हें बताएंगे कि आखिर इनकी क्या जिम्मेदारियां होंगी!”
और अक्क बक्क सी राधिका राजनीति की सफेद चादर पर पैर रखकर आ गयी थी! हालांकि उसके पति ने बहुत मना किया था, मगर वह उस दिन उस सुदर्शन पुरुष का कहना टाल नहीं पाई थी। और अखबारों में वह अम्बर जी के बारे में पढ़ती रहती ही थी, तो इत्ता बड़ा आदमी उससे ये कहे कि आ जाइए, तो वे कैसे टालतीं!
आखिर, पंद्रह दिनों के बाद ही वे उनके ऑफिस में थीं! और न केवल ऑफिस में बल्कि उनके निजी कक्ष में!
“हम्म! तो आप आ ही गईं!” अम्बर जी ने पूछा था
“जी!” अपने भाग्य पर इतराते हुए राधिका ने कहा था
“तो क्या आपको लगता है कि आप क्या कर सकती हैं?” अम्बर जी ने उनकी आँखों में आँखें डालते हुए कहा
“जी सर, जो आप कहें!” राधिका जी ने आँखें नीची करते हुए कहा
“जी! वो तो मैं देखूंगा ही, कि आपको क्या जिम्मेदारी देनी है! तब तक आप सरला जी से काम समझिये!” उन्होंने राधिका जी से विदा लेते हुए कहा था
उस दिन वह एक जादू में भरी हुई आई थी! ओह! क्या नशा था! अम्बर जी! वही अम्बर जी, जिनके द्वारा किए जा रहे आंदोलनों पर अखबार फिदा रहता था, पत्रकार भी जिनके मित्र थे, पार्टी में तो कोई दुश्मन दिखता नहीं था और महिला मंडल तो उनके द्वारा ही बनाया गया था!
ऐसा जादूगर, ऐसा जादूगर राधिका से प्रभावित था और न केवल प्रभावित बल्कि अपने आप पार्टी में बुलाया था!
वह शाम राधिका जी के जीवन में अनूठी शाम थी, उनके मिडल क्लास वजूद को पहचान देने वाली शाम थी! वही उनके पति की साधारण कमाई में बंधे हुए खर्चों में भी गोलगप्पे खाने को भी अय्याशी समझने वाले साधारण जीवन की खास शाम थी! राधिका जी उछल उछल कर आज अपने साधारण  मिडल क्लास जीवन का जश्न मना रही थीं!
बहुत खास था उस शाम!
“मगर आज हुआ क्या है अम्बर जी को?” सरला जी ने उचक कर पूछा! अब उनकी महिला कार्यकर्ताओं के आने का समय होने लगा था! इक्का दुक्का आने लगी थीं! वे भी कार्यकर्ता आने लगी थीं जिन्हें सम्मानित किया जाना था! मंच तैयार था! बस अम्बर जी ही बचे थे! मगर उनका तो फोन ही नहीं लग रहा था! राधिका जी के जी में उनके प्राइवेट मेसेज मचल रहे थे!
“राधिका जी, आप मेरी ज़िन्दगी हैं! आप ने मुझे जो दिया, उससे मैं धन्य हुआ! राधिका जी!”
अपने मेसेज बॉक्स में पड़े हुए ये सभी प्राइवेट मेसेज उसे पगलाए दे रहे थे! जब तक मतगणना नहीं हुई थी, तब तक अम्बर जी के साथ उनके निजी कक्ष में निजी लम्हे संवारते हुए, उसके राजनीतिक कैरियर की योजना बना रहे थे!
“जैसे ही मैं चुनाव जीतूंगा, वैसे ही संगठन में आपको इस बार जिला स्तर पर बड़ा पद दिलवा दूंगा! आप देखिएगा, पहली बार जिला अध्यक्ष बनने का रिकोर्ड आपके ही नाम होगा!” अम्बर जी ने उन्हें अपनी बाहों का हार पहनाते हुए कहा था
राधिका जी, खुद को समर्पित करके खुद को बहुत ही सौभाग्यशाली समझती थीं! इत्ता बड़ा आदमी, उसे अपने साथ ये लम्हें बिताने का सौभाग्य दे, ये तो बिल्ली के भाग्य छींका फूटना ही हुआ न!
राधिका जी, उन प्राइवेट मेसेज और कक्ष में ही थीं अभी कि उन्हें फोन आया “क्षमा करें, अम्बर जी नहीं आ रहे हैं! आप प्लीज़ बुरा न मानियेगा, मगर पार्टी अध्यक्ष का अभी अभी फोन आया था!”
“मगर हुआ क्या है?” उन्होंने चौंकते हुए कहा! “ऐसा तो कुछ हुआ नहीं था”
“जी, अम्बर जी खुद ही आपसे बात करेंगे! रुकें!।।............. सुनिए राधिका जी, पार्टी अध्यक्ष के पास आपकी एक सीडी पहुँची है!” अम्बर जी ने सधे हुए शब्दों में फोन पर कहा
“सीडी?” राधिका जी की आवाज़ तेज हुई!
कमरे में बैठी हुई सभी महिलाऐं चौकस हो गईं
“सीडी? कौन सी सीडी? अम्बर जी!” राधिका जी को ऐसा लग रहा था कि उनके हाथों से सब कुछ फिसल गया था
“अरे आप घबराइये मत! सीडी तो पहुँची है, मगर किसी और को अभी कुछ पता नहीं है! हां, आप कुछ दिनों के लिए थोडा परदे के पीछे रहिये! सरला जी और मुक्ता जी को महिला मंडल सम्हालने दीजिए! एक बार जिला स्तर के संगठन के चुनाव हो जाने दीजिए! फिर आपको भी कहीं न कहीं सेट करा ही देंगे और हां, इन सबका आपके घर आने वाले ठेकेदार के रुपयों पर कोई असर नहीं पड़ेगा! बस जरा देखिएगा, अपना नाम वगैर न आए, मेरा तो कुछ नहीं होगा, सीडी में आप ही स्पष्ट दिख रही हैं! और सुनिए, प्लीज़, कुछ दिनों तक फोन न करियेगा!” अम्बर जी की सधे और  सटीक शब्दों में फोन पर आवाज़ आ रही थी, और इधर राधिका जी  को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें? ये क्या हुआ! कहाँ वे जिला अध्यक्ष के पद के सपने देख रही थीं और कहाँ ये? अब क्या होगा? उन्होंने तो सबसे कह रखा था!
सरला जी ने एकदम से उन्हें गिरने से रोका!
“सीडी थी क्या?” सरला जी ने निरपेक्ष नजर से देखा।
“पिछले महीने मुक्ता की भी सीडी आई थी, चिंता न करो! अपना काम नहीं रुकता है! बस कुछ दिनों के बाद सब कुछ ठीक हो जाएगा! मगर हां, एक बात! भूल कर भी महिला मंडल छोड़कर मुख्य धारा में जाने की कोशिश न करना! नहीं तो ऐसे ही सीडी आती रहेंगी!”
उधर अम्बर जी के कार्यालय में जिला अध्यक्ष, नगर अध्यक्ष आदि में जाति आदि का गणित बैठाते हुए, बात हो रही थीं, “एक और उम्मीदवार कम हुआ! अब कितने बचे!”
ठहाकों की आवाज़ उस निजी कक्ष तक पहुँच रही थी।

“जिला अध्यक्ष बनना था! हा हा हा!”

बुधवार, 7 सितंबर 2016

तालमेल



उसके रुकने और मेरे आने में
बहुत ही कम फासला था,
उसके पैरों में थी,
महत्वाकांक्षा की अठखेलियाँ,
और मेरे पास मेरे पंखों के बादल,
रुई के फाहे को सिरहाने रखकर
मैं अपने बादल बनाती थी,
और वह
अपनी नींद में भी
अपनी इच्छाओं का उन्मुक्त
मर्दन करता था.
आज,
सोचती हूं,
कैसे फैल गए बादल,
मेरे पंखों और
उसकी इच्छाओं में छितर गए,
न ही मेरे पंख पसर पाए,
न ही उसकी
बाजुओं में सिमट सके,
सच,
कभी कभी तालमेल का छाता

कितना जरूरी होता है.

शनिवार, 27 अगस्त 2016

समरसता की विक्ट्री

विजय के नगाड़े सिरमिया देवी को बेसुध किए जा रहे थे, ये उन्हीं की जीत के नगाड़े थे। वह अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी से रिकॉर्ड मतों से आगे चल रही थीं। मतगणना बस खत्म होने वाली थी। अब किसी भी फेरबदल की उम्मीद नहीं थी। रजिया चुनाव कार्यालय में इन नगाड़ों की अगुआई कर रही थी। सिरमिया देवी का जी आज की विजय से रो रहा था। उन्होंने कभी इस तरह जीत नहीं चाही थी, हमेशा पार्टी में रहकर पार्टी के टिकट पर जीत उनका सपना था। जिस पार्टी को उन्होंने ब्लॉक स्तर से उठाकर जिला और फिर प्रदेश स्तर पर अपने खून-पसीने से सींचा था, आज उसी के उम्मीदवार को और वह भी उनकी पार्टी के सर्वेसर्वा की बहू को हराकर, वह जीत रही थीं। उनकी आंखों में आंसू थे। वह खुद नहीं समझ पा रही थीं, यह आंसू खुशी के हैं, दुख के या विजय के? अभी छह महीने पहले तक सब ठीक था।
युवावस्था से अधेड़ावस्था तक पूरे बीस साल उन्होंने पार्टी को समर्पित किए थे। मंडल और कमंडल की राजनीति के समय में सामाजिक न्याय को लेकर बनी इस पार्टी में पहले जाति और धर्म के आधार पर कुछ नहीं था। सिरमिया देवी का मन अपने समाज के लिए, विशेषकर औरतों के लिए बहुत कुछ करने का था। ऐसे में युवा सिरमिया देवी ने सामाजिक समरसता का नारा बुलंद करने वाली इस पार्टी का दामन थाम लिया था।
पैंतालीस बरस की सिरमिया देवी इस पार्टी के महिला मंडल की जिला प्रमुख थीं। सीधे पल्ले की साड़ी पहने, ठेठ देसी अंदाज में जिंदा रहने वाली सिरमिया देवी का अपने जिले में बोलबाला था। राशन न मिलने से लेकर पति की मारपीट की बात भी औरतें सिरमिया देवी से करने आ जाती थीं। वह महिलाओं की आत्मीय थीं। हर गली-ब्लॉक में उनकी महिला टीम थी।
'सिरमिया देवी जिंदाबाद, जिंदाबाद।’ नारे उनके कानों में पड़ने लगे। उन्होंने अपने कान बंद कर लिए। उनके सामने पच्चीस बरस की सिरमिया खड़ी हो गई जिसे नेता साहब ने पार्टी में जगह दी थी। सिरमिया देवी को लगा नेता साहब उनके सामने खड़े हो कर कटाक्ष कर रहे हैं, 'अब तो अच्छा लग रहा होगा। उसी झंडे को हरा देना जिसके नीचे राजनीति सीखी, पहचान मिली। वाह सिरमिया।’
'मैंने क्या गलत किया। मैं भी तो उसूलों की खातिर ही पार्टी में आई थी। पार्टी छोड़ कर मैं तो कहीं नहीं गई न। आप ही लोगों ने भगा दिया था। आप ही लोगों ने आवाज बुलंद की थी परिवार के खिलाफ। यही कहा था न आपने कि अब जनता का राज होगा, लोकतंत्र आएगा। लोकतंत्र रटते-रटते कब आपकी पार्टी आपके परिवार की पार्टी बन गई आपको खुद भी पता नहीं चल पाया।’ विचारों में खोई सिरमिया छह महीने पहले पार्टी कार्यालय पहुंच गई। उनके परिचितों का मानना था कि उन्हें चुनाव लड़ना चाहिए। वह उस क्षेत्र विशेष की समस्या से वाकिफ हैं। उन्हें पता है कौन सी सड़क कब बनी और राशन की कालाबाजारी कौन करता है। बीस साल से समस्याओं से लड़ते-लड़ते यह सब कैसे उनके दैनिक रूटीन का हिस्सा बन गया उन्हें पता नहीं चला। पर टिकट लेना इतना आसान था क्या?
'तो क्या सोचा है आपने?’ प्रदेश प्रमुख ने पूछा था।
'हमने?’
'जी आपने। यानी नई जिम्मेदारी के बारे में। महिला मंडल की प्रांत प्रमुख की जिम्मेदारी के बारे में?’ सिरमिया सुन कर बस चुप लगा गई। तब उनकी सहयोगी रजिया बोली, 'देखिए सर...।’ 'रजिया जी, आप चुप रहें, यह हमारे और सिरमिया देवी के बीच की बात है।’
'भाई साहब आप तो जानते ही हैं, मैंने कितनी मेहनत की पार्टी को उस इलाके में खड़ा किया है। लोग मुझे वहां की नेता के रूप में देखना चाहते हैं,’ सिरमिया देवी ने संकेत में अपनी बात रखी। 'सिरमिया पार्टी के कुछ नियम हैं और हमें उन पर चलना है,’ उन्होंने भी पांसा फेंका।
'पार्टी के नियम क्या हैं। आम कार्यकर्ता काम करे, डंडे खाए और जब ब्लॉक, शहर और महानगर स्तर पर पार्टी की साख बन जाए तो एसी में बैठे लोग बाहर आएं और परिवारों के सदस्यों में टिकट बंट जाएं। मेहनत करने वाला कार्यकर्ता कहां जाएगा?’
'देखो, सिरमिया हम जानते हैं आपने मेहनत की है इसलिए आपको पद दे रहे हैं। चलिए, महिला मंडल की प्रांत प्रमुख के बजाय आपको महिला मंडल का प्रांत अध्यक्ष बना देते हैं। आप काम करती रहिए। यह पद इसलिए तो है,’ उनकी कुटिलता चरम पर थी।
'वाह भाई साहब क्या पद दिया है। अगर पद देना ही चाहते हैं तो जिला अध्यक्ष बना दीजिए,’ सिमरिया देवी ने भी तय किया था कि आज बिना साफ जवाब सुने नहीं जाएंगी। 'जिला अध्यक्ष!’ वह ऐसे चौंके जैसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो। 'एक औरत जिला अध्यक्ष। पूरा संगठन तबाह हो जाएगा। एक औरत को जिला अध्यक्ष पद पर बैठाने का मतलब जानती हो? हमसे राजनीति करने के बजाय महिला मंडल में राज करो,’ उनके चेहरे का काइंयापन पूरे कमरे में फैल गया। सिरमिया देवी ने भी अपनी सारी कड़वाहट समेटी और दो टूक बोल दिया, 'आप सही कहते हैं, चुनाव तो चांदी का चम्मच लिए पैदा हुए लोग लड़ते हैं। पर हम भी आपको दिखा देंगे गरीबों की ताकत।’
'ठीक है, फिर ऐसा ही सही। राजनीति में बीस बरस गुजारने के बाद तुम्हें पता ही होगा बड़े नेता विरोधियों को कैसे मारते हैं। नेता जी का काटा पानी नहीं मांगता,’ प्रांत प्रमुख के साथी व्यंग्य से बोले।
'तब ठीक है इस बार आपकी बहूरानी और हमारी दीदी के बीच मुकाबला हो ही जाने दीजिए। देखते हैं, जनता कार्यकर्ता को देखना चाहती है या महारानी को। हमें अपने बीच से नेता चाहिए राजघराने से नहीं,’ रजिया ने दबंगई से फैसला ही सुना दिया। उस दिन की भारी बहस के बाद, अनुशासनहीनता के आरोप में सिरमिया देवी को पार्टी से निकाल दिया गया। कमरे में बैठने वाले नहीं जानते थे कि उस इलाके में उनकी पकड़ थी। उस क्षेत्र की वह चहेती थीं। धरने-प्रदर्शन के अलावा कार्यकर्ताओं पर उनकी बहुत पकड़ थी। छोटे से छोटे कार्यकर्ता को वह नाम से जानती थीं। अपने क्षेत्र की हर समस्या पर उनकी नजर रहती थी। उसका हल कैसे निकलेगा यह भी वह जानती थीं। मगर फिर चुनाव लड़ना वह भी बागी हो कर। उनकी हिम्मत जवाब दे रही थी। मगर कदम बढ़ा कर वह पीछे नहीं खींच सकती थीं। अब जीत हो या हार। अपनी जद्दोजहद पर काबू पा कर आखिर उन्होंने निर्दलीय पर्चा भर दिया। सफर आसान नहीं था। पर दिन प्रतिदिन कार्यकर्ताओं के उत्साह ने उन्हें नई ऊर्जा दी। उनके साथ वह सब लोग जुट गए जिनकी मदद कभी न कभी सिरमिया देवी ने की थी। रजिया ने नेता साहब की बहू और सिरमिया देवी के बीच अपना बनाम बाहरी मुद्दा बना दिया। रजिया ने नारा गढ़ा, ‘जिले की दीदी, विधानसभा इस बार जरूर जाएगी।’ रजिया का यह नारा खूब चल पड़ा। सिरमिया देवी को सच्ची मदद मिली उन लोगों से जिसके बीच उन्होंने अपने पंद्रह-बीस बरस बिताए थे। कभी किसी की झोपड़ी टूटी तो सिरमिया हाजिर, कभी किसी की दुकान पर अवैध वसूली तो सिरमिया हाजिर। सिरमिया का न परिवार था, न कोई आगे पीछे। एक मां थी जो उनके भाई के साथ रहती थी। उन पर दर्जनों पुलिस केस थे, जो उनके संघर्ष की कहानी कहते थे। सीधे पल्ले की साड़ी और पैरों में हवाई चप्पल उनकी पहचान बन गई थी।
'दीदी बाहर तो चलिए। देखिए कितने लोग जमा हैं। सब आपको देखना चाहते हैं,’ रजिया लगभग चिल्लाती हुई भीतर आई। सिरमिया देवी बाहर निकलीं तो कार्यकर्ताओं का हुजूम था। लोगों ने उन्हें फूलमालाओं से लाद दिया। उनके समर्थन में गगनभेदी नारे लग रहे थे। शोर था, नेता साहब की बहू को दीदी ने हरा दिया। रजिया कह रही थी, 'दीदी देखो राजतंत्र हार गया, लोकतंत्र जीत गया।’

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

किसी परछाई की भी देह साबुत नहीं थी!

आपने मठ बनाए हमने कुछ नहीं कहाआपने कहा स्त्रियाँ ऐसी होती हैंहमने मान लियाआपने कहा कविता,कहानीछंद ये होते हैंहमने मान लियाहम आपके मठ में ही रहने लगीं। हमारी दुनिया आपके मठ के ही इर्दगिर्द हो गयी। हमने गर्व से अपनी इस पहचान को सदियों तक जिया। हम कहीं मठ में ही एक कोने में रहने लगीं। उस कोने में हम अपनी कविता रचतींकहानी रचतींऔर फिर मिटा देतीं। उन्हें फलक तक ही न आने देतीआपकी आँखों तक नहीं आ सकी तो फलक क्या चीज़ है। फिर एक समय आपको भनक हुईअरेइस कोने में तो कुछ शब्द और कुछ अक्षर बिखरे हैं। आपके मठ को लगा अरे ये तो गज़ब हो गयाये कौन आ गयाआपने कहा "कोने में बहुत गंदगी हैसाफ करोहमने साफ किया और उस कोने में कभी फटा कालीन या जूट की बोरी ही बिछा ली। पर फिर भी आपको तसल्ली न हुई। आप उस कोने से सब कुछ बार बार मिटाने की जिद्द में रहे। पर आपने कुछ बरसों के बाद हमें अहसान से भर कर किराए पर एक कमरा दे दियातमाम शर्तें मुकम्मल करते हुए। पर हमने उस कमरे में अपने रंग भर दिएअपने अक्षरअपने शब्द और अपने अहसास भर दिएआप उस कमरे में आ आ कर झांकते रहे

"कहीं कोई आ तो नहीं गयानहीं साहबअपनी उधारी का हमें अहसास हैकिराए पर लिए गए कमरे में केवल मेहमान आते हैंजो पानी पीते हैं और चले जाते हैंहम किसी को यहाँ नहीं टिकाते। साहबआपने किराए का जो कमरा दिया हैउस पर चार चाँद लग जातेजो सांस लेने को थोड़ी सी हमारी साँसें भी वापस कर देते। क्या होता अगर पहचान को भी हमें दे देते? पर आपने नहीं दिया? पहचान दी तो उसमें से आधा कतरा अपने पास रखकर हमें केवल अपने मन के अनुसार ही पहचान दी। जितनी भी टुकड़ों में पहचान दी। कभी आम्रपाली के रूप में गणिका बनाया तो बाद में आते आते गणिका से उठाकर बाज़ार में बैठा दिया और आज उसी बाज़ार से छिपकर जाते हैं और हमें केवल धन से ही ढाक दिया। ज़रा एक बार उन नोटों के नीचे भी देखते कि देह से परे दिल भी कहीं देह के किसी कोने में होता है जो जीवित होता है, जिसमें स्पंदन होता है, जिसकी धड़कनें हर रोज़ आते ग्राहकों में अपना साथी खोजती हैं, पर तुमने तो ऐसा कोई भी अधिकार नहीं दिया। बस नोटों के नीचे हमारे स्त्रीत्व को दबा दिया, जिसकी राख शायद हमारी चिता के साथ मिलकर ही कहीं विसर्जित की जाती होगी। हमें जब आपने मठ के कोने से निकाल कर बाहर जाने की स्वतंत्रता भी दी तो वह भी कितने टुकड़ों में दी है, क्या आपने सोचा है कभी? नहीं आपके पास समय कहाँ है? आपके पास तो यह देखने का समय है कि हम कितने बजे घर से निकले? क्या हमने आपके मठ के प्रति अपने सभी उत्तरदायित्व का निर्वाह किया है? क्या हमारी आँखों ने वह आकाश देख लिया है, जो आपने अभी तक छिपा कर रखा हुआ था? अरे हमने वह वर्जित फल खाने की इच्छा तो नहीं कर दी? वाह, आपने क्या हमें स्वतंत्रता दी? लाज न आई आपको? झूला झूलने पर भी आपको लगा कि अरे हमारे परिधान क्या हों? कहीं से पैर तो नहीं दिख रहे? कहीं से वर्जित अंग तो नहीं दिख रहे? क्या हमारी रेखाएं हथेलियों में नई कहानी तो नहीं गढ़ रही? आप कितनी चिंताओं से घिर गए? आपने खुद को प्रगतिशील दिखाने के लिए स्वयं के परिधान तो बदल लिए? 

आपने अपने मठ का भी पूरा रूप रंग बदल लिया। उसे एकदम पूरी तरह आधुनिक बना दिया। पर आपने एक काम नहीं किया, वह जो कालीन हमने अपने कोने में बिछा रखा था, उसे आपने कुछ नहीं किया, उस पर तो एक उपेक्षात्मक द्रष्टि डाली और जैसे आपने एक मौन अट्टाहास किया और सोचा “अरे तुम भी चलोगी, इस नए संसार में मेरे साथ” पर आप एक बात भूल गए, हमारे कोने ने वह अट्टाहस सुन लिया, उसने वह चुनौती स्वीकार कर ली। कोने ने एक नई अंगड़ाई ली और बहुत ही करीने से अपना कालीन उठा लिया और वह अब रसोई से बढ़कर बाहर चलने लगा। आपने चाहा तो बहुत कालीन को थाम लें, कालीन को पकड़ लें, पर उसने तो अब आकाश देख लिया था जो आप उससे छिपाना चाहते थे। और वह अब व्यग्र था हमें उस पर बैठा कर उसी आकाश में ले जाने के लिए। उसने मेरा आंचल पकड़ा और एक ओर से आपने आँचल पकड़ा पर हाय रे, मैं तो उड़ चली अपना आंचल आपके पास ही छोड कर। देखा अपना आकाश और खो गयी, धीरे धीरे आपने हमारे जिन सपनों को दबा रखा था वह भी खिलने लगे एकदम सूरजमुखी की तरह। 

पीले अमलतास की तरह हर तरफ फैल गए। पर उस कालीन ने कहा कि हम अभी उन सपनों को तब तक पोटली में बांधे रहें जब तक कि सपनो को पूरा करने की रणनीति न बन जाए। हम हँसे- “अरे सपने और रणनीति, अरे पागल हो क्या तुम? लग रहा है कोने की धुल तुम्हारे दिमाग पर फैल गयी है” कालीन ने कहा “नहीं, मैं पागल नहीं हुआ हूँ, तुम जिसे अपना आँचल देकर आई हो,  उसके पास तुम्हारी एक पीढ़ी पुरानी है, जो उसी मठ के अनुसार ही सोचती है। तुम जाओगी अपने सपने लेकर, कोई नहीं पहचानेगा। और  व्यर्थ तुम्हें उपहास का केंद्र बनना होगा।” हम सोच में डूब गए “तो क्या करें” कालीन बोला “अभी सपनों को कहीं दबा लो दिल के किसी कोने में” हमने बात मान ली। नीचे जाकर देखा तो जैसे कालीन ने सही कहा था। हां हम उसी की तो छाया थे, हमारे जैसी वहां पर कई थी, कुछ इस पीढी की, कुछ कलियों सी खिलने के लिए आतुर, कुछ एकदम पका हुआ फूल। पर सभी के मुख पर एक ही प्रश्न- कहाँ ले गया था ये कालीन, देखा नहीं हम सबने इसे कैसे अपने अपने मठों में कोने में कितने आराम से बिछा रखा है। क्या हुआ जो उस कालीन के नीचे हमारे सपने दबे हैं? क्या हुआ जो हमारी आकांक्षाओं को असमय ही यह कोना मार रहा है? अरे क्या हुआ हम सदेह ही मृत्यु का वरण रोज़ ही करती है? कम से कम मठ के कोने में हम सुरक्षित तो हैं? हमारे सिर  के ऊपर एक छत तो है! ये सभी प्रश्न उस पर कई और कोनों में सिमटी हुई परछाइयों से आने लगे!  किसी परछाई की भी देह साबुत नहीं थी। हर देह पर कितनी दरारें थी, हम देख भी नहीं पा रहे थे।

फिर उन चेहरों में आपने ही संशय भरा, आपने ही हमारी उड़ान को गिद्ध की तरह दबोचने के लिए हमारा ही प्रयोग किया। वाह, वाह आपने हमें आपस में ही भिड़ा दिया? आप अपने मठ को सुरक्षित रखने के लिए हमारा प्रयोग किया आप ये भी भूल गए कि हम आपके मठ की प्रतिष्ठा को कभी चोट नहीं पहुंचाएंगेसदियों से ये हमारे ही खून पसीने से सिंचित हैकैसे हम उन्हें ठेस पहुंचाएंगीज़रा सोचिये तोहमने स्रष्टि के आरम्भ से ही इन्हें अपने कन्धों पर सम्हाला हैअब क्यों तोड़ेंगे इन्हें। आज भी नहीं तोड़ेंगेपर जरा हमें इंसान समझ कर हमारी साँसें वापस कर देते तो हमारे अक्षर भी हम में मिल कर खिल जाते। बाकी तो आपका मठ हमेशा सलामत रहेगाक्योंकि आने वाली पीढी के लिए हमने भी इसमें अपना समर्पण किया है। पर आपने कब हमारे समर्पण को समझा? आपने हमें आपस में लड़वाया! आपने कभी आर्थिक तो कभी मानसिक आधार पर हमें केवल कोने में समेटे रखा! जैसे ही हमारे कोने ने स्वतंत्रता का वर्जित फल खाया या ये कहें कि कुछ आपकी लापरवाही से तो शायद कुछ आपके वर्ग के कुछ लोगों की समझदारी के कारण हमारे कोने ने उसका स्वाद चख लिया, जो हमारे लिए वर्जित था! इससे आपको ठेस लगी, हां जाहिर है लगना स्वाभाविक है। हमारे उस कोने ने आपकी सत्ता को चुनौती दी। उसने कहा देखो मैं देखूंगा अपना आकाश, जो करना है कर लो। हम तो जाएंगे उस कोने में भी, हम तो जाएंगे वर्जित क्षेत्र में भी, जाओ क्या कर लोगे? आप कैसे कांप गए? और हमारी स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह लेकर आ गए। वाह साहब, आपने तो गज़ब किया। आपने एक रस्सी ली और उसे हमारी स्वतंत्रता के लिए प्रयोग करना चाहा। आपने हमारी स्वतंत्रता को केवल देह के आस पास ही समेट दिया। आपने हममे से ही एक ऐसा वर्ग खड़ा कर दिया जिसने देह की स्वतंत्रता को केवल यौन स्वतंत्रता का ही हिस्सा बना दिया। 

और फिर आपमें से एक संस्कारी वर्ग उपजा, एक कौमार्य का रक्षक वर्ग पैदा हुआ जिसने हमारे कंधे पर हाथ रखकर कहा “भय मत करो, मैं तुम्हारे कौमार्य की रक्षा करूंगा” पर हमें भय किससे था? हमें भय आपसे था। हमें भय अपनी स्वतंत्रता से नहीं था बल्कि आपकी छद्म रक्षा से था। हमारे कौमार्य पर लार टपकाते हुए हमारे कौमार्य के रक्षकों से हमें भय था। फिर आपने हमारे कोने को फिर से रक्षक बनकर उसी स्थान पर रखने का कार्य किया और इस बार तो आपका कार्य बहुत ही आसान था, आपके मठ में फिर कई कोने बन गए थे, आपने उसे अपने अनुसार समेट दिया। वाह वाह! आपके इस पौरुष को हमारा नमन। हम इधर अपने कोने को संवारने में और अपने स्थान को ही बनाए रखने व्यस्त  रहे और आपने उधर हम में से ही हमारे विरोधी तैयार कर दिए। जिन्होंने आपकी छाया तले हमारे ही विरुद्ध तलवारें उठा लीं और हमारे सपनों को छलनी कर दिया। और आपने क्या किया आप ताली बजाते रहे, उसी कोने में खड़े होकर जहाँ पर आपने हमें कभी बंद किया था। हम पाखंडों से लड़ते रहे और आपने हमें ही पाखण्ड बना दिया? हमारे सपनों को पाखण्ड बना दिया! आपने सोचा भी नहीं कि आप “फूट डालो और शासन करो” की नीति पर चलकर एक वर्ग पर शासन कर रहे हैं! क्षमा कीजिएगा, ये विवाह, संस्कार, समर्पण आदि की बात आप हमसे न कीजिएगा, याद कीजिये, विवाह से पूर्व एक बार बात करने पर आपने नाम पूछने से पहले यही पूछा था सदियों से कि हम पवित्र तो हैं न! आपने कभी मन से पवित्र होने की बात ही नहीं की। हमारे देह के उभार पवित्र हैं या नहीं? ये आपके लिए महत्वपूर्ण थे, हमारी योनि अनछुई ही थी न! ये आपके लिए महत्वपूर्ण था।

हमारे उरोज अनदेखे हैं हैं नहीं ये आपके लिए प्रश्न था? हमारा नाम क्या था? उससे क्या फर्क पड़ता था! फिर आप हमारे उन्नत उरोजों, अनछुई योनि को लेकर तृप्ति और अतृप्ति के एक ऐसे जगत में ले गए जहां पर एक ओर संतुष्टि की सांसें थी तो एक ओर असंतुष्टि की कुंठा। असंतुष्टि की पीड़ा और वह पीड़ा भी धीरे से उसी कोने का हिस्सा बन गयी। आपकी नाक से तो संतुष्टि के सितार की आवाज़ आती रही और जो उस कोने की कुंठा को और बढाती ही रही। जब सदियों की कुंठा के बाद तनिक आकाश दिखा तो उसीमें आपको हमारे कौमार्य के भंग होने की चिंता होने लगी? ये चिंता हमारे कौमार्य की नहीं थी, बल्कि ये चिंता थी, आपके अहम् की, आपके पौरुष की, यह चिंता थी जूठे होंठ की? जूठी योनि की! मन का समर्पण तो आपके लिए न तब महत्वपूर्ण था और न अब रहा था। अब तो आपने हमें पुन: संस्कार की बेड़ियों में बाँधने का प्रयास किया, पर इस बार आप चतुर निकले। कितनी ही चतुराई से आपने एक संस्कारी वर्ग खड़ा किया और उसने हमसे कहा “सुनो, सिंगार अपने रक्षक के लिए करो, सिंगार और पिटार करके जो बाहर निकलोगी, तो रक्षक ही भक्षक बन जाएगा, अपने रूप की रक्षा करो, उसे सहेजो” पर इस बार हमने पलट कर पूछ लिया “हम किसके लिए सहेजे? क्या हम खुद के लिए अपने रूप और कौमार्य को नहीं सहेज सकते?” अरे गुस्से में आपके संस्कार के नथुने फड़कने लगे? आपकी सत्ता भनक उठी! आपकी सदियों की धारणा भड़क गयी? आपने हमारा गला दबाना चाहा, पर कैसे दबाते? आपकी संतुष्टि तो केवल हमारी ही योनि की दास थी, अब आपने एक और चाल चली। आपने सोचा कि कोने को तो आकाश चाहिए तो क्यों न आकाश को ही अपने अनुसार बना लें। अब आप बाजारवाद के सितारे ले आए, देह से स्वतंत्रता का चाँद ले आए, और हमें वह चाँद दिखाया, देखो ये देह तुम्हारी है, तुम इसका कुछ भी करो, आज हमारे साथ या कल किसी और के साथ, क्या फर्क पड़ता है! आपने तो ये चाँद दिखाकर अपने लिए देह का समन्दर बना लिया और जब चाहें जिसके उभारों में खोने के लिए द्वार खोल लिए। बहुत ही शीघ्र एक वर्ग ऐसा भी आपने बना ही लिया न और अपने लिए कितनी सुविधाएं उपलब्ध करा लीं। फिर आप मूंछों पर ताव देते हुए आए और घर के एक कोने को लात मारी। हमारी प्रतिभा, हमारे सपनों को देह की ही परिधि में बाँधने का पाप आपने किया। आपके पास हमसे लड़वाने के लिए अब एक नहीं दो वर्ग थे। एक तो वह जो अपनी गुफा से बाहर आकर हमारे परिधानों पर आघात करता, प्रहार करता “अरे सारे झगड़े और सारे बलात्कार केवल इन्हीं छोटे कपड़ों के कारण होते हैं। अरे देखो कैसे समाज का माहौल इन लड़कियों के कारण बदल रहा है, हमारे संस्कारों की नदी प्रदूषित हो रही है” और हमें डसने लगते उस वर्ग के दंश। हमारी साँसें घुटने लगती। पर नहीं नहीं आपने तो अपने लिए एक और वर्ग तैयार कर रखा था जो बिकनी में आकर हमारे परिधानों पर तंज कसता। आपकी बांहों में समाते हुए हमें ऑर्थोडॉक्स कहता। और आप अपनी इस विजय पर मुस्काते। आपने हमसे लड़ने के लिए दो वर्ग बना दिए और स्वयं को शक्तिशाली कहते हैं? अरे आपसे भयभीत तो कोई भी नहीं है। आप हमसे भयभीत हैं, हमारी प्रतिभा से भयभीत हैं, हमारे सपनों से भयभीत हैं। और इस भय को आपने किस तरह से व्यक्त किया, वाह साहब बलिहारी आपकी। आपने फिर अपने ही वर्ग में बात करनी आरम्भ की “स्त्रियाँ सुनो, स्वार्थी हो गयी हैं। संस्कारी नहीं बची हैं। विवाह से पूर्व ही वे अपवित्र होने लगी हैं। ये अराजक हो गयी हैं, उन्मुक्त हो गई हैं, कुसंस्कारी हो गयी हैं, कुछ तो करना होगा।”

आपके साथियों ने हामी भरी, और एक लालच भरी द्रष्टि से आपके दाएं ओर में बैठे हुए वर्ग की ओर देखा और एक याचक की द्रष्टि से आपके बाएँ ओर बैठे वर्ग की ओर देखा। दाईं ओर वह था जो बिकनी में आपकी बाहोंमें हिलोरे लेता था तो बाईं ओर वह था जो संस्कारों की रक्षा करने के लिए था। और आप सब मिलकर किसे परास्त करने में लग गए, हमें। जो झुकने के लिए तैयार नहीं, अनुचित शर्तों को मानने के लिए तैयार नहीं। हम विमर्श के माध्यम से आपसे बात करना चाहती हैं तो आप हममें से कमजोर और उससे कमजोर वर्ग को छांट कर उन्हें हमारे विरुद्ध प्रयोग करते हैं। नहीं साहब अब तो ये नहीं चलेगा। अब तो आपको इस छद्म युद्ध को समाप्त करना ही होगा। आपको अपने मठ को सुरक्षित रखने के लिए छल बल का सहारा लेना बंद करना होगा। अब हमें अभिव्यक्ति की वास्तविक स्वतंत्रता चाहिए। हमें स्वतंत्रता चाहिए, पर हम परिवार से परे स्वतंत्रता नहीं चाहतीं। आप ने शायद समझा ही नहीं, हममें आत्मनिर्भरता है, पर हम प्रेम भी करते हैं और प्रेम देना भी चाहते हैं, पर केवल थोड़ी स्वतंत्रता के साथ, हम चाहते हैं आप हमारी सांसों को केवल सांस ही न समझें, आप हमारी साँसों को भावनाओं का स्पंदन समझें। हमारे देह के उभारों को केवल देह के उभार ही मात्र न समझें, उन्हें सदियों से चली आ रही कामनाओं का वह पाश समझें जिसके सम्मुख कुबेर का खजाना भी कुछ नहीं है। हमारे आलिंगन को प्रेम, स्नेह आदि सबका मिश्रित रूप समझें। हमारी स्वतन्त्रता से आपका अस्तित्व संवरेगा, पर आप को लगता है कि हमारी स्वतंत्रता से आपका अस्तित्व ही खतरे में आ जाएगा, और इसी भय के कारण आप हम पर तीन ओर से वार कर रहे हैं। 

देखिये, इस चक्कर में आपका मठ ढहा जा रहा है, आप अपने मठ की दीवारों की रक्षा करने के लिए हथियार लिए बैठे हैं और किससे ढह रहा है, हमसे? नहीं वह ढह रहा है आपसे, आपकी निराशा से, आपकी प्रतिहिंसा से, आपके इस भय से कि हमारी स्वतंत्रता से आप खतरे में आ जाएंगे। जरा अपनी नज़रें उठाकर हमें एक बार देखिये तो सही, एक बार विश्वास के साथ हमें देखिये तो सही। हां पहल तो हो रही है, कुछ कदम आपके वर्ग से आ रहे हैं। पर वे शायद अभी नाकाफी हैं। हमारा कोना तो आकाश पर अपनी मज़िलों को पाने के लिए उड़ चला है, अब आप हमारे कोने पर फूल माला चढ़ा कर श्रद्धांजली दे दीजिए, क्योंकि अब वह कोना कोना नहीं रहेगा, अब उस कोने की रोशनी दुनिया में फैलेगी? आप रोकेंगे तो भी रोक न सकेंगे पर एक ही अनुरोध हैं कि हमें केवल देह के आधार पर आंकना बंद कर दें।  हमें केवल योनि समझना बंद कर दें, हमें आपस में लड़वाकर आप हमारी बहुत हानि कर चुके है, पर हां, अब अभिव्यक्ति नहीं रुकेगी, अब अभिव्यक्ति नहीं रुकेगी। हम मेहंदी रचेंगी तो हम देह के अपने आयाम भी रचेंगी। हमें देह पर अधिकार इसलिए नहीं चाहिए क्योंकि हमें कई लोगों से देह साझा करनी है, अपितु हमें देह पर अधिकार इस लिए चाहिए जिससे हम देह को महसूस कर सकें। देह के प्रति आप हममें कोई शुचिता बोध न दें, पवित्र देह और अपवित्र देह से परे हमारी अभिव्यक्ति की एक दुनिया है उसे समझें। हमें मर्यादा की डोर में बाँधने के स्थान पर क्यों न मर्यादा की ही डोर को तनिक ढील दे दें। न तो आप ही इससे छोटे हो जाएँगे और न ही मठ का गुम्बद हिलेगा। मठ आपका है बस हमने अपने लिए अपने अनुसार एक राह बना ली है। अब हम मठ में कोई कोना नहीं मांगेंगे, अब हम अभिव्यक्ति का अधिकार भी नहीं मांगेंगे। हम बोलेंगे, हम लिखेंगे, जब आपने हमें कोना दिया था तभी हमने अपने  अक्षरों का संसार उसमें बना लिया था और अब तो हमारे पास आकाश है, कहाँ देह की सीमाओं में बांधकर हमें कुंठाग्रस्त कर सकेंगे? नहीं अब आप नहीं कर सकेंगे? हम उठ चले हैं देह बोध से परे, देह के प्रति हमारे मन में अब कोई कुंठा नहीं है। हम अपनी कूपमंडूकता से ऊपर उठ चुके हैं। आपके मठ की नींव में मट्ठा डालने का पाप हमने न कल किया था और न ही आज करेंगे बल्कि उस मठ को संवारेंगे, मिल कर। बस आप अपनी कुंठा का त्याग कर दें।

साहब, मांगेंगे नहीं अब करेंगे। खुल कर खुद को अभिव्यक्त, जो नियम हमारे अनुकूल नहीं होंगे हम उन्हें तोड़ेंगे।  आप इस के लिए हम पर जो भी आरोप लगाएं, पर अब मठ में हमारे पसीने की भी गंध होगी, जो आपको हर क्षण हमारे अस्तित्व का अहसास कराएगी।

शनिवार, 20 अगस्त 2016

इंटरनेट और स्त्री चरित्र पर प्रश्नचिन्ह : आप देह की देहरी बनाते रहिये, हम देहरियों को लांघकर बढ़ते रहेंगे आगे

तकनीक ने हालांकि हमारी ज़िन्दगी को बहुत ही सरल बना दिया है. पलक झपकाते ही सात समंदर पार के लोग हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाते है. सोशल मीडिया ने स्त्री को अपने विचार रखने का एक नया मंच दिया है. पहले जहाँ वह अपने विचारों को बताने से हिचकती थे, वह अब खुलकर अपने विचार रखने लगी है.
इन्टरनेट ने स्त्रियों के लिए स्वतंत्रता के नए द्वार खोले हैं, पर हां इसका एक बहुत ही बड़ा नुकसान भी हमारे सामने आया है, बढ़ती हुई पोर्न साइट्स ने स्त्रियों को बदनाम करना बहुत ही सरल कर दिया है. कुछ भी नहीं करना बस, उनका नाम किसी भी पोर्न साईट पर डालना है और जैसे ही एक दो फोन आने लगे, स्त्री घबराकर कुंठित होने लगेगी. और जिसने भी ये काम किया होगा उससे घबराकर हार मान लेगी.
हो सकता है कुछ ही मामलों में ऐसा होता हो. पर अब स्थितियां भिन्न हैं क्योंकि स्त्रियों में लड़ने की ताकत आ रही है. पर हाँ, ये शोर मचाने से नहीं होगा, नहीं तो कौमार्य की बोली लगाने वाले बहुत हैं. पहले एक सच्ची घटना के बारे में बात करते हुए आगे बढ़ेंगे. (गोपनीयता बरतने के लिए नाम नहीं दे रही हूँ).
मेरी सहेली एक बहुत ही बड़े कोर्पोरेट में नौकरी करती थी. पहनावा एकदम भारतीय यानी साड़ी या सूट रहता था. ऑफिस का ही एक व्यक्ति जो दुर्भाग्य से उसी विभाग में था जो उससे काफी अश्लील बातें करता था.
उसने हमेशा इग्नोर किया, एक दिन उसने उससे कहा “मैडम, जो पजामी आप पहन कर आई हैं, उसमें पता नहीं चलता कि लिखा क्या है?” डिज़ाईनर पजामी थी, उसकी  एक मित्र मुम्बई से वह सूट लाई थी. उसमें कुछ अक्षरों जैसी डिजाइन थी. और यह बात उन सज्जन ने पूरे विभाग में सबके बीच में कही. लगभग पचास लोग और हॉल में ठहाके लगने लगे.
द्विअर्थी मुस्कान सबके चेहरे पर फैलने लगी. आखिर स्त्री के साथ द्विअर्थी मजाक हो रहा है, तो पचास में से चालीस लोग तो आनंद उठाएंगे ही. सुनते ही उसके अंदर जो आग लगी, उसने कहा “सर, मेरी पजामी में क्या लिखा है वह अपने केबिन से देखने की जगह ये देखोगे कि मैंने MIS में क्या लिखा है, तो शायद मेरे लिए काम थोड़ा कम हो जाएगा.”
पिनड्राप साइलेंस जिसे कहते हैं वह पूरे हॉल में हो गया. कई महिला सहकर्मियों ने उसे सलाह दी, कि वह ऐसा न करे, क्योंकि वह डायरेक्टर का मित्र है. पर वह नहीं डिगी. कुछ दिनों के बाद उसके एक्स्टेंशन पर अजीबो गरीब फोन आने लगे, जैसे “रात को समय काटे नहीं कट रहा तो हम आ जाएं” और अश्लील गालियाँ. उस समय वह पांच माह की गर्भवती थी. उसे समझ में नहीं आया. दो दिन तक यही सिलसिला चला, फिर उसे लगा कुछ तो गड़बड़ है. इंटरनेट पर चेक किया. तो पता चला कि किसी ने उसका नाम एक पोर्न साईट पर डाल दिया था. और बहुत ही अश्लील सन्देश डाला था.
उसके पाँव के नीचे से जमीन जैसे किसी ने खींच दी. जैसे किसी ने भरी सड़क पर उसकी साड़ी उतार दी हो और वह द्रौपदी की तरह असहाय हो गयी है. दो पल तो उसे लगा कि क्या करूँ? अपमान के आंसूं उसकी आँखों से बह निकले, पर अगले ही क्षण जैसे उसके अन्दर से किसी ने आवाज़ दी, कि रोना क्यों? उसकी क्या गलती? उसने आंसू पोंछें, और घर आ गयी.
अपने भाई को फोन किया जो वकील है, उसने कहा पहले तो घबराना बंद करो, कल जाओ साइबर सेल में शिकायत दर्ज कराओ, और मुझे बताओ. असली संघर्ष फिर आगे वाले तीन दिन का था. वह पांच माह का गर्भ लेकर पुलिस स्टेशन जाती क्या? अगले दिन ऑफिस पहुँच कर बॉस को बताया, बॉस ने उन सज्जन को बुलाया, तो उसने सबसे पहले कुटिल मुस्कान लाते हुए कहा “मैडम, आपके किसी पर्सनल दुश्मन का काम होगा” उसने कहा.
“सर, पिछले तीन महीने की फोन लिस्ट निकालो और देखो, अगर मैंने एक भी पर्सनल फोन किया होगा तभी मेरे दोस्तों के पास होगा यह नंबर, नहीं तो यह ऑफिस से ही किसी की हरकत है.” वह झेंप गया.
बोला “इस लाइन को बंद करा देता हूँ, खुश” उसने कहा “नहीं, खुश नहीं, मुझे ऑफिस से लीगल हेल्प चाहिए, कि कैसे इस वेबसाईट के खिलाफ कदम उठाना है” अब बारी उसके बॉस के चौंकने की थी. बोले “क्या बात है? तुम ऐसी हालत में पुलिस के पास?” उसने कहा “सर, ये मेरा चरित्र हनन है, किसी ने अपनी शरारत से मुझे एक वैश्या बना दिया है, और आप चाहते हैं, मैं कोई कदम न उठाऊँ? मैं पुलिस में जरूर जाऊंगी, आप ऑफिस से लीगल मदद दिलाएं या फिर मैं खुद करूँ?”
फिर लीगल टीम ने उसे समझाया “मैडम, ये आपके चरित्र के बारे में गलत सिग्नल देगा, कि कैसा कैरेक्टर है?” उसने कहा “मेरा कैरेक्टर कैसा है, ये आप न मुझे समझाएं, मेरी मदद करें. मुझे साइबर सेल से शिकायत कराने में मदद करें. अपने कैरेक्टर के बारे में मुझे किसी से कोई प्रमाणपत्र नहीं चाहिए?, वैसे भी चरित्र और शरीर की पवित्रता दो अलग चीज़ें हैं” जैसे एक छन्न से किसी ने कोई शीशा तोड़ दिया हो.
अरे गज़ब, एक कॉटन की साड़ी पहनने वाली महिला ऐसी भी हो सकती है, शायद उन मॉडर्न स्कर्ट पहनने वाली लड़कियों ने सोचा नहीं होगा, जो उसे शरीर और पवित्रता का सम्बन्ध समझाने का प्रयास कर रही थी. उसे हर तरह से समझाया गया कि पुलिस में जाने से उसके चरित्र पर उंगलियाँ उठेंगी, और वह दुनिया के सामने चरित्रहीन साबित हो जाएगी.
कितना आसान होता है, पुरुषों के लिए किसी भी स्त्री को चरित्रहीन ठहरा देना. बस उस एक व्यक्ति के कारण मेरी सहेली वैश्या बनने की कगार पर खड़ी थी, और इस द्वन्द के बीच में से पेट में भी जो जीव था वह हाथ पैर चला कर अपनी उपस्थिति का अहसास कराता और सिर से लेकर नीचे तक पूरे बदन में दर्द और अपमान की एक तीव्र लहर दौड़ जाती. उफ, वे तीन दिन, और उन तीन दिनों में पूरे ऑफिस वालों की आँखों का सामना. उसने सब कुछ छोड़ कर न्याय पाने का मार्ग अपनाया.
उसने साफ मैनेजमेंट से कह दिया, किसी ऑफिस के ही व्यक्ति का काम है, क्योंकि ऑफिस का नंबर दिया है. अगर मेरा मित्र करता कोई तो मेरा मोबाइल नंबर देता. ये बात मैनेजमेंट को समझ में आई. और अंतत: पांच दिन बाद उसे पुलिस के पास जाने की व्यवस्था ऑफिस से ही की गयी. उसने शिकायत दर्ज की. हालांकि उसे पता था कि किसने किया, पर मैनेजमेंट ने इसी शर्त पर उसे पुलिस के पास जाने दिया कि रिपोर्ट नामजद नहीं होगी, क्योंकि ऑफिस का नाम बदनाम होगा.
दो दिन के बाद उसके पास पुलिस से फोन आया कि उन लोगों की पहचान कर ली गयी थी जिन्होंने उस नंबर पर फोन किया था और उन लोगों की सम्बन्धित थानों में इतनी ठुकाई हुई कि वे कभी शायद इंटरनेट को ही हाथ न लगाएं और उसके एक सप्ताह बाद उसे पता चला कि वह वेबसाईट भी बंद हो गयी. और इसी बीच में उससे उन्हीं सज्जन व्यक्ति ने कहा “मैडम, आपका नाम अब उस वेबसाईट पर नहीं है”.
उसने कहा “सर, पुलिस का डंडा होता ही ऐसा है, अच्छे अच्छों को गायब कर देता है और ये तो वेबसाईट पर मेरा नाम था”. ये एक सप्ताह का समय उसके लिए एक ऐसे संघर्ष के रूप में सामने आया जिसमें उसके चरित्र पर उंगली उठी, उसके चरित्र हनन का प्रयास हुआ और मैं कहूंगी कि चरित्र हनन हुआ. उसे वैश्या बनाने में उस व्यक्ति ने कोई भी कसर नहीं छोडी.
पर उसके इस एक सप्ताह के संघर्ष का ये परिणाम हुआ कि उसे पुलिस वालों ने भी धन्यवाद व्यक्त किया कि आपके साहस के कारण न जाने कितनी लड़कियों के साथ खिलवाड़ रोका जा सका और उस ऑफिस में भी महिला दिवस के अवसर पर महिलाओं को कोर्पोरेट में उनके सुरक्षा नियमों और आत्मरक्षा के गुर सिखाए गए.
यहाँ पर इस किस्से को बताने का मेरा उद्देश्य केवल इतना ही है कि स्त्रियों को अब बदनाम करना कितना सरल और सुगम हो गया है, कितने नए नए मार्ग खुल गए हैं. उन्हें आप केवल देह के कारण चरित्रहीन साबित कर दें, क्योंकि आप किसी से बौद्धिक रूप से नहीं जीत सकते तो आप उसे ऐसे हराइये. आप उसे दुनिया की नज़र में ऐसे चरित्रहीन साबित कर दें और वह इस कारण घर से ही बाहर न निकल सके.
जैसा पहले होता था, दुपट्टा खींच लो और उसे हरा दो. पर समय के साथ स्त्रियों ने जैसे ही घर की चौखट लांघ कर स्वयं को स्थापित करना शुरू किया तो जैसे आपकी तो सत्ता ही हिल गयी और आपने उसे अपमानित करने के नए नए तरीके खोज लिए. जब आप उसे प्रतिभा से नहीं परास्त कर सके तो आपने छल का सहारा लिया पर आप भूल गए कि अभी वह द्रौपदी की तरह केवल श्राप ही नहीं देगी बल्कि वह शस्त्र भी स्वयं ही उठाएगी.
वह शरीर को पवित्र मानती है, पर उस पवित्रता को लेकर रोएगी नहीं. अगर आप केवल शरीर को लेकर उसे दोराहे पर खड़ा करेंगे या फिर आप अगर ऐसा कुछ करेंगे जिससे उसे अपने शरीर को लेकर किसी अपमान का सामना करना पड़े, उसमें कुंठा उत्पन्न हो तो अब वह नहीं करेगी.
अब वह अपने शरीर से जुड़ी किसी समस्या को एक टैबू नहीं बनाएगी. वह लड़ेगी, वह अब आपसे अपने शरीर के बारे में प्रमाणपत्र हासिल नहीं करेगी. क्या कहा, फिर लोग उसे चरित्रहीन मानेंगे? तो चरित्रवान मान कर ही क्या करते हैं? आप अगर किसी स्त्री को चरित्रवान मानते हैं तो क्या आपका मन उसे भोगने का नहीं होता?
अगर हां, तो भोगा आपने है उसे अपने मन में, अपवित्र तो आप हुए, उसमें स्त्री का क्या दोष? स्त्री को आप जानते हैं कि केवल मनोबल ही तोड़कर हरा सकते हैं, तो आपने इस तकनीक का प्रयोग स्त्री का मनोबल तोड़ने के लिए कर दिया. और कुछ हद तक आप इसमें सफल भी रहे हैं. आज कुछ स्त्रियाँ भय खाने लगी हैं. भय खाने लगी हैं इंटरनेट के प्रयोग करने से. वे भय खाने लगी हैं इस तकनीक से. उन्हें भय है निजता खोने का और सबसे अधिक भय है उन्हें अपने चरित्रहीन होने का.
कितना आसान है, सोशल साईट से किसी का भी चेहरा लेकर उसे किसी नग्न तस्वीर के शरीर पर लगाना. और आजकल तो ये बदला लेने का बहुत ही सरल माध्यम हो गया है. स्त्री के कोमल ह्रदय के अन्दर देह के प्रति शुचिता का भाव इस कदर व्याप्त है कि वे सोच ही नहीं पाते इससे इतर.
घर के अन्दर जिन छोटी छोटी बच्चियों के साथ गलत होता है, उसमें भी देह के प्रति जुड़ी शुचिता होती है. मेरी एक सखी थी, जब हम सब अपनी किशोरावस्था में कदम रख ही रही थी, तो उसके साथ हादसा हुआ और वह अपने में ही सिमट गयी. जब वह सो रही थी तो उसके फुफेरे भाई ने उसके उभरते हुए वक्षों को मुट्ठी में लेकर एकदम से मसल दिया. उसने आँखें खोलकर डरकर देखा तो उसकी रजाई में उसका फुफेरा भी घुसा हुआ था. और उसके वक्षों को कस कर मसल रहा था. और उसकी जींस खोलने की कोशिश कर रहा था.
वह क्या करती? उसने आँखें खोली, उसका भाई बोला “अरे आप जाग रहे हो, सॉरी” और कहकर वह भाग गया और वह रह गयी, अपनी अस्तव्यस्त सांसों को सम्हालती हुई. एक ऐसे भय से कांपती हुई जिसे वह किसी को बता भी नहीं सकती थी. अगले दिन जैसे ही उसने अपनी बुआ से कहा, उसकी बुआ ने उसे ही चरित्रहीन ठहरा दिया, मात्र तेरह वर्ष की लड़की, और चरित्रहीन, क्या शब्द, क्या गाली? उसकी बुआ ने या घर वालों ने एक बार भी  यह नहीं सोचा कि उसके कोमल मन पर जो प्रभाव पड़ा है, उसका परिणाम क्या होगा?
हालांकि मैं उस समय भी बहुत लड़ाका थी तो मैंने बहुत समझाया उसे, कि जाओ और सबके सामने अपने भाई के मुंह पर थप्पड़ लगाकर सबक सिखाओ, जो तुम्हें सबके साथ मिलकर चरित्रहीन कह रहा है, पर वह नहीं कर सकी.
कैसा समाज है? कैसे लोग हैं हम? हम आखिर चाहते क्या हैं? स्त्री को केवल देह तक मानने की जो हमारी विचारधारा है कब बदलेगी? कब हम मानेंगे कि स्त्री भी एक इंसान है? उसकी भावनाएं हैं. आपने उसे अपमानित करने के जो नए तरीके खोजे हैं, उससे अब वह अपमानित होने वाली नहीं है. हाँ वह एक पल को झिझकेगी कि कैसे वह विरोध करे? कैसे वह विद्रोह करे? पर वह विद्रोह करेगी? उसे आप जितना देह के आसपास लाएँगे वह उतना ही देह के सिद्धांतों का विरोध करेगी. आपने देखा होगा आप स्प्रिंग को जितना दबाते हैं वह उतना ही ऊपर जाती है.
और अब आपने उसे दबाने का घिनौना कार्य तकनीक के हवाले कर दिया? आपको तनिक भी लाज न आई अपनी अकर्मण्यता छिपाने में? आपने कितने सहज तरीके से कह दिया कि अरे आपका नाम तो पोर्न वेबसाईट में है, तो आप कैसे जमाने को मुंह दिखा पाएंगी? पोर्न वेबसाईट में मेरा नाम है, ये बात पुरुषों को कैसे पता चली? क्योंकि देह के भूखे आप हैं? देह के पुजारी आप है! देह के आसपास केवल आप ही घुमते हैं हम नहीं!
अगर आपमें देह की भूख नहीं है तो आप पोर्न वेबसाईट पर क्या करने जाते हैं? जाहिर है भजन गाने तो जाते नहीं होंगे? आप अपनी कुंठा को शांत ही करने जाते होंगे? पर आपने पोर्नवेबसाईट पर जाने का आरोप किस पर लगा दिया? स्त्री पर? चरित्रहीन किसे बना दिया? स्त्री को? वैश्यालय में जाकर किसी का शरीर खरीदने वाला तो चरित्रवान रहा पर शरीर बेचने वाली चरित्रहीन हो गयी?
कैसी चतुरता से आपने केवल पवित्रता का पैमाना देह कर दिया और हमें उस सलीब पर टांग दिया. और आप चाहते हैं कि हम अब भी टंगे रहें, नहीं अब नहीं. अब आप चाहें तकनीक का सहारा लेकर हमें बदनाम करने का प्रयास करें या फिर किसी और का, अब हम बदनाम होने वाले नहीं हैं. हम लड़ेंगे अब.
देह की सीमाओं से परे हमारा चरित्र है, और आप जो किसी भी स्त्री की आत्मा तक को भोगने की ख्वाहिश करते हैं, हमें पवित्रता की परिभाषा समझाएँगे, तो हम ऐसे किसी भी चरित्र प्रमाणपत्र को लेने से इंकार करते हैं. मैं विद्रोह करती हूँ, मैं ऐसे हर उस प्रमाणपत्र को जलाती हूँ, जो केवल मुझे मेरी देह के आधार पर चरित्र का आंकलन करता है.
आप हर उस माध्यम का सहारा लेकर हमें बदनाम करने का प्रयास करते रहें, हम अब इतने वर्षों के संघर्ष की जमीन छोड़ने के लिए तैयार नहीं. आप बदनाम करिए, हम प्रतिकार करेंगे. और अब हम इस बात को भी स्वीकार नहीं करेंगे कि अमुक लड़की शराब पीती है, छोटे छोटे परिधान पहनती है, अत: वह चरित्रहीन है. आप ही इंटरनेट पर बैठकर उसके छोटे छोटे कपड़ों को फोटोशोप से और छोटा करते हैं. है कि नहीं? और उसके अंत:वस्त्रों की रेखाओं को भी देखना चाहते हैं. आप अपनी कुंठा शांत करना चाहते हैं.
पिछले साल एक अभिनेत्री के क्लीवेज पर बहुत विवाद हुआ था. अपने तकनीक के माध्यम से इस प्रकार ज़ूम करके दिखाया कि उस अभिनेत्री का भी दर्द झलक आया. पर आपको कहाँ परवाह है, स्त्री मन के दर्द की. आप तो आप हैं.
पर अब करने का समय आ गया है. अब आप देह की देहरी बनाते रहिये, हम उन देहरियों को तोड़कर आगे बढ़ते रहेंगे. हम जाएंगे आगे, आपकी हर प्रकार की कुंठा से बहुत दूर, आपकी उम्मीदों से बहुत आगे. आप बनाते रहिये षडयंत्र, और हम हर छलावे को तोड़कर आगे बढ़ेंगे.
इंटरनेट पर बैठकर जहाँ हम अपने लिए आकाश खोजेंगे तो वहीं अब यह आप पर है कि आप इसे हमारी अभिव्यक्ति को रोकने के रूप में प्रयोग करना चाहते हैं या फिर अपने लिए उन्नति के द्वार खोलने के लिए. सोचिये जरा. बांचिये जरा, तब तक हम एक बूँद सांस लेकर आते हैं, आई मीन, फेसबुक और ट्विटर पर चहचहा कर आते हैं.
– सोनाली मिश्र

नया साल

फिर से वह वहीं पर सट आई थी, जहाँ पर उसे सटना नहीं था। फिर से उसने उसी को अपना तकिया बना लिया था, जिसे वह कुछ ही पल पहले दूर फेंक आई थी। उसने...