शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

कर्जमाफी




देखिये, ये सब आप बहुत गलत कर रहे हैं! बहुत गलत!” स्मिता ने गिडगिडाते हुए उस उन्मादी भीड़ से कहा! “देखो, मैं यहाँ पर तुम्हारी मदद करने आई हूँ!” स्मिता ने उस उन्मादी भीड़ में कुछ परिचित चेहरों को खोजने की कोशिश करते हुए मनुहार करने की कोशिश की! स्मिता की चार साल की बेटी आज उसके साथ नहीं आई थी,नहीं तो वह इस बस्ती में आती थी, अपनी बेटी को लेकर ही! हर परिवार उसी का तो परिवार है! उसी के हाथों इस बस्ती में न जाने कितने प्रसव हुए थे और उसी के कारण पिछले छः सालों में कई शादियाँ हुई थीं। उसी ने बीमा कराया था! मगर
“मुझे जाने दो!  आखिर मैंने किया क्या है?” स्मिता की आँखें उस अनऑथराइज़ बस्ती में बेतरतीबी से बने हुए घरों के बीच गलियों में किसी तरह खुद को बचाती हुई लाजो चाची, रुखसाना आपा और निर्मला दीदी को खोज रही थी। स्मिता ने जब से सार्वजनिक जीवन में कदम रखा था तब से ही उसके जीवन में दूसरों की खुशियाँ ही रह गईं थी। वह लाजो चाची के बेटे रमेश की शादी में कितनी खुश हुई थी। पार्टी के महिला मोर्चा के साथ जुड़कर उसका न केवल बीमा वाला काम चल निकला था बल्कि उसने कई माइक्रो फाइनेंसिंग कंपनी से लोगों के सपने साकार करने के लिए लोन भी दिलवाए थे।
अपनी जान बचाकर भागती हुई स्मिता को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर वह करे तो क्या, क्या वह भाग सकती है? नहीं वह नहीं भाग सकती है! वह घिरी हुई है। वह उस दिन को कोस रही थी, जिस दिन वह न केवल महिला मोर्चा के साथ जुडी थी बल्कि वह चुनावों में जी जान से रक्षा जी को जिताने में लग गयी थी।
रक्षा जी के नाम से उसे ध्यान आया कि वह रक्षा जी से बात करके देखती है। मगर उसके पास बात करने का समय ही कहाँ था! वह तो आज रिकवरी एजेंट के साथ ईएमआई की बात करने आई थी। उसे तो उन लोगों ने बंद कर दिया था कमरे में और न जाने उसके साथ क्या कर रहे थे, मगर उसे केवल बस्ती से बाहर ही खदेड़ रहे थे। स्मिता को लगा कि पहले अपनी जान बचाए और बाहर निकले, बचेगी तभी तो कुछ कर पाएगी। ओह, ये कैसी विडंबना थी। कल तक सबकी चहेती स्मिता, हर घर के किसी न किसी रिश्ते में बंधी स्मिता, किसी के दीदी स्मिता, किसी की बहू स्मिता, किसी की भाभी स्मिता, आज इस तरह पराई हो गयी थी, न केवल पराई बल्कि दुश्मन कि वे उसे किसी भी कीमत पर अपनी बस्ती से बाहर फेंकने पर अमादा थे।
स्मिता ने फिर से एक बार उस भीड़ की तरफ नज़र डालने की कोशिश की। ये रिश्ते इतने भावशून्य क्यों हो गए थे? उतने ही भावशून्य जितने शायद दुर्योधन और कौरवों के हो गए होंगे! पांडवों को बिना युद्ध के एक इंच भी भूमि न देने की हठ में एक महाविनाश को न्योता देने वाले चेहरों पर भी यही भावशून्यता रही होगी, जब वे रिश्तों के खिलाफ खड़े हुए होंगे!
रिश्तों की हंसी ठिठोली में भीगी रहती थी स्मिता! उसके पास कितने रिश्ते थे, कई तो महिला मोर्चा के ही थे। स्मिता बस्ती से बाहर निकल कर किसी तरह अपनी जान बचाकर बैठ गयी थी। उसके सामने लाजो चाची का संवेदनहीन चेहरा आ रहा था और साथ ही लाजो चाची के इलाज के समय जो उसने उनके बीमा क्लेम हासिल करने के लिए भाग दौड़ की थी उस समय उनके पूरे परिवार का कृतज्ञ चेहरा सामने आ रहा था। लाजो चाची ने उसकी कितनी बलाएं ली थीं, “अरे बिटिया तुम न होतीं तो का होतो! हमाओ तो सब कुछ ख़त्म होय गयो होतो! तुमने भाग दौड़ कर दई!”
जब से वह बीमा एजेंट बनी थी, वैसे अब सम्मानजनक भाषा के रूप में इंश्योरेंस एडवाइज़र कहने लगे हैं! जब वह एडवाइज़र बनी थी, तब से उसने अपना सारा ध्यान केवल काम पर ही लगा लिया था। हालांकि ट्रेनिंग में तो केवल पालिसी  बेचना ही उसे सिखाया गया था मगर उसने कभी भी बिना मतलब के कोई पालिसी नहीं बेची थी।  शुरू के दो तीन साल संघर्ष के बाद उसकी गाड़ी चल निकली थी। कितना अच्छा बीत रहा था समय! राहुल के साथ शादी के बाद तो जैसे उसकी ज़िन्दगी के सफर को रफ्तार मिल गयी थी। राहुल से उसकी मुलाक़ात एक क्लाइंट मीट के दौरान हुई थी। राहुल एक लोन मैनेजर था। एक अच्छी खासी नौकरी और तनख्वाह थी। पांच सालों में ही उनके पास सब कुछ था, कार, घर और उनकी छोटी सी बेटी!
स्मिता ने गहरी सांस ली! उसने पीछे मुड़कर देखा, पीछे गली में उसके सभी रिश्ते खड़े थे, तार तार होते हुए! उसने जैसे हर लम्हे को अपनी मुंदती आँखों में मुंदते हुए देखा। लम्हों की जलन कितनी घातक होती है, उसे आज पता चला। राहुल ने उसे उस दिन शायद इसी जलन के चलते महिला मोर्चा के साथ जुड़ने के लिए मना किया होगा!
“देखो यार, बीमा ही बेचो, ये राजनीति में क्या जाना, हमें क्या मतलब?”
उसने राहुल को मनाते हुए कहा था “राहुल देखो न, और कितनी नई महिलाओं से मिलूंगी, अपना बिजनिस भी बढेगा!” राहुल को पता था कि स्मिता जो एक बार ठान लेती है, वह हमेशा करती है। उसने अपने हथियार डाल दिए थे। इधर स्मिता का उठना बैठना जब से पार्टी के महिला मोर्चा में हुआ था, तब से वह एक नई ही दुनिया में डोलने लगी थी। उसके व्यक्तित्व और लोगों के साथ तुरंत घुलमिल जाने की खूबी के कारण उसे नगरप्रमुख के पद पर नियुक्त किया गया था, और उसके अधीन खंड प्रमुख, खंड उपप्रमुख, मंत्री, आदि जैसे पद थे। स्मिता तो एक नई ही दुनिया में थी। यहाँ पर उसके बीमा बेचने के कौशल काम आए थे, जिस तरह वह लोगों को मना लेती थी कि बीमा कितना जरूरी है, वैसे ही घर घर जाकर औरतों को यह समझाना उसके बाएँ हाथ का खेल होता था कि आखिर उसकी पार्टी को वोट देना क्यों जरूरी है। दिन और रात उसका फोन टिनटिनाता रहता था।
राहुल को शुरू में अजीब लगा था, मगर धीरे धीरे उसके सेल्स वाले दिमाग ने अपना मुनाफा खोज ही लिया था! राहुल ने भी स्मिता के माध्यम से कई ऐसी जगहों पर प्रवेश पा लिया था जहां पर वह नहीं जा सकता था। उसके लोन प्रोडक्ट भी बिकने लगे थे। वह तो पक्का हार्डकोर सेल्स पर्सन था। उसकी कंपनी तमाम नए ऑफर्स के साथ लोन दे रही थी। उसने भी स्मिता के डेटाबेस का इस्तेमाल करते हुए अपनी तरक्की की राह बनाई!
“ओह राहुल! ये क्या किया?” स्मिता अपने सिर पर हाथ रखकर रो रही थी! वह समझ नहीं पा रही थी। उसकी आँखों के सामने वे सब नुक्कड़ सभाएं आ रही थी, जिनमें वह रक्षा जी के बगल में खड़ी होकर कर्ज माफी की घोषणा करती थी। वह कितने जोश में घोषणा करती थी कि हमारी सरकार आएगी तो आपके सारे लोन माफ हो जाएंगे! कर्जमाफी को लेकर हर तरफ शोर होता चला गया था। आह, कितना नशा था उस एक शब्द में! एक उन्माद था!
उन्माद और कर्जमाफी जैसी लोकलुभावन घोषणाओं के परों पर बैठकर चुनाव की वैतरणी पार कर ली थी रक्षा जी ने और स्मिता के हिस्से आई थी, खूब तारीफें! जिला स्तर क्या प्रदेश स्तर तक उसकी धाक जमी थी, स्त्रियों को एकजुट करने के लिए वह एक प्रमुख व्यक्ति के रूप में उभर कर आई थी। वह पार्टी के हाथ में एक हथियार थी। मगर जल्द ही स्मिता को इस हथियार के नुकीलेपन का अहसास हो गया था। जैसे भस्मासुर ने वर पाते ही भोले बाबा पर वरदान को आजमाया था, उस समय भोले की क्या गत हुई होगी वह उसे एक दिन राहुल का उतरा चेहरा देखकर लग गया। स्मिता को वह दिन नहीं भूलता जब राहुल उदास और उतरे चेहरे के साथ घर आया था। पानी पीते पीते वह स्मिता का हाथ पकड़ कर रोने लगा था;
“मुझे बचाओ, केवल तुम ही मुझे और मेरी नौकरी को बचा सकती हो!”
जो कुछ राहुल ने बताया, उसे सुनकर स्मिता के पैरों तले जमीन खिसक गयी। राहुल की कम्पनी ने जिन लोगों को लोन दिए थे, उन लोगों ने विधायक साहिबा के वादे का हवाला देकर लोन की ईएमआई देना बंद कर दिया था। राहुल के वहां जाने पर उससे न केवल अपशब्द बोले गए थे बल्कि उसे धमकी भी दी गयी थी कि आइन्दा से बैंक का कोई भी आदमी इस बस्ती में आया तो वह वापस नहीं जाएगा। विधायक साहिबा ने लोन माफ करने का वादा किया था, अब वे कोई किश्त नहीं देंगे। राहुल के पास न तो पुलिस का प्रोटेक्शन था और न ही राहुल ऐसा व्यक्ति था जो कोई विरोध झेल पाता, वह तो कोमल साआदमी था जो एमबीए करने के बाद केवल सेल्स और मार्केटिंग में विश्वास रखता था।
रिकवरी के लिए रिकवरी वाले करें! ऐसा कहकर वह चला तो आया था, मगर अगर सही रिकवरी नहीं हुई तो उसका पूरा ट्रैक रिकोर्ड खराब हो जाएगा और फिर वह क्या करेगा? वह फंसता जा रहा था! राहुल के साथ साथ स्मिता को भी लग रहा था जैसे वे अजगर की पकड़ में आ गए हैं।
“तुम चिंता न करो, कल रिकवरी एजेंट के साथ मैं जाऊंगी!” स्मिता ने उसका हाथ दबाकर आश्वासन दिया था। राहुल उसकी गोद में ही सो गया था उस दिन! स्मिता सिहर गयी थी। रक्षा जी से बात करने की हर कोशिश बेकार, पार्टी के जिला प्रमुख से बात की तो उन्होंने अपनी विवशता जाहिर कर दी, “क्या करें मैडम, अब देखिये ये तो प्राइवेट कम्पनी और उसके क्लाइंट के बीच की बात है, हम क्या कहें! हम तो सरकारी लोन माफ करा सकते हैं और करा ही रहे हैं”
स्मिता ने बहुत कहा कि वे चलकर ये सब बातें उन लोगों से कहें! मगर वह भूल गयी थी कि राजनीति में संख्याबल जरूरी होता है, वे अपने वोटबैंक का नुक्सान क्यों करेंगे!
वे चुपके से बोले “मैडम, काहे पड़ रही हैं, च्क्करे में! अपने हजबैंड को बोलो कहीं और नौकरी खोज लें और रिकवरी एजेंट भेजना वैसे भी गैरकानूनी है! पुलिस भी मदद नहीं करेगी! तो पचड़ा छोड़ो और आगे बढ़ो! नौकरी वौकरी चाहिए तो बताना, अच्छा नमस्कार! मामला सुलझे तो बताना, रक्षा जी को डिस्टर्ब न करना!”
खाली खाली स्मिता भरे विश्वास के साथ उस बस्ती में गयी थी, मगर उसे क्या पता था, रिकवरी एजेंट को  तो बंधक बना लेंगे वे, और उसे इस तरह निकालेंगे! “जाओ, हम कोई किश्त नहीं देंगे, आप ही तो आईं थीं न! सारे कर्ज माफ होंगे! अब करो माफ!”
रक्षा जी का फोन लगातार स्विच ऑफ आ रहा था.................
राहुल की आवाज़ उसके कानों में गूँज रही थीं, “प्लीज़ सेव मी! केवल तुम ही बचा सकती हो! आई विल गेट टर्मिनेटिड, नाउ आई विल नोट यूज़ योर डेटाबेस! बट प्लीज़ सेव मी! क्या होगा! ओह स्मिता!”।
पीछे से उन्मादी शोर आ रहा था “हम किश्त नहीं देंगे! विधायक जी ने कर्जमाफी की है! उन्हीं से मांगो!”
और वह उस चौराहे पर एक गिलास मशीन का पानी पी रही थी जहां से उसने और रक्षा जी ने “कर्जमाफी की घोषणा की थी। उसके सामने कर्जमाफी और भस्मासुर दोनों गड्डमगड्ड हो रहे हैं.................

सोनाली मिश्रा
सी-208, जी-1
नितिन अपार्टमेन्ट
शालीमार गार्डन, एक्स- II
साहिबाबाद, गाज़ियाबाद

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

बारिश का भूत



अमित फिर से डरने लगा था। बरसात के मौसम में फिर से उसे शिवम की बातें याद आने लगी थी। दादी मंदिर तक गईं थी और दादा जी चौपाल तक। बारिश आने से पहले गाँव में बिजली तो जाती ही थी, मगर इस समय तो अपने आप ही बल्ब जलने बुझने लगे थे। पंखा भी अपने आप ही चलने लगा था। आंगन में लगे हुए पेड़ पर बिजली के चमकने के साथ साथ पीले बल्बों की रोशनी भी साफ दिखने लगी थी। और उनसे अजीबोगरीब शक्लें बन रही थीं। अमित अपने कमरे में बैठा हुआ हनुमान चालीसा का पाठ कर रहा था, उसे खुद पर बहुत ही ज्यादा गुस्सा आ रहा था, आखिर उसे क्या जरूरत थी इतना हीरो बनने की? दादी ने कितना कहा था कि उनके साथ मंदिर चले, पर वह ही घर पर रहना चाहता था। उसे शिवम के साथ बातें करनी थीं। शिवम उसी की उम्र का था और वह उससे एक क्लास जूनियर था। तो अमित शिवम पर खूब रुआब गांठता था। वह उसे शहर के किस्से सुनाता और शिवम उसे गांव के। अमित उसे शहर के मॉल की बातें सुनाता और शिवम उसे गाँव, नदी, नहर और सबसे बढ़कर भूत के किस्से!

अमित के लिए दादा दादी के गाँव की दुनिया एकदम नई थी। कहाँ शहर में छोटी सी जगह में इतने सारे लोगों का रहना और यहाँ गाँव में इतनी बड़ी हवेली में कुछ ही लोग! घर में ही खूब दौड़ो भागो! इस बार छुट्टियों में उसके दादा ने जब उसे गाँव ले जाने की जिद्द की थी तो माँ ने भी उसे भेज दिया था। उसके यहाँ छोटी बहन आने वाली थी और माँ के लिए उसे सम्हालना, और उसके पीछे पीछे दौड़ना संभव नहीं था। दादी ने कहा जब तक एक दो महीने में अमित की छोटी बहन नहीं आती, वह उनके साथ गाँव में रह सकता है। अमित को भी गाँव देखना था, वह केवल एक या दो दिनों के लिए गया था, और उसे गाँव की बारिश बहुत अच्छी लगती थी। सब कुछ नया, भरी भरी नदियाँ, नहर, आँधियों से आम का टूटना, अमित अपने पापा से उनके बचपन की बातें सुनता तो उसका मन भी गाँव में खेलने का होने लगता था।
अमित जब शहर में था तब तक वह केवल अपने दो कमरे के फ्लैट में रहता था, स्कूल से आता, अपने दोस्तों के साथ खेलता और कब उसका दिन खत्म हो जाता उसे पता ही नहीं चलता था। स्कूल से आकर वह कार्टून देखता, दस साल का अमित छोटा भीम का बहुत शौक़ीन था। मगर गाँव आकर तो जैसे उसके सामने एक नई दुनिया ही सामने आ गयी। उसकी हवेली में एक किराएदार थे शांतनु चाचा। जो व्यापार तो पास के शहर में करते थे, मगर रहते उसके दादा दादी के साथ थे। शांतनु चाचा के घर दो गाय भैंस थी। वैसे तो वह बोर्नविटा के बिना दूध नहीं पीता था, मगर गाँव में आकर शांतनु चाचा के घर तो वह दो गिलास दूध पी जाता था।
अब उसे इंतज़ार था बारिश का। शिवम उसे बारिशों के किस्से सुनाता। शिवम उसे बताता था कि कैसे बारिश आते ही मोर नाचने लगते थे और कैसे उसकी गाय और उसका बछड़ा आपस में खेलने लगते थे। बारिश में नहरों में पानी बढ़ जाता था और नदी में तो और भी मजा आता। अमित ने अभी तक अपने अपार्टमेन्ट से ही बारिश को देखा था। माँ उसे बहुत ही कम छत पर जाने देती थी। सातवें फ्लोर पर उसका घर ग्यारह फ्लोर वाली बिल्डिंग में एकदम बीच में था। न तो वह बारिश में नीचे जा सकता था और न ही छत पर!
वह बस खिड़की से महसूस करता और सोचता कि कब वह बारिशों में भीगेगा! मगर शिवम उसे इन सबके साथ भूतों के भी किस्से सुनाता था। कि कैसे नदी के किनारे बने किले में बारिश में भूत आते थे, मेंढक की टर्रटर्र के साथ वे भी अपनी आवाज़ निकालते थे।
“दादी क्या बारिश में भूत भी आते हैं?” एक दिन जब दादी उसके बालों में तेल डाल रही थीं, तो उसने डरते डरते पूछ ही लिया था।
“भूत!” उसकी दादी बहुत जोरों से हंसी थीं। हँसते हँसते उन्होंने उसका मुंह अपनी तरफ कर के पूछा “किसने कहा ये सब तुमसे?”
अमित ने थोडा झिझकते हुए कहा “शिवम ने!”
“और वह यह भी कह रहा था कि बारिश में भूत ज्यादा आते हैं, और बच्चों पर अटैक करते हैं!”
“नहीं बेटा, ऐसा कुछ भी नहीं है! ये भूत प्रेत सब झूठ बात है! वैसे भी बारिश आने ही वाली है, तुम खुद ही देख लेना”
दो ही दिनों के बाद मौसम बदलने लगा था और बारिश की आहट सुनाई देने लगी थी। अमित बहुत खुश हो गया और बादलों की तरफ टकटकी लगाकर देखने लगा था। मगर बादल आए, आंधी में उड़ गए। अमित का जी उदास हो गया। दो तीन दिन बाद जब वह सोकर उठा तो उसने आंगन में अन्धेरा देखा, उसने घड़ी देखी, सुबह के आठ बज गए थे, मगर यह क्या अँधेरा? वह आँखें मलते हुए बाहर आया,
“दादी दादी!”
उसने देखा दादी तैयार हो रही हैं
“दादी आप कहीं जा रही हैं?” उसने दादी से लिपटते हुए पूछा,
“दादी बारिश आएगी क्या?”
“मौसम का क्या ठिकाना? मैं मंदिर जा रही हूँ, तुम्हारे बाबा चौपाल! तुम्हें चलना है तो चलो! वैसे हम लोग आधे घंट में आ जाएंगे!”
“नहीं दादी, आप लोग जाइये, मैं तब तक नहा लेता हूँ, जब आप आएंगी तब हम नाश्ता करेंगे!”
“ठीक है!” दादी ने उसके सिर पर लाड़ से हाथ फेरा और चली गईं
थोड़ी ही देर में आसमान और काला हो गया और जमकर बिजली चमकने लगी। अमित नहाकर तुरंत ही बाहर आ गया। बाहर आकर वह आंगन में आ गया! आंगन में रिमझिम बुहारें पड़ने लगी थी जो जल्दी ही मूसलाधार बारिश में बदल गयी! अमित के मन में शिवम की कही हुई बातें घुसने लगीं थीं। उसे एकदम से भूत का डर लगने लगा। आंगन में खड़े हुए उसने बाहर के पेड़ों को देखा, वे तेज हवा में इधर उधर झुकने लगे थे। अमित को लगा कहीं पेड़ पर चढ़कर ही भूत न आ गया हो! तभी एकदम से बिजली के बल्ब एकदम से बंद होने लगे, और जलने लगे, कमरे में पंखा भी अपने आप चलने लगा था। अमित डर के कारण कांपने लगा। वह बार बार हनुमान जी का जाप करने लगा था। बीच बीच में वह आँखें खोलकर देख लेता और फिर से जोर जोर से हनुमान जी का जाप करने लगता!
वह डर से चीखने ही वाला था कि तभी शांतनु चाचा दौड़ते हुए आए,
“अमित आओ तुम्हें गाय दिखाता हूँ! कैसे बारिश में वे लोग खेल रहे है!”
“चाचा देखिये न क्या हो रहा है, कमरे में भूत है!”
“अरे भूत कैसे?”
“देखिये न, बल्ब अपने आप बंद हो रहे हैं, जल रहे हैं! पंखा भी अपने आप ही चल रहा है!”
“अरे बेटा, कुछ और बात होगी, भूत कहीं होते हैं क्या?”  शांतनु चाचा ने उसे गले लगाते हुए समझाया
“नहीं चाचा, भूत ही है, शिवम ने कहा था बारिशों में भूत आते हैं!”
“भूत वूत कुछ नहीं होते हैं! आओ देखो!” वे उसका हाथ पकड़ कर बाहर की तरफ गए, जहां पर बिजली के वायर थे
उन्होंने एमसीवी को डाउन कर दिया, एकदम से अन्धेरा हो गया और सब शांत! एमसीवी में पानी चला गया था और उसके साथ ही एक दो कीड़े मकोड़े भी जाकर चिपक गए थे जिससे ये सब हो रहा था।
देखो, तुम तो पढ़े लिखे हो बेटा, आखिर किस लिए तुमने भूतों की बात पर भरोसा कर लिया!” शांतनु चाचा ने उसे समझाते हुए कहा 
“और इसके चक्कर में तुमने अपनी प्रिय बारिश को भी बदनाम कर दिया, तुम उसका आनंद भी नहीं उठा पाए, अब चलो तुम्हारा इंतजार गर्मागर्म पकौड़े कर रहे हैं!”
अमित भी शर्मिंदा हो गया, वह बारिश में भीगते हुए बोला “पकौड़ों को इंतजार करने दो, अभी मैं भीग रहा हूँ, और मैं बारिश में नहाना चाहता हूँ, अब कोई भूत वूत नहीं! केवल मैं और मेरी बारिश!”
भीगते हुए अमित को समझ में आ रहा था कि दादी सही कहती हैं कि भूत कुछ नहीं होता अब वह मन भर कर बारिश में भीग रहा था!

सोनाली मिश्रा

सोमवार, 27 मार्च 2017

यह प्रेम वह प्रेम



चौदह फरवरी का खुमार एक दिन बाद भी हवाओं में था, फिजाओं में था। आज भी चौदह फरवरी की तरह मॉल में भीड़भाड़ थी। दिल्ली से सटे वैशाली और वसुंधरा के मॉल आज भी उसी तरह गुलाबी और लाल फूलों और गुब्बारों से भरे थे। हाथों में हाथ लिए न जाने कितने युवा दिल आज भी अपनी भावनाओं का इज़हार करने के लिए मॉल में टिके हुए थे। तो कुछ लोग अभी भी हां और न की ऊहापोह में थे। इन सब चमक और दमक से परे माला ऑटो का इंतज़ार कर रही थी। घर में उसका बेटा उसका इंतजार कर रहा होगा! सुबह से शाम तक ऑफिस और घर के बीच में उसका बेटा पिसा जा रहा था। आलोक तो हमेशा ही रात को दस बजे से पहले नहीं पहुँचता था। उसके लिए तो प्यार केवल आधे घंटे की घटना होती थी। माला के लिए प्यार शायद अभी कहीं दबा हुआ था। माला इस समय ऑटो का इंतजार कर रही थी, मगर इस मॉल के आगे या तो भरे हुए औटो आ रहे थे या फिर बड़ी बड़ी कारें।
“उफ, रोज़ का ही यह काम है!” माला ने अपने मन में मिस्मिसाते हुए कहा!
“का हुआ मैडम जी, टम्पू न मिला?” पीछे से ऑटो वाले ने उसे ऊपर से नीचे तक देखते हुए पूछा
वैसे तो माला इन नज़रों से रोज़ ही दो चार होती थी, मगर आज उसे बुरी तरह गुस्सा आ गया! वह पॉइंट नॉएडा और मोहननगर के बीच का पॉइंट था। यहाँ पर रोज़ ही इतनी ही भीड़ होती थी, और ये टैम्पू वाले, ये तो सवारियों को इंसान समझते ही नहीं हैं। उनके लिए तो बस दस रूपए की सवारी ही होती थी। माला इन शेयर्ड टैम्पू में बैठने से बचती थी, वह नहीं बैठती थी, शेयर्ड ऑटो का इंतजार करती थी। माला के शरीर को ऊपर से नीचे तक अन्दर तक चीर देने वाली नज़र से एक बाद फिर से उसने पीछे की सीट पर इशारा किया “मैडम जी, बैठ जाओ, ऑटो न मिलेगा आज! जब जो मिले उसी से काम चलाओ!”
माला का मन हुआ कि उसे दो थप्पड़ लगा दे, आखिर हद होती है, मगर उसे इन लोगों के रैकेट का भी पता था। ये सब देखने में जरूर गरीब लगें, मगर सम्बन्धों में अमीर होते हैं। उसे याद है एक दिन एक लड़की ने एक टैम्पू वाले को थप्पड़ मार दिया था, तो सभी बाकी टैम्पू वाले अपने साथी की तरफ ही मुड़ गए थे। उस दिन का बवाल देखने के बाद, माला बहुत डर गयी थी, और उसे यह भी पता था कि आलोक तो उसे बचाने नहीं आएगा!
जैसे जैसे समय बढ़ रहा था, माला की चिंता बढ़ती जा रही थी। बेटा अब बेचैन होने लगा होगा!  माला को इस बेचैनी में आईलवयू कहता आलोक याद आता था।
लव, माला को हंसी आई! कितना भ्रामक शब्द है! ऑटो की आवाज़ से वह चौंक कर वर्तमान में आई! अब माला की आँखें मॉल के प्रवेश द्वार पर अटकने लगी थीं। कई लड़कियों ने छोटी ड्रेस भी पहन रखी थी और उनके कमर में हाथ डाले उनके बॉयफ्रेंड बिना किसी डर या संकोच के इधर से उधर सफर कर रहे थे। कुछ जोड़े मॉल में ही चुम्बन लीला में लीन थे।
“देख लो, ये हाल है आज की लड़कियों के? न जाने कैसे ये किसी का घर बसाएंगी?” माला के बगल में खड़ी हुई औरत ने मॉल के अंदर जाती हुई लड़कियों को देखकर कहा
“रहने दीजिए न, और जो घर की परवाह करती हैं, उन्हें क्या मिलता है?” माला ने उस महिला के अनर्गल हस्तक्षेप का जबाव देते हुए कहा। माला ने कंधे उचकाते हुए अपने आधे घंटे के प्रेम को याद करके कहा।
“जीने दीजिए न उन्हें अपनी ज़िन्दगी, आप और हम कौन होते हैं!” माला ने मोबाइल पर समय देखते हुए कहा। अब तो बात उसकी बर्दाश्त से बाहर हो रही थी, उसने सोचा कि थोडा आगे जाकर ही किसी ऑटो का इंतज़ार करे या फिर टैम्पू में ही चली जाए!
उस मोड़ पर इधर उधर कहीं से भी कोई गाडी आ जाती है। वह मोड़ बहुत ही खतरनाक और तीखा है, न जाने कितनी बार वह भी गिरते गिरते बची है। और आज तो भीड़ भी थी, वह बहुत सम्हलते हुए आगे बढ़ी। तभी सामने से नॉएडा की तरफ जाने वाले टैम्पू ने उस सड़क पर जिस तरह से एंट्री की, “सेक्टर बांसठ, तिरेसठ वाले, दस रुपया सवारी”, उससे न केवल माला चौंकी, बल्कि सामने से आ रहा एक प्रेमी युगल भी चौंक गया और लड़की नीचे गिर गयी! उसके हाथों में जो गिफ्ट आदि थे, वे वहीं सड़क पर फैल गए! लड़का इतने वाहनों की भीडभाड से घबराकर पीछे बैठ गया जबकि लड़की को न केवल चोट आई थी, बल्कि उसकी छोटी ड्रेस फटकर और भी छोटी हो गयी थी। वह घबराकर अपने मित्र को देख रही थी, मगर उसे हर तरफ केवल वाहनों की आवाज़ ही दिख रही थी। उसे अपना वह मित्र कहीं नहीं दिखा, जिसका हाथ पकड़ कर शायद उसने कुछ लम्हों को जिया होगा!
“देखा!” माला को कोहनी से टोकते हुए उसी महिला ने कहा
“ये होता ही आज का प्यार! चला गया न! चलिए, हम लोग आगे चलते हैं, यहाँ तो भीड़ बढ़ेगी अब!” उस महिला ने कहा। माला अब थक चुकी थी। आलोक का घर देर से आने का मेसेज उसके मेसेजबॉक्स में झाँक रहा था। माला ने चाहा कि वह उस लड़की को एक थप्पड़ मारकर कहे कि प्यार व्यार कुछ नहीं होता!
जैसे ही वे लोग दस कदम आगे बढे, एकदम से किसी गाड़ी में ब्रेक लगने की आवाज़ के साथ एक  मानव स्वर भी सुनाई दिया “मार डाला!” माला ने नज़र उठाई! “उफ, ये आज क्या हो रहा है!” उसने झुंझलाते हुए अपने मन से कहा।
माला की आँखों के सामने एक टूटा रिक्शा और उसका घायल रिक्शेवाला पड़ा था। उसके पैरों में चोट थी, रिक्शा टूट गया था और सामने सफेद स्कोर्पियो से एक जोड़ा उतर रहा था। नॉएडा से सटे हुए वैशाली और वसुंधरा इलाके में आईटी बूम के बाद नवधनाढ्यों की संख्या बहुत ही बढ़ गयी है। माला को हालाँकि बहुत ही देर हो रही थी, मगर फिर भी रिक्शेवाले के पैरों से बहते हुए खून और उसके टूटे हुए रिक्शे को देखकर वह आगे कदम बढ़ा न सकी!
“अबे साले, तुझे मरने के लिए मेरी ही गाड़ी मिली, ये गाडी में जो खरोंच आई है, उसका खर्चा तेरा बाप देगा क्या?” गाडी से उतरते ही उस लड़के ने रिक्शेवाले से कहा
“मालिक, माफी, बहुत भीर हथी, जगह ही नहीं थी, फिर भी मालिक माफी दय दयो!” वह अपने दर्द को जज़्ब करते हुए माफी मांग रहा था।
माला को बहुत गुस्सा आया। उसने तुरंत ही सौ नंबर को फोन लगाया और सारी शिकायत करने के बाद मैदान में कूद पड़ी! “मैडम, ये आपके मतलब का नहीं है, जाइए आप यहाँ से?” एक दो ऑटो वालों ने उसे पीछे करते हुए कहा
“क्यों, मेरे बस का नहीं है! मैंने पुलिस को फोन कर दिया है और जैसे ही पुलिस आएगी, जनाब की सारी हेकड़ी निकल जाएगी!”  माला ने उसे गुस्से से देखते हुए कहा
“अरे, काहे मैडम जी! बाउजी की कौन्हू गलती नहीं है! वो तो हमाओ जी बलंस बिगर गाओ” रिक्शेवाले ने माला से हाथ जोड़ते हुए कहा।।
माला उसका दर्द महसूस कर पा रही थी, मगर चूंकि कोई बड़ा आदमी नहीं गिरा था, तो अस्पताल पहुंचाने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था। उस गाडी वाले से माला ने कहा “उसका रिक्शा टूटा है, आप उसे पैसा दीजिए”
“पैसा और मैं, मैं अठन्नी नहीं दूंगा उसे!” स्कोर्पियो वाले ने माला की मांग ठुकराते हुए कहा
धीरे धीरे भीड़ बढ़ने लगी थी और उस गाड़ी वाले पर उस रिक्शेवाले को दवाई के पैसे और रिक्शे की मरम्मत के पैसे का दबाव बढ़ने लगा था। पुलिस के आते ही बाकी तो सब तितर बितर हो गए मगर माला ने न डरते हुए पुलिस को सारी बात बता दी!
“माई बाप, माई बाप, जाए छोड़ द्यो,” पीछे से एक महिला स्वर आया
माला ने एकदम से मुड़कर देखा, सांवले रंग की मझोले कद की सीधे पल्ले की साड़ी पहने करीब बत्तीस बरस की एक औरत उसके पीछे खडी थी। उसके माथे पर लाल रंग की बड़ी गोल बिंदी थी और मांग में सिन्दूर भरा हुआ था। लाल चूड़ी और सस्ती पायलें भी उसकी ख़ूबसूरती को बढ़ा रही थीं।
“तुम कौन?” पुलिस वाले ने पूछा
“हम, जे रमैया के महरारू। साहब, हमें कुछो न चाहिए! रमैया ठीक ठाक है, और का  चाहिए! जैसें ही सुनी, वैसे ही जे घोल बनाय के लाए, अब जे घोल लगाय दियें जा पे, एक ठो टिटनेस का इंजेक्शन होय जाइये, बस जे ठीक! जाने चोट दई है, बाके पैसन से इलाज न कराइए, जाके बदले में हम दोय घर को काम और पकड़ लियें!, साहब, हमाए बच्चन को बाप है जे, हमाओ सुहाग, हमाओ पियार, बाके खून को सौदा नहीं”
और उसने अपने साथ आए बच्चों के साथ मिलकर उसका रिक्शा उठाया और धीरे से उसे दूसरे रिक्शे पर बैठाया। माला के पास आकर उसने हाथ जोड़े “मैडम जी, आपने बात तो सही कही, मगर आप खुद ही बताओ, जाने तुम्हारे पियार को चोट दई होय, बाके घर को पानी पिय ल्यो तुम? न हम तो न? हम खुद ज्यादा मेहनत करके जाकी चोट सही कर लियें! नमस्ते मैडम!”
उस औरत के जाते ही माला एक सोच में पड़ गयी? यह औरत, अनपढ़ औरत, गंवार औरत, जमाने के लिए घर में काम करने वाली औरत, मगर प्रेम की परिभाषा रचने वाली औरत! माला को अब इन मॉल की चमक दमक में बसा हुआ प्यार बहुत ही फीका लगने लगा था

नया साल

फिर से वह वहीं पर सट आई थी, जहाँ पर उसे सटना नहीं था। फिर से उसने उसी को अपना तकिया बना लिया था, जिसे वह कुछ ही पल पहले दूर फेंक आई थी। उसने...