शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

बारिश का भूत



अमित फिर से डरने लगा था। बरसात के मौसम में फिर से उसे शिवम की बातें याद आने लगी थी। दादी मंदिर तक गईं थी और दादा जी चौपाल तक। बारिश आने से पहले गाँव में बिजली तो जाती ही थी, मगर इस समय तो अपने आप ही बल्ब जलने बुझने लगे थे। पंखा भी अपने आप ही चलने लगा था। आंगन में लगे हुए पेड़ पर बिजली के चमकने के साथ साथ पीले बल्बों की रोशनी भी साफ दिखने लगी थी। और उनसे अजीबोगरीब शक्लें बन रही थीं। अमित अपने कमरे में बैठा हुआ हनुमान चालीसा का पाठ कर रहा था, उसे खुद पर बहुत ही ज्यादा गुस्सा आ रहा था, आखिर उसे क्या जरूरत थी इतना हीरो बनने की? दादी ने कितना कहा था कि उनके साथ मंदिर चले, पर वह ही घर पर रहना चाहता था। उसे शिवम के साथ बातें करनी थीं। शिवम उसी की उम्र का था और वह उससे एक क्लास जूनियर था। तो अमित शिवम पर खूब रुआब गांठता था। वह उसे शहर के किस्से सुनाता और शिवम उसे गांव के। अमित उसे शहर के मॉल की बातें सुनाता और शिवम उसे गाँव, नदी, नहर और सबसे बढ़कर भूत के किस्से!

अमित के लिए दादा दादी के गाँव की दुनिया एकदम नई थी। कहाँ शहर में छोटी सी जगह में इतने सारे लोगों का रहना और यहाँ गाँव में इतनी बड़ी हवेली में कुछ ही लोग! घर में ही खूब दौड़ो भागो! इस बार छुट्टियों में उसके दादा ने जब उसे गाँव ले जाने की जिद्द की थी तो माँ ने भी उसे भेज दिया था। उसके यहाँ छोटी बहन आने वाली थी और माँ के लिए उसे सम्हालना, और उसके पीछे पीछे दौड़ना संभव नहीं था। दादी ने कहा जब तक एक दो महीने में अमित की छोटी बहन नहीं आती, वह उनके साथ गाँव में रह सकता है। अमित को भी गाँव देखना था, वह केवल एक या दो दिनों के लिए गया था, और उसे गाँव की बारिश बहुत अच्छी लगती थी। सब कुछ नया, भरी भरी नदियाँ, नहर, आँधियों से आम का टूटना, अमित अपने पापा से उनके बचपन की बातें सुनता तो उसका मन भी गाँव में खेलने का होने लगता था।
अमित जब शहर में था तब तक वह केवल अपने दो कमरे के फ्लैट में रहता था, स्कूल से आता, अपने दोस्तों के साथ खेलता और कब उसका दिन खत्म हो जाता उसे पता ही नहीं चलता था। स्कूल से आकर वह कार्टून देखता, दस साल का अमित छोटा भीम का बहुत शौक़ीन था। मगर गाँव आकर तो जैसे उसके सामने एक नई दुनिया ही सामने आ गयी। उसकी हवेली में एक किराएदार थे शांतनु चाचा। जो व्यापार तो पास के शहर में करते थे, मगर रहते उसके दादा दादी के साथ थे। शांतनु चाचा के घर दो गाय भैंस थी। वैसे तो वह बोर्नविटा के बिना दूध नहीं पीता था, मगर गाँव में आकर शांतनु चाचा के घर तो वह दो गिलास दूध पी जाता था।
अब उसे इंतज़ार था बारिश का। शिवम उसे बारिशों के किस्से सुनाता। शिवम उसे बताता था कि कैसे बारिश आते ही मोर नाचने लगते थे और कैसे उसकी गाय और उसका बछड़ा आपस में खेलने लगते थे। बारिश में नहरों में पानी बढ़ जाता था और नदी में तो और भी मजा आता। अमित ने अभी तक अपने अपार्टमेन्ट से ही बारिश को देखा था। माँ उसे बहुत ही कम छत पर जाने देती थी। सातवें फ्लोर पर उसका घर ग्यारह फ्लोर वाली बिल्डिंग में एकदम बीच में था। न तो वह बारिश में नीचे जा सकता था और न ही छत पर!
वह बस खिड़की से महसूस करता और सोचता कि कब वह बारिशों में भीगेगा! मगर शिवम उसे इन सबके साथ भूतों के भी किस्से सुनाता था। कि कैसे नदी के किनारे बने किले में बारिश में भूत आते थे, मेंढक की टर्रटर्र के साथ वे भी अपनी आवाज़ निकालते थे।
“दादी क्या बारिश में भूत भी आते हैं?” एक दिन जब दादी उसके बालों में तेल डाल रही थीं, तो उसने डरते डरते पूछ ही लिया था।
“भूत!” उसकी दादी बहुत जोरों से हंसी थीं। हँसते हँसते उन्होंने उसका मुंह अपनी तरफ कर के पूछा “किसने कहा ये सब तुमसे?”
अमित ने थोडा झिझकते हुए कहा “शिवम ने!”
“और वह यह भी कह रहा था कि बारिश में भूत ज्यादा आते हैं, और बच्चों पर अटैक करते हैं!”
“नहीं बेटा, ऐसा कुछ भी नहीं है! ये भूत प्रेत सब झूठ बात है! वैसे भी बारिश आने ही वाली है, तुम खुद ही देख लेना”
दो ही दिनों के बाद मौसम बदलने लगा था और बारिश की आहट सुनाई देने लगी थी। अमित बहुत खुश हो गया और बादलों की तरफ टकटकी लगाकर देखने लगा था। मगर बादल आए, आंधी में उड़ गए। अमित का जी उदास हो गया। दो तीन दिन बाद जब वह सोकर उठा तो उसने आंगन में अन्धेरा देखा, उसने घड़ी देखी, सुबह के आठ बज गए थे, मगर यह क्या अँधेरा? वह आँखें मलते हुए बाहर आया,
“दादी दादी!”
उसने देखा दादी तैयार हो रही हैं
“दादी आप कहीं जा रही हैं?” उसने दादी से लिपटते हुए पूछा,
“दादी बारिश आएगी क्या?”
“मौसम का क्या ठिकाना? मैं मंदिर जा रही हूँ, तुम्हारे बाबा चौपाल! तुम्हें चलना है तो चलो! वैसे हम लोग आधे घंट में आ जाएंगे!”
“नहीं दादी, आप लोग जाइये, मैं तब तक नहा लेता हूँ, जब आप आएंगी तब हम नाश्ता करेंगे!”
“ठीक है!” दादी ने उसके सिर पर लाड़ से हाथ फेरा और चली गईं
थोड़ी ही देर में आसमान और काला हो गया और जमकर बिजली चमकने लगी। अमित नहाकर तुरंत ही बाहर आ गया। बाहर आकर वह आंगन में आ गया! आंगन में रिमझिम बुहारें पड़ने लगी थी जो जल्दी ही मूसलाधार बारिश में बदल गयी! अमित के मन में शिवम की कही हुई बातें घुसने लगीं थीं। उसे एकदम से भूत का डर लगने लगा। आंगन में खड़े हुए उसने बाहर के पेड़ों को देखा, वे तेज हवा में इधर उधर झुकने लगे थे। अमित को लगा कहीं पेड़ पर चढ़कर ही भूत न आ गया हो! तभी एकदम से बिजली के बल्ब एकदम से बंद होने लगे, और जलने लगे, कमरे में पंखा भी अपने आप चलने लगा था। अमित डर के कारण कांपने लगा। वह बार बार हनुमान जी का जाप करने लगा था। बीच बीच में वह आँखें खोलकर देख लेता और फिर से जोर जोर से हनुमान जी का जाप करने लगता!
वह डर से चीखने ही वाला था कि तभी शांतनु चाचा दौड़ते हुए आए,
“अमित आओ तुम्हें गाय दिखाता हूँ! कैसे बारिश में वे लोग खेल रहे है!”
“चाचा देखिये न क्या हो रहा है, कमरे में भूत है!”
“अरे भूत कैसे?”
“देखिये न, बल्ब अपने आप बंद हो रहे हैं, जल रहे हैं! पंखा भी अपने आप ही चल रहा है!”
“अरे बेटा, कुछ और बात होगी, भूत कहीं होते हैं क्या?”  शांतनु चाचा ने उसे गले लगाते हुए समझाया
“नहीं चाचा, भूत ही है, शिवम ने कहा था बारिशों में भूत आते हैं!”
“भूत वूत कुछ नहीं होते हैं! आओ देखो!” वे उसका हाथ पकड़ कर बाहर की तरफ गए, जहां पर बिजली के वायर थे
उन्होंने एमसीवी को डाउन कर दिया, एकदम से अन्धेरा हो गया और सब शांत! एमसीवी में पानी चला गया था और उसके साथ ही एक दो कीड़े मकोड़े भी जाकर चिपक गए थे जिससे ये सब हो रहा था।
देखो, तुम तो पढ़े लिखे हो बेटा, आखिर किस लिए तुमने भूतों की बात पर भरोसा कर लिया!” शांतनु चाचा ने उसे समझाते हुए कहा 
“और इसके चक्कर में तुमने अपनी प्रिय बारिश को भी बदनाम कर दिया, तुम उसका आनंद भी नहीं उठा पाए, अब चलो तुम्हारा इंतजार गर्मागर्म पकौड़े कर रहे हैं!”
अमित भी शर्मिंदा हो गया, वह बारिश में भीगते हुए बोला “पकौड़ों को इंतजार करने दो, अभी मैं भीग रहा हूँ, और मैं बारिश में नहाना चाहता हूँ, अब कोई भूत वूत नहीं! केवल मैं और मेरी बारिश!”
भीगते हुए अमित को समझ में आ रहा था कि दादी सही कहती हैं कि भूत कुछ नहीं होता अब वह मन भर कर बारिश में भीग रहा था!

सोनाली मिश्रा

सोमवार, 27 मार्च 2017

यह प्रेम वह प्रेम



चौदह फरवरी का खुमार एक दिन बाद भी हवाओं में था, फिजाओं में था। आज भी चौदह फरवरी की तरह मॉल में भीड़भाड़ थी। दिल्ली से सटे वैशाली और वसुंधरा के मॉल आज भी उसी तरह गुलाबी और लाल फूलों और गुब्बारों से भरे थे। हाथों में हाथ लिए न जाने कितने युवा दिल आज भी अपनी भावनाओं का इज़हार करने के लिए मॉल में टिके हुए थे। तो कुछ लोग अभी भी हां और न की ऊहापोह में थे। इन सब चमक और दमक से परे माला ऑटो का इंतज़ार कर रही थी। घर में उसका बेटा उसका इंतजार कर रहा होगा! सुबह से शाम तक ऑफिस और घर के बीच में उसका बेटा पिसा जा रहा था। आलोक तो हमेशा ही रात को दस बजे से पहले नहीं पहुँचता था। उसके लिए तो प्यार केवल आधे घंटे की घटना होती थी। माला के लिए प्यार शायद अभी कहीं दबा हुआ था। माला इस समय ऑटो का इंतजार कर रही थी, मगर इस मॉल के आगे या तो भरे हुए औटो आ रहे थे या फिर बड़ी बड़ी कारें।
“उफ, रोज़ का ही यह काम है!” माला ने अपने मन में मिस्मिसाते हुए कहा!
“का हुआ मैडम जी, टम्पू न मिला?” पीछे से ऑटो वाले ने उसे ऊपर से नीचे तक देखते हुए पूछा
वैसे तो माला इन नज़रों से रोज़ ही दो चार होती थी, मगर आज उसे बुरी तरह गुस्सा आ गया! वह पॉइंट नॉएडा और मोहननगर के बीच का पॉइंट था। यहाँ पर रोज़ ही इतनी ही भीड़ होती थी, और ये टैम्पू वाले, ये तो सवारियों को इंसान समझते ही नहीं हैं। उनके लिए तो बस दस रूपए की सवारी ही होती थी। माला इन शेयर्ड टैम्पू में बैठने से बचती थी, वह नहीं बैठती थी, शेयर्ड ऑटो का इंतजार करती थी। माला के शरीर को ऊपर से नीचे तक अन्दर तक चीर देने वाली नज़र से एक बाद फिर से उसने पीछे की सीट पर इशारा किया “मैडम जी, बैठ जाओ, ऑटो न मिलेगा आज! जब जो मिले उसी से काम चलाओ!”
माला का मन हुआ कि उसे दो थप्पड़ लगा दे, आखिर हद होती है, मगर उसे इन लोगों के रैकेट का भी पता था। ये सब देखने में जरूर गरीब लगें, मगर सम्बन्धों में अमीर होते हैं। उसे याद है एक दिन एक लड़की ने एक टैम्पू वाले को थप्पड़ मार दिया था, तो सभी बाकी टैम्पू वाले अपने साथी की तरफ ही मुड़ गए थे। उस दिन का बवाल देखने के बाद, माला बहुत डर गयी थी, और उसे यह भी पता था कि आलोक तो उसे बचाने नहीं आएगा!
जैसे जैसे समय बढ़ रहा था, माला की चिंता बढ़ती जा रही थी। बेटा अब बेचैन होने लगा होगा!  माला को इस बेचैनी में आईलवयू कहता आलोक याद आता था।
लव, माला को हंसी आई! कितना भ्रामक शब्द है! ऑटो की आवाज़ से वह चौंक कर वर्तमान में आई! अब माला की आँखें मॉल के प्रवेश द्वार पर अटकने लगी थीं। कई लड़कियों ने छोटी ड्रेस भी पहन रखी थी और उनके कमर में हाथ डाले उनके बॉयफ्रेंड बिना किसी डर या संकोच के इधर से उधर सफर कर रहे थे। कुछ जोड़े मॉल में ही चुम्बन लीला में लीन थे।
“देख लो, ये हाल है आज की लड़कियों के? न जाने कैसे ये किसी का घर बसाएंगी?” माला के बगल में खड़ी हुई औरत ने मॉल के अंदर जाती हुई लड़कियों को देखकर कहा
“रहने दीजिए न, और जो घर की परवाह करती हैं, उन्हें क्या मिलता है?” माला ने उस महिला के अनर्गल हस्तक्षेप का जबाव देते हुए कहा। माला ने कंधे उचकाते हुए अपने आधे घंटे के प्रेम को याद करके कहा।
“जीने दीजिए न उन्हें अपनी ज़िन्दगी, आप और हम कौन होते हैं!” माला ने मोबाइल पर समय देखते हुए कहा। अब तो बात उसकी बर्दाश्त से बाहर हो रही थी, उसने सोचा कि थोडा आगे जाकर ही किसी ऑटो का इंतज़ार करे या फिर टैम्पू में ही चली जाए!
उस मोड़ पर इधर उधर कहीं से भी कोई गाडी आ जाती है। वह मोड़ बहुत ही खतरनाक और तीखा है, न जाने कितनी बार वह भी गिरते गिरते बची है। और आज तो भीड़ भी थी, वह बहुत सम्हलते हुए आगे बढ़ी। तभी सामने से नॉएडा की तरफ जाने वाले टैम्पू ने उस सड़क पर जिस तरह से एंट्री की, “सेक्टर बांसठ, तिरेसठ वाले, दस रुपया सवारी”, उससे न केवल माला चौंकी, बल्कि सामने से आ रहा एक प्रेमी युगल भी चौंक गया और लड़की नीचे गिर गयी! उसके हाथों में जो गिफ्ट आदि थे, वे वहीं सड़क पर फैल गए! लड़का इतने वाहनों की भीडभाड से घबराकर पीछे बैठ गया जबकि लड़की को न केवल चोट आई थी, बल्कि उसकी छोटी ड्रेस फटकर और भी छोटी हो गयी थी। वह घबराकर अपने मित्र को देख रही थी, मगर उसे हर तरफ केवल वाहनों की आवाज़ ही दिख रही थी। उसे अपना वह मित्र कहीं नहीं दिखा, जिसका हाथ पकड़ कर शायद उसने कुछ लम्हों को जिया होगा!
“देखा!” माला को कोहनी से टोकते हुए उसी महिला ने कहा
“ये होता ही आज का प्यार! चला गया न! चलिए, हम लोग आगे चलते हैं, यहाँ तो भीड़ बढ़ेगी अब!” उस महिला ने कहा। माला अब थक चुकी थी। आलोक का घर देर से आने का मेसेज उसके मेसेजबॉक्स में झाँक रहा था। माला ने चाहा कि वह उस लड़की को एक थप्पड़ मारकर कहे कि प्यार व्यार कुछ नहीं होता!
जैसे ही वे लोग दस कदम आगे बढे, एकदम से किसी गाड़ी में ब्रेक लगने की आवाज़ के साथ एक  मानव स्वर भी सुनाई दिया “मार डाला!” माला ने नज़र उठाई! “उफ, ये आज क्या हो रहा है!” उसने झुंझलाते हुए अपने मन से कहा।
माला की आँखों के सामने एक टूटा रिक्शा और उसका घायल रिक्शेवाला पड़ा था। उसके पैरों में चोट थी, रिक्शा टूट गया था और सामने सफेद स्कोर्पियो से एक जोड़ा उतर रहा था। नॉएडा से सटे हुए वैशाली और वसुंधरा इलाके में आईटी बूम के बाद नवधनाढ्यों की संख्या बहुत ही बढ़ गयी है। माला को हालाँकि बहुत ही देर हो रही थी, मगर फिर भी रिक्शेवाले के पैरों से बहते हुए खून और उसके टूटे हुए रिक्शे को देखकर वह आगे कदम बढ़ा न सकी!
“अबे साले, तुझे मरने के लिए मेरी ही गाड़ी मिली, ये गाडी में जो खरोंच आई है, उसका खर्चा तेरा बाप देगा क्या?” गाडी से उतरते ही उस लड़के ने रिक्शेवाले से कहा
“मालिक, माफी, बहुत भीर हथी, जगह ही नहीं थी, फिर भी मालिक माफी दय दयो!” वह अपने दर्द को जज़्ब करते हुए माफी मांग रहा था।
माला को बहुत गुस्सा आया। उसने तुरंत ही सौ नंबर को फोन लगाया और सारी शिकायत करने के बाद मैदान में कूद पड़ी! “मैडम, ये आपके मतलब का नहीं है, जाइए आप यहाँ से?” एक दो ऑटो वालों ने उसे पीछे करते हुए कहा
“क्यों, मेरे बस का नहीं है! मैंने पुलिस को फोन कर दिया है और जैसे ही पुलिस आएगी, जनाब की सारी हेकड़ी निकल जाएगी!”  माला ने उसे गुस्से से देखते हुए कहा
“अरे, काहे मैडम जी! बाउजी की कौन्हू गलती नहीं है! वो तो हमाओ जी बलंस बिगर गाओ” रिक्शेवाले ने माला से हाथ जोड़ते हुए कहा।।
माला उसका दर्द महसूस कर पा रही थी, मगर चूंकि कोई बड़ा आदमी नहीं गिरा था, तो अस्पताल पहुंचाने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था। उस गाडी वाले से माला ने कहा “उसका रिक्शा टूटा है, आप उसे पैसा दीजिए”
“पैसा और मैं, मैं अठन्नी नहीं दूंगा उसे!” स्कोर्पियो वाले ने माला की मांग ठुकराते हुए कहा
धीरे धीरे भीड़ बढ़ने लगी थी और उस गाड़ी वाले पर उस रिक्शेवाले को दवाई के पैसे और रिक्शे की मरम्मत के पैसे का दबाव बढ़ने लगा था। पुलिस के आते ही बाकी तो सब तितर बितर हो गए मगर माला ने न डरते हुए पुलिस को सारी बात बता दी!
“माई बाप, माई बाप, जाए छोड़ द्यो,” पीछे से एक महिला स्वर आया
माला ने एकदम से मुड़कर देखा, सांवले रंग की मझोले कद की सीधे पल्ले की साड़ी पहने करीब बत्तीस बरस की एक औरत उसके पीछे खडी थी। उसके माथे पर लाल रंग की बड़ी गोल बिंदी थी और मांग में सिन्दूर भरा हुआ था। लाल चूड़ी और सस्ती पायलें भी उसकी ख़ूबसूरती को बढ़ा रही थीं।
“तुम कौन?” पुलिस वाले ने पूछा
“हम, जे रमैया के महरारू। साहब, हमें कुछो न चाहिए! रमैया ठीक ठाक है, और का  चाहिए! जैसें ही सुनी, वैसे ही जे घोल बनाय के लाए, अब जे घोल लगाय दियें जा पे, एक ठो टिटनेस का इंजेक्शन होय जाइये, बस जे ठीक! जाने चोट दई है, बाके पैसन से इलाज न कराइए, जाके बदले में हम दोय घर को काम और पकड़ लियें!, साहब, हमाए बच्चन को बाप है जे, हमाओ सुहाग, हमाओ पियार, बाके खून को सौदा नहीं”
और उसने अपने साथ आए बच्चों के साथ मिलकर उसका रिक्शा उठाया और धीरे से उसे दूसरे रिक्शे पर बैठाया। माला के पास आकर उसने हाथ जोड़े “मैडम जी, आपने बात तो सही कही, मगर आप खुद ही बताओ, जाने तुम्हारे पियार को चोट दई होय, बाके घर को पानी पिय ल्यो तुम? न हम तो न? हम खुद ज्यादा मेहनत करके जाकी चोट सही कर लियें! नमस्ते मैडम!”
उस औरत के जाते ही माला एक सोच में पड़ गयी? यह औरत, अनपढ़ औरत, गंवार औरत, जमाने के लिए घर में काम करने वाली औरत, मगर प्रेम की परिभाषा रचने वाली औरत! माला को अब इन मॉल की चमक दमक में बसा हुआ प्यार बहुत ही फीका लगने लगा था

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

रानी का कमाल



रिया की आँखों से आंसू बह रहे थे थोड़ी देर पहले ही उसे लग रहा था कि वह इस जंगल से बाहर नहीं निकल पाएगी, मगर जंगल में रानी को देखकर वह चौंक गयी थी और रानी के पीछे पीछे वह जंगल से बाहर निकल आई थे। उसने रानी से कुछ कहना चाहा तो रानी ने कहा “अभी समय नहीं है, दीदी और मैं अकेली थोड़े ही न आई हूँ, मैं तो मोती के साथ आई हूँ, मोती यहाँ तक लाया है!” रिया आँखों में आंसू भरे मोती और रानी को देख रही थी। जंगल में काँटों से फंसकर उसके कपडे भी फट गए थे और उसे ठण्ड भी लग रही थी, वह चल भी नहीं पा रही थी। रानी ने उसे सहारा दिया, वह धीरे धीरे रानी के साथ मोती के पीछे पीछे चल रही थी। रिया को सब कुछ याद आ रहा था।
वह अपने मम्मी पापा के साथ दिल्ली से आई थी। दिल्ली में कितनी सुविधाएँ हैं, कितने बड़े बड़े पार्क थे, कितने बड़े बड़े मॉल! और उसके पास कितने सारे गैजेट हैं! उसके पास खुद का एक लैपटॉप है। मगर पापा की पोस्टिंग इस छोटे कसबे में होने से उसे भी कुछ दिनों के लिए यहाँ आना पड़ा था। रिया को याद आ रहा है कि कैसे उसने यहाँ की हालत देखकर मम्मी पापा के सामने आंधी तूफान मचा दिया था, पापा को दिल्ली के मुकाबले में इस शहर में बहुत बड़ा घर मिला था, मगर रिया तो कुछ सुनने के लिए ही तैयार नहीं थी।
“मम्मी, पापा आप लोगों को यहाँ रहना है रहिये, मैं नहीं रहूँगी!” पंद्रह साल की रिया को जरा भी यह समझ में नहीं आ रहा था कि वह कितनी बड़ी जिद्द कर रही है। रिया का कहना था कि वह शुरू से ही बड़े शहरों में रही है, वह कैसे छोटे शहर में रह सकती थी। पापा की जिद्द थी कि वे बड़ी होती रिया को अकेली दिल्ली में नहीं छोड़ेंगे! वैसे भी रिया की इस साल दसवीं की बोर्ड की परीक्षा थी और उसके बाद पापा का स्पष्ट कहना था कि रिया उनके साथ ही रहेगी और रिया के लिए उन्होने वहां का सबसे अच्छा स्कूल भी खोज लिया था। अब रिया का विरोध करना बेकार था।
जंगल में चलते चलते रिया बार बार रानी का हाथ पकड़ रही थी। वैसे भी रिया का हाथ रानी ने बहुत मजबूती से पकड़ रखा था, और वह उसे भरोसा दिला रही थी कि वह उसे कुछ नहीं होने देगी। रिया ने उसकाहाथ बहुत मजबूती से पकड़ रखा था और उसे याद आ रहा था वह दिन जब वह पहले दिन अपने स्कूल गयी थी। दसवीं में उसके बहुत ही अच्छे ग्रेड आए थे तो पापा की पोस्ट और अपने ग्रेड के साथ उसे स्कूल में तुरंत ही एडमिशन मिल गया था। रिया को अपना दिल्ली वाला स्कूल याद आ रहा था, वहां की सहेलियां, दोस्त और वहां की कैंटीन, जहाँ पर खूब बढ़िया बढ़िया खाने को मिलता था, दिल्ली के मॉल की चमक, वहां की रंगीनियाँ! सब कुछ! और अब इधर! वह क्या करे? रिया के मन में चिडचिडापन बहुत बढ़ गया था। उसे न तो पापा का प्यार दिख पा रहा था और न ही और कुछ! इधर वह कुछ दिनों से देख रही थी कि जैसे ही वह अपना लैपटॉप खोलकर बैठती थी, एक छोटी लड़की रानी उसके पास आकर खड़ी हो जाती थी। उससे दो तीन बरस तो छोटी रही ही होगी और उसके साथ आ जाता था मोती।
पता चला वह वहां की आया की बेटी थी, किसी सरकारी स्कूल में पढने जाती थी और दोपहर का खाना खाकर वापस आ जाती थी। उसके साथ ही उसका कुत्ता  मोती आ जाता था। रिया लंच के समय में अपना लैपटॉप लेकर कोने में आ जाती थी और वहीं वह स्टडी मैटेरियल खोजने लगती। कुछ प्रोजेक्ट्स के लिए स्कूल में कक्षा 11 और 12 के बच्चों को लैपटॉप लाने की अनुमति थी।
रिया को रानी की मासूम और कुछ खोजती आँखें पसंद तो आने लगी थीं, मगर जैसे वह उसके लैपटॉप की तरफ हाथ बढ़ाती, रिया उसे झिड़क देती। रिया को एक तो वैसे भी यह शहर पसंद नहीं था, यहाँ उसकी कोई सहेली नहीं थी, और दूसरी तरफ ये रानी आ जाती थी उसे परेशान करने के लिए।
ऐसे ही एक दिन वह उसके घर भी पहुँच गयी थी।
“तुम?” रिया उसे देखकर चौंक गयी थी!
“हाँ दीदी!” रानी ने उसे नमस्ते करते हुए कहा
रिया को बहुत गुस्सा आया था, “तुम यहाँ क्या कर रही हो?”
“दीदी, मैं आपका कंप्यूटर देखने आई हूँ, उसमें आपने बहुत सारी तस्वीरें सेव की हैं न, वो देखनी हैं!” रानी ने उससे कहा
“वो क्या है न, मेरे मोती को भी देखना है!” रानी ने बहुत मासूमियत से कहा
पीछे से मोती ने भौंक कर उसका समर्थन किया
रिया का बस चलता तो उसे भगा देती, मगर उसने अपनी माँ को अच्छी बेटी होने का प्रोमिस किया था जिससे वह कक्षा 12 के बाद यहाँ से जा सके, तो उसने रानी को अन्दर बुला लिया और उसे अपने लैपटॉप पर खूब तस्वीरें दिखाईं। रानी की बड़ी बड़ी आँखें और बड़ी हो रही थीं, आश्चर्य से! उसने अपने साथ आए मोती से कहा “ले देख ले, कभी देखी थीं ऐसी तस्वीरें! रंग बिरंगी! जितने रंग तुमने होली में न देखे, उतने रंग दीदी ने हमें दिखा दिए! वैसे भी अब अगले ही महीने तो होली है!”
“लो रानी शरबत पी लो!” रिया ने उसे शरबत देते हुए कहा
“दीदी, आप होली खेलती हो?” रानी ने पूछा
“हाँ, दिल्ली में हम सब खूब होली खेलते थे, तुम्हें पता हम लैपटॉप पर भी रंगों के साथ खेल सकते हैं!” रिया ने उसे लैपटॉप दिखाते हुए कहा
“दीदी, वह कैसे?” रानी की आँखें फिर से चौड़ी हो गईं!
“रुको!” रिया ने लैपटॉप गोद में रखते हुए कहा
“देखो!” रिया ने पेंट तस्वीरों को पेंट में खोला और उसमें रंग भर कर दिखाए और उसके बाद उसने फोटो व्यूअर में में भी रानी को तस्वीरें दिखाईं!
“अच्छा दीदी, अब मैं चलूंगी, कल आऊँगी तो भी क्या आप दिखाओगी?” रानी ने उससे पूछा
रिया का मन हुआ उसे डपट कर भगा दे, मगर वह ऐसा कर न सकी। उसने मुस्करा कर कहा “ठीक है, तुम जब भी आना चाहो आ जाना”
रानी खुश होकर चली गयी और उसके पीछे पीछे उसका मोती भी!
तीन चार दिनों तक रानी रोज़ आई और रिया ने उसे पेंट, फोटो व्यूअर आदि पर खूब तस्वीरों में रंग भरना सिखाया! रिया के लिए ये बड़े ही मजेदार दिन थे और रानी के लिए, उसके लिए तो जैसे एक नई दुनिया ही थी। पढाई में कमजोर रानी केवल तीन चार बार में ही रंग भरना और हटाना सीख गयी थी।
रिया को होली का वह दिन याद है जब वह बाहर बैठी बैठी रानी के साथ मोबाइल पर खेल रही थी। पापा और मम्मी कोलोनी में गए थे और तभी कुछ लोग रंग लगाए हुए आ गए थे। रिया और रानी के मन में उन्हें देखकर डर की एक लहर दौड़ गयी और वे अन्दर की तरफ दौड़ीं! रानी के हाथ में रिया का मोबाइल था, रिया को उन लोगों ने पकड़ा और अपनी जीप की तरफ बढ़ने लगे! रानी भी उनकी तरफ दौड़ी मगर वे जीप में थे, रानी केवल उनकी फोटो ही खींच पाई! मोती लेकिन उनके पीछे पीछे गया। रिया को धीरेधीरे समझ में आ गया कि उसको किडनैप कर लिया है। उस शहर के बाहर निकलते ही छोटा सा जंगल था। रिया को रास्ता नहीं पता था और उसे ये भी नहीं पता था कि पापा उस तक कब तक पहुचेंगे।
इधर रानी ने जैसे तैसे रिया के मम्मी पापा को खोजा और उन्हें सारी बातें बताईं! रिया के पापा तुरंत ही पुलिस के पास जाना चाहते थे, मगर वे फोन आने का इंतज़ार कर रहे थे।
“अंकल मैंने उनकी फोटो ली है, पुलिस के पास जल्दी चलते हैं!” रानी ने रिया के पापा को फोन देते हुएकहा
“मगर बेटा ये तो सब रंगे हुए चेहरे हैं!” रिया के पापा ने फोटो देखते हुए कहा
“अंकल आप चिंता मत करिए, दीदी ने मुझे सिखाया है, फोटो से रंग हटाकर उसे सही करना!” रानी ने रिया के पापा से कहा “अंकल इन तस्वीरों को अगर आप लैपटॉप पर कर देंगे तो मैं जल्दी से इनका चेहरा आपके सामने ला दूंगी!”
छोटे शहर की नन्ही तेरह साल की बच्ची पर रिया के पापा को यकीन तो नहीं हुआ मगर फिर भी उन्होंने तस्वीरों को लैपटॉप पर ट्रांसफर कर दिया।
नन्हीं नन्हीं उंगलियाँ लैपटॉप पर तुरंत चलने लगीं, जैसे किसी पियानो पर किसी वादक की उंगली चल रही हों। पांच ही मिनट में नन्हीं रानी ने उन लोगों के चेहरे उनके सामने रख दिए।
“अंकल अब आप ये तस्वीरें फोन में ले लीजिए और पुलिस के पास चलते हैं!”
रिया के पापा इस नन्ही बच्ची का कमाल देखकर हैरान थे, इधर वे लोग पुलिस के पास गए और रानी के पास मोती आ गया। वह रानी की फ्रॉक खींचने लगा।
“अंकल आप लोग पुलिस स्टेशन जाइए, मोती उनके पीछे गया था वह शायद दीदी की खबर लाया हो!” रानी ने रिया के पापा से कहा
“बेटा, तुम अकेली कैसे?” रिया की मम्मी ने पूछा
“आंटी मैं अकेली कहाँ, ये मोती है न!” कहती हुई रानी मोती के साथ भाग गयी
रिया उन लोगों से बचकर जंगल में भटक गयी थी। उसके कपडे भी फट गए थे। मगर उसकी दौड़ने की आदत ने उसे उन लोगों की पहुचं से दूर ला दिया था। अब उसे सड़क चाहिए थी जहाँ से वह जा सके, मगर वह भटक गयी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था,तभी उसे रानी की आवाज़ सुनाई दी थी। उसकी जान में जान आई!।
“सम्हल कर दीदी! देखिये सड़क आ गयी और आपके मम्मी पापा भी” रानी ने उसे सम्हालते हुए कहा
रिया की सांस में सांस आई
“बेटा, तुम ठीक तो हो न!” रिया की मम्मी ने उसे गले लगाते हुए कहा
“मम्मी मैं तो ठीक हूँ, मगर आप लोग?” रिया ने मम्मी से चिपटते हुए कहा
“ये तुम्हारी रानी है न, इसने सब कुछ आसान कर दिया। इसने उन लोगों की फोटो खींचीं थी, और फिर उन्हें लैपटॉप पर सही किया, हम उन तस्वीरों को लेकर पुलिस स्टेशन पहुंचे। पुलिस वालों ने उन्हें तुरंत पहचान लिया और एक को पकड़ पर तुम्हारा पता चला कि तुम इधर की तरफ भागी थीं।” रिया की मम्मी ने रिया को और चिपटाते हुए कहा
“हाँ, मम्मी! ये रानी वाकई में ही रानी है!” रिया ने रानी को गले लगाते हुए कहा
“अब से रानी भी रिया के स्कूल में पढने जाएगी और इसकी सारी फीस मैं भरूँगा!” रिया के पापा ने रानी को गले लगाते हुए कहा
रानी और मोती आज पूरे शहर के नायक बन गए थे! और रिया को समझ आ गया था कि छोटे शहर में सब कुछ छोटा नहीं होता, बहुत कुछ अच्छा होता है। इस बार की होली, उसके लिए नए रंग लेकर आई थी।

सोनाली मिश्रा


नया साल

फिर से वह वहीं पर सट आई थी, जहाँ पर उसे सटना नहीं था। फिर से उसने उसी को अपना तकिया बना लिया था, जिसे वह कुछ ही पल पहले दूर फेंक आई थी। उसने...