रविवार, 20 नवंबर 2016

मोदी सरकार के दो बरस और महिलाएं



नरेंद्र मोदी सरकार को आए दो बरस हो गए हैं और इन दो बरसों में आंकड़ों में कई बाजीगरी भी हो चुकी है. नरेंद्र मोदी सरकार में कुछ मंत्रालय हैं, जो बिना रुके और बिना मीडिया की नज़र में आए काम कर रहे हैं. इनमें से एक मंत्रालय महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय है, जिसमें तमाम क़दमों के साथ साथ राष्ट्रीय महिला नीति का भी मसौदा तैयार किया है. केंद्र में भाजपा सरकार के आने के बाद मंत्रालय की तरफ से कई नए कदम उठाए गए हैं. महिलाएं अब न केवल आधी आबादी हैं बल्कि वे महत्वपूर्ण वोटबैंक भी बन गयी हैं. केंद्र में भाजपा की सरकार आने से पहले महिलाओं को मोदी जी से काफी उम्मीदें थीं और उन्होंने उन उम्मीदों को पूरा करने के लिए मोदी सरकार के बनने में बहुत योगदान दिया और झोला भर कर वोट दिया. महिलाओं के मुद्दों को जो भी दल अपने घोषणापत्र में प्रमुखता से स्थान देगा, महिलाएं उसे झोली भर कर वोट देंगी. यह बात 2014 के चुनावों के बाद काफी हद तक हर विधानसभा चुनावों में देखी गयी है. दिल्ली में महिलाओं ने महिला सुरक्षा के नाम पर महिला कमांडों की नियुक्ति के लिए वोट दिया, तो बिहार में नितीश पर भरोसा जताया.
स्पष्ट है कि कोई भी दल अब महिलाओं की नाराजगी मोल नहीं ले सकता है.
मोदी सरकार ने पिछ्के दो वर्षों में महिलाओं को अपनी मुट्ठी में करने के लिए कई कदम उठाए है, जैसे:
*      पैनिक बटन ऑन मोबाइल फोन.
*      बेटी बचाओ, बेटी पढाओ
*      महिला – ई हाट
*      महिला हेल्पलाइन को एक साथ लाना
*      पंचायतों में महिला सरपंचों को प्रशिक्षण प्रदान करना
*      कार्यस्थल पर महिलाओं के शारीरिक उत्पीडन को रोकने के लिए अधिनियम
*      पुलिस बल में महिलाओं के लिए 33% का आरक्षण
*      100 वीमेन एचीवर्स कंटेस्ट
*      राष्ट्रीय महिला कोष
*      शादी वाली वेबसाईट को नियमों में बाँधना
*      राष्ट्रीय महिला नीति
इन उप्लाब्धियों के अतिरिक्त भी सरकार ने कई कदम उठाए हैं और योजनाएं शुरू की है जैसे, हाल ही में शुरू की गयी उज्ज्वला योजना. जिसमें सरकार की तरफ से गरीब महिलाओं को गैस के निशुल्क कनेक्शन दिए जा रहे हैं. इस योजना के अंतर्गत गरीबी रेखा के नीचे आने वाले करीब पांच करोड़ परिवारों को एलपीजी के निशुल्क कनेक्शन दिए जाएंगे. इस योजना को पेट्रोलियम और गैस मंत्रालय के द्वारा लागू किया गया है, जिसमें मुख्य लक्ष्य महिलाओं को सुविधा प्रदान करना है क्योंकि उन्हीं का समय सबसे अधिक रसोई में व्यतीत होता है.
इसके अतिरिक्त अगर और नजर घुमाएँ तो मुद्रा योजना ने महिलाओं को अपना रोज़गार शुरू करने में काफी मदद की है. मुद्रा योजना से सिलाई इकाइयों, ब्यूटी पार्लर, डेयरी फार्मिंग, हैंडलूम जैसे असंगठित क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी में इजाफा देखा गया है।

इसके साथ ही सरकार ने पंचायतों में भी महिलाओं के लिए 50% आरक्षण की व्यवस्था है.

वैश्वीकरण के इस युग में न केवल भारत बल्कि दुनिया के हर कोने में स्त्रियां घर से बाहर निकल कर अपनी पहचान बना रही हैं. हालांकि महिलाओं को पुरुषों के समान ही अवसर मिल रहे हैं, पर फिर भी भारत में कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां पर महिलाओं को अभी भी काफी उपेक्षा का सामना करना होता है. कई बार अकेली महिलाओं को समाज में रहने के लिए काफी संघर्ष का सामना करना होता है फिर चाहे वह घर किराए पर लेना हो, या अपने बच्चों के लिए सही स्कूल खोजना हो. 

अब बात की जाए महिलाओं के लिए महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय के द्वारा उठाए गए क़दमों की तो अभी हाल ही में महिलाओं के लिए नई राष्ट्रीय नीति का मसौदा प्रस्तुत किया है. इस नीति के बारे में बोलते हुए केन्द्रीय मंत्री श्रीमती मेनका गांधी ने स्पष्ट किया कि इस नीति में खास तौर पर अकेली, तलाकशुदा, विधवा महिलाओं को ध्यान में रखा गया है, और कार्यालय जाने वाली महिलाओं के साथ साथ घर से काम करने वाली महिलाओं को ध्यान में रखा गया है.”

इस नीति के कई बिन्दुओं में से कुछ को अगर देखें तो इसके आरम्भ में ही उद्देश्य स्पष्ट कर दिया गया है कि इस नीति का उद्देश्य है एक ऐसे सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक माहौल का निर्माण करना जिससे महिलाएं अपने मूलभूत संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग कर सकें और अपनी क्षमताओं को पहचान सकें. महिलाओं के लिए शिक्षा के बेहतर अवसर उपलब्ध हो सकें. लिंगानुपात में अंतर को कम करना.

इसमें प्राथमिक क्षेत्रों में स्वास्थ्य को रखा गया है, जिसमें भोजन की सुरक्षा एवं पोषण को उपलब्ध कराने की महत्ता पर जोर दिया है.

इस नीति में महिलाओं को उन क्षेत्रों में भी क़दमों को मजबूत करने की वकालत की गयी है जहां पर अभी तक महिलाओं के योगदान को नकारा है. ऐसे ही क्षेत्र में हम कृषि को ले सकते हैं. हम सब जानते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी केवल कृषि है तो वहीं कृषि में महिलाओं के श्रमदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता है. कृषि एक ऐसा क्षेत्र है जहां पर महिलाएं कमरतोड़ मेहनत करती हैं और उन्हें उनके श्रम का उपयुक्त मोल नहीं मिलता है. और यह भी देखा गया है कि महिलाएं अप्रशिक्षित होकर कार्य करती हैं, जबकि अगर उन्हें प्रशिक्षण दिया जाए तो वे कई कामों को और कुशलतापूर्वक कर सकती हैं. कृषि क्षेत्र में उतरोत्तर विकास के लिए बहुत जरूरी है कि वहां पर भी लैंगिक समानताएं को लाया जाए. अभी तक संसाधनों पर महिलाओं के अधिकारों को नहीं माना जाता था. इस नीति में ध्यान रखा गया है कि महिलाओं को न केवल संसाधनों पर हक़ मिले वहीं उन्हें सामाजिक सुरक्षा भी मिले.
कृषि क्षेत्र में महिलाओं के लिए तमाम तरह के प्रशिक्षण पर भी ध्यान दिया गया है. और प्रशिक्षण को इस योजना का हिस्सा बनाया गया है. कृषि क्षेत्र में महिलाओं को कई क्षेत्रों में प्रशिक्षण प्रदान करने की योजना है जैसे मृदा संरक्षण, डेयरी विकास, बागबानी, जैविक खेती, पशुपालन, मत्स्य आदि.
महिलाओं को अचल संपत्ति पर अधिकार के बारे में भी बात की गयी है.
इस नीति में किराए की कोख की विकराल होती समस्या पर भी ध्यान दिया गया है. यहाँ यह कहा जा सकता है कि भारत में यह कारोबार बहुत ही तेजी से फैल रहा है. आज यह एक सुनियोजित तरीके से काम करने वाला क्षेत्र हो गया है पर इसमें महिलाओं की स्थिति उतनी अच्छी नहीं है.
इस बारे में महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती मेनका गांधी का कहना है कि “सरोगेसी को लेकर एक क़ानून आएगा. जैसे ही हम इस नीति को अंतिम रूप प्रदान करेंगे और नई चीज़ों को जोड़ेंगे, वे उस नए सरोगेसी अधिनियम का हिस्सा बन जाएँगी.”
इस नीति में हर क्षेत्र की महिलाओं पर ध्यान दिया गया है और उनके अधिकारों के बारे में बात की गयी है जैसे सर्विस सेक्टर, विज्ञान और तकनीक, महिलाओं के खिलाफ हिंसा आदि.
इस नीति में महिलाओं से जुड़े हुए कई आंकड़ों पर गंभीरता से कदम उठाने की भी बात की गयी है.
इस नीति के बारे में श्रीमती मेनका गांधी का यह भी कहना है कि “इसमें महिला उद्यमियों के लिए एक महिला उद्यमी सेल का गठन भी किया जाएगा क्योंकि उद्यम क्षेत्र में अभी पुरुषों का अधिकार है”

हालांकि हाल के कुछ वर्षों में महिलाओं के लिए बनाए गए कानूनों के दुरुपयोग भी संज्ञान में आए हैं, जिनमें दहेज़ उत्पीडन एवं घरेलू हिंसा अधिनियम के दुरूपयोग पर माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी अपनी चिंता प्रदर्शित की थी एवं सुधार की बात कही गयी थी.

अगर मोदी सरकार के द्वारा उठाए गए क़दमों और इस राष्ट्रीय महिला नीति की बात करें तो कहा जा सकता है कि सरकारी स्तर पर महिलाओं के लिए तमाम कदम उठाए गए हैं.

उम्मीद की जा सकती है कि सफल क्रियान्वयन के लिए विख्यात सरकार अपने स्तर पर महिलाओं के तमाम मुद्दों पर खुलकर कार्य करेगी.


सोनाली मिश्रा
सी-208, जी 1
नितिन अपार्टमेन्ट
शालीमार गार्डन एक्स- II,
साहिबाबाद
गाज़ियाबाद




गर्भधारण और गर्भपात: स्त्री के अधिकार

गर्भधारण और गर्भपात: स्त्री के अधिकार

मातृत्व स्त्री का नैसर्गिक मानवाधिकार है और स्त्री का यह अधिकार सुरक्षित रहना ही चाहिए। स्त्री के पास यह अधिकार होना चाहिए कि वह कब गर्भधारण करना चाहती है। अधिकतर देशों में विवाह का मुख्य उद्देश्य वंश चलाना अर्थात संतानोत्पत्ति ही है।  यह भी एक विडंबना और विरोधाभास ही है कि जहां स्त्री के द्वारा जन्मदिए गए शिशु की प्रतीक्षा परिवार के साथ साथ समाज को भी होती है, वहीं स्त्री के स्वास्थ्य को एकदम से अनदेखा कर दिया जाता है। दुनिया भर के देशों में गर्भपात को लेकर तमाम तरह के क़ानून बने हुए हैं, जिनमें गर्भापात की स्थिति को स्पष्ट किया गया है। कुछ वर्ष पूर्व आयरलैंड में भारतीय मूल की सविता की असामान्य स्थितियों में मृत्यु ने पूरे विश्व में इस बहस को जीवित कर दिया था कि आखिर गर्भपात के लिए क्या समय सीमा होनी चाहिए और क्या क़ानून होने चाहिए। सविता की दुखद मृत्यु ने ही कैथोलिक आयरलैंड को आननफानन में एक ऐसा क़ानून बनाने के लिए बाध्य किया जिसमें विशेष परिस्थितियों में गर्भपात की अनुमति दे दी गयी।

ऐसे ही जीका वायरस की विभीषिका से जूझ रहे अमेरिकी देश ब्राजील में कैथोलिक चर्चों ने गर्भपात की अनुमति नहीं दी है और वहां पर गर्भपात के विरोध में एक विधेयक को भी पारित कर दिया गया है। वहीं कुछ लैटिन अमेरिकी देशों में महिलाओं से आग्रह किया जा रहा है कि वे गर्भधारण से परहेज करें। जीका वायरस से कई रूढ़िवादी कैथोलिक देश प्रभावित हो रहे हैं जहां गर्भपात को लेकर बहुत ही कठोर क़ानून है। यदि ऐसे में वे गर्भवती हो जाती हैं तो वे गर्भपात नहीं करा पाएंगी। जीका से प्रभावित कई देशों में गर्भनिरोधकों के प्रयोग की भी अनुमति नहीं है। ऐसे में स्त्रियों के समक्ष क्या विकल्प हैं या हो सकते हैं?

गर्भधारण की बात हो या गर्भपात का मुद्दा, अगर देखा जाए तो दुनिया के अधिकतर देशों का पलड़ा स्त्रियों के प्रति अन्यायपूर्ण ही दिखाई देता है। भारत की अगर बात करें तो एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर सात मिनट में कोई न कोई गर्भवती स्त्री प्रसव संबंधी कारणों से मृत्यु का शिकार बनती हैं। कुछ वर्ष पहले छत्तीसगढ़ में हुआ नसबंदी काण्ड कौन भूल सकता है जब कई स्त्रियों को चिकित्सीय लापरवाही के चलते अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। परिवार नियोजन के भी सभी प्रयोग केवल स्त्री के शरीर पर ही होते हैं, आखिर इस आनन्द में सहभागी रहे उसके साथी किसी भी उपाय का प्रयोग करने में क्यों हिचकिचाते हैं?

गर्भपात, एक ऐसा मामला है जो देश के कानूनों से अधिक धर्म से संचालित होता है। इस मुद्दे पर बात करते ही तमाम धर्म के ठेकेदार अपने अपने तर्कों के साथ यह स्थापित करने में लग जाते हैं कि गर्भपात से बढ़कर दुनिया में कोई पाप नहीं है। मनुस्मृति के अनुसार यदि अन्न पर गर्भपात करने वाले की द्रष्टि भी पड़ जाए तो वह अन्न अभक्ष्य हो जाता है, (मनुस्मृतिः 4.208)। ईसाई धर्म में तो गर्भपात को महापाप माना गया है और यह कैथोलिक देशों में देखा जा रहा है। इस्लाम में भी गर्भपात को हराम माना गया है।

गर्भपात का यह विषय देखने में जितना छोटा है, हकीकत में उसकी समस्या इससे कहीं विकराल है। असुरक्षित गर्भपात के चलते दुनिया भर में आज कितनी स्त्रियाँ अपना जीवन गंवा रही हैं, इसके आंकड़े शायद बहुत ही भयावह और विचलित कर देने वाले हैं। भारत में हालांकि गर्भपात का क़ानून कई देशों की तुलना में काफी संवेदनशील है और उसमें बलात्कार के परिणामस्वरूप गर्भधारण की स्थिति में गर्भपात की अनुमति है। भारत में भी कुछ वर्ष पूर्व निकिता मेहता का मामला सुर्ख़ियों में आया था जब भ्रूण में ह्रदय संबंधित विकार के कारण गर्भपात की अनुमति न्यायालय से माँगी थी, क्योंकि भ्रूण की आयु गर्भपात की अनुमत समयसीमा से अधिक हो गयी थी। हालांकि उस वक्त निकिता की यह अर्जी न्यायालय ने ठुकरा दी थी।

गर्भपात का मुद्दा न केवल स्वास्थ्य, क़ानून, धर्म के साथ जुड़ा हुआ है बल्कि यह स्त्री के अधिकारों के साथ भी जुड़ा हुआ है। भारत में 1971 से ही गर्भ का चिकित्सीय समापन (एमटीपी) क़ानून लागू है, जो गर्भपात को वैधानिक अधिकार देता है। पर यह स्त्रियों के लिए किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य चिंताओं के कारण नहीं बल्कि केवल और केवल जनसंख्या नियंत्रण की एक विधि के रूप में लाया गया था। यदि इस क़ानून का अध्ययन किया जाए तो यह निकल कर आएगा कि गर्भवती स्त्री यह नहीं कह सकती कि यह एक अवांछित गर्भावस्था है। स्त्रियों को तमाम तरह के स्पष्टीकरण देने होते हैं।  और गर्भपात पूरी तरह चिकित्सीय सलाह पर निर्भर करता है।

हालांकि गर्भपात के विरोधी इस बारे में काफी तर्क देते हैं कि अगर बच्चा नहीं चाहिए तो पहले से प्रयास करने चाहिए, जिससे गर्भ ठहर ही न पाए। यह सही है कि गर्भाधान को एक सुनियोजित तरीके से किया जाना चाहिए ताकि गर्भपात के कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर से बचा जा सके। पर अगर पूरी दुनिया में एक नजर दौडाएं तो पाएंगे कि परिवार में बच्चे के जन्म के लिए कई कारक उत्तरदायी होते हैं, जिनमें गर्भनिरोधक साधनों की खराब गुणवत्ता और असफलता से लेकर यौन हिंसा तक कई कारण हैं।  भारत में गर्भपात की समय सीमा अभी 20 सप्ताह है और इसे बढाने को लेकर विधेयक संसद में पिछले दो वर्षों से लंबित है जिस पर तमाम बहसें हो रही हैं।

कहा जा रहा था कि एमटीपी अधिनियम के लागू होने के बाद असुरक्षित गर्भपात की संख्या में कमी आएगी किंतु यह भी एक विरोधाभास ही है कि एमटीपी अधिनियम के लागू होने के बावजूद, असुरक्षित गर्भपात की संख्या में वृद्धि जारी है और हर साल लगभग 20,000 महिलाओं की गर्भपात संबंधी जटिलताओं के कारण मृत्यु हो जाती है, जिनमें से अधिकांश अयोग्य कर्मियों द्वारा, अवैध रूप से किए जाने से होती हैं।

गर्भपात के साथ एक और मुद्दा जुड़ा हुआ है वह है मादा भ्रूण हत्या का। एमटीपी के माध्यम से लड़कियों को गर्भ में ही मारना बहुत ही आसान हो गया था। पर 1994 में गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम भारत में प्रभाव में आया। इस अधिनियम के प्रभाव में आने के बाद हालांकि मातापिता को यह जानकारी देना अपराध हो गया है कि गर्भ में जो भ्रूण है उसका लिंग क्या है, किंतु अभी भी लिंग का चयनात्मक गर्भपात जारी है। बीबीसी की एक पुरानी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2006 तक भारत में प्रतिवर्ष ऐसे पांच लाख भ्रूण मार दिए गए थे जो लड़कियों के थे। उत्तर भारत में विशेषकर पंजाब और हरियाणा में लिंगानुपात सबसे कम है। स्पष्ट है कि तकनीक के ऐसे ही दुरूपयोग है जो गर्भपात के अधिकार को कम करने में सबसे बड़ा कारक हैं।

लिंग निर्धारण परीक्षण की निगरानी तो ठीक है पर गर्भपात की निगरानी एक एकदम ही भिन्न मुद्दा है। यह तो तय हो जाएगा कि अगर सरकार के द्वारा सभी गर्भ रजिस्टर कर लिए जाएं और गर्भपात पर नजर रखी जाए तो अवैध गर्भपात को रोकने में मदद मिलेगी। पर गर्भपात के लिए वैध कारण क्या है, इसका निर्धारण सरकार में कौन करेगा? भारत में अभी भी स्त्रियों का शारीरिक संबंध स्थापित करने की परिस्थितियों पर कोई भी नियंत्रण नहीं है। ये तो बस हो जाते हैं, अनायास, अचानक, और इसका परिणाम स्त्रियों के लिए पीड़ा से कम नहीं होते हैं। इसके साथ ही आज स्त्रियाँ कैरियर बना रही हैं, कई बार वे ऐसे चरण में होती हैं जहां पर वे अपने कैरियर से समझौता नहीं कर सकती हैं, वे एक और मानव जीवन की जिम्मेदारी लेने की अवस्था में नहीं है। अभी हाल ही में काफी मामले ऐसे आए हैं जब कैरियर के शिखर पर पहुंचकर बच्चा तो पैदा कर लिया पर बाद में उस बच्चे के कारण उत्पन्न कुंठा ने ही उस बच्चे की जान ले ली। स्त्रियां एक तरह के अवसाद में चली जाती हैं, जब उनके सामने ये दो विकल्प आते हैं कैरियर या बच्चा। बच्चा उन्हें अपनाना होता है जबकि कैरियर वे छोड़ना नहीं चाहतीं। इसी तरह कई बार स्त्री के सामने बच्चे की अवैधता भी एक प्रश्न होती है। सामाजिक और आर्थिक सुविधाएं भी महत्वपूर्ण होती हैं। अवांछित बच्चे को जन्म देकर स्त्री तो अपने जीवन की डोर उससे बांध लेती है पर उसे कितना पारिवारिक समर्थन मिलता है, यह भी देखना होगा। ऐसे में गर्भपात के लिए कौन से कारण वैध होंगे और कौनसे अवैध, यह निर्धारित करना बेहद ही मुश्किल कार्य है।

गर्भपात कभी भी सकारात्मक विकल्प नहीं होता है। गर्भपात से जुड़े कुछ और जटिल मुद्दों पर जाएं तो पाएंगे कि कई बार स्त्रियां अपने पति और परिवार के दबाव में आकर लिंग आधारित गर्भपात कराती हैं – यह अपनी मर्जी का तो फैसला होता नहीं है, यह एक अजन्मी स्त्री के जन्म लेने के अधिकार की भी लड़ाई है। स्त्री के गर्भपात की स्वतंत्रता को उसी के वंश को नष्ट करने के लिए उसी की कोख के माध्यम से प्रयोग किया जा रहा है।

जैसे ही गर्भपात का मुद्दा उठता है वैसे ही विरोध करने वाले इसे स्त्री की फालतू स्वतंत्रता से जोड़कर देखने लगते हैं, वे उसके दुरूपयोग की बातें करने लगते हैं। उनके अनुसार स्त्रियां गर्भपात को भी एक फैशन बना लेंगी।  उस समय विरोध करने वाले उस पीड़ा को एकदम भूल जाते हैं जो जटिलताओं के साथ पैदा हुए बच्चे और उसकी माँ को होती है। गर्भपात के अधिकार के लिए संघर्ष करने का अर्थ यह नहीं है कि स्त्रियों को ऐसी कोई दुनिया चाहिए जहां गर्भपात कराना सरल और गर्भपात एक आम बात होगी, पर हमें ऐसी तो दुनिया पाने का अधिकार है जहां पर गर्भावस्था पर हमारा नियंत्रण हो, हम उन स्थितियों को बदलने में सक्षम हों जिनमें अवांछित गर्भधारण की स्थिति आ सकती है।

हमारा कहना केवल इतना है कि जब भी स्त्रियों के लिए सरकार कोई भी क़ानून बनाती है उसमें स्त्रियों का पहलू भी सम्मिलित करे। उसमें उसे होने वाली मानसिक और शारीरिक पीड़ाओं को स्थान दें। इस दुनिया में आधी आबादी के तमाम अधिकारों को केवल धर्म की चादर में न समेट कर रख दें।  एक तरफ आप गर्भपात पर प्रतिबंध लगा रहे हैं वहीं दूसरी तरफ उन्हीं देशों में असुरक्षित गर्भपात की संख्याओं में निरंतर वृद्धि देखी जा रही है। स्त्रियों को उनके अधिकारों की तरफ आने तो दें, एक झरोखा खोलने तो दें। धर्म से परे भी उनका अस्तित्व है यह महसूस करने दें।


सोनाली मिश्रा
सी-208, G-1, नितिन अपार्टमेंट शालीमार गार्डन,
एक्स-II, साहिबाबाद,
ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश
फ़ोन – 9810499064


मंगलवार, 1 नवंबर 2016

मुक्ति

“चाय पीयेगी अन्वी” तान्या ने पूछा
“तानू, मैं यहाँ कैसे?”
“अन्वी, तू तो पिछले एक घंटे से ही यहां है?”
“सच में?” अन्वी के मन में जैसे एक ज्वालामुखी फटा.
मैं यहाँ कैसे? मैं कैसे आ गयी? मैं अविनाश के साथ थी, फिर यहाँ तान्या के घर? ओह मेरे साथ क्या हुआ था?
“तू यहाँ एक घंटे से है!”
“पर मैं यहाँ आई कैसे?”
“अपनी धन्नो से?”
“सीरियसली?”
“येस डियर”
“पर मैं तो अविनाश के साथ थी!” वह मुंह ही मुंह में बुदबुदा रही थी,
“अरे तू क्या बोलती और कहती है समझ में नहीं आता” तान्या ने कहा
“अच्छा एक बात बता, मैंने एक घंटे में तुमसे कुछ बातें की क्या?”
“नहीं!”
“तुम आईं और सो गईं, अब उठी हो! क्यों क्या हुआ?”
“कुछ नहीं यार, चल चाय पिला और फिर मैं घर जाऊं!”
“आर यू श्योर कि तुम जा पाओगी?”
“हां, यार बस चाय पिला दे”
“ओके”
अन्वी यही सोच रही थी कि वह क्या करे अविनाश ने जो कहा था वह उससे आगे की बात करे या मां के पास जाए. मां को मेरी जरूरत है. मां जिस मोड़ से गुजर रही हैं, उसमें उन्हें एक साथी की जरूरत है और वह खुद चाहती है कि वह अविनाश से शादी करने से पहले मां का घर बसा जाए. यही बात करने के लिए आज वह अविनाश के पास गयी थी पर वहां से जो उसे जबाव मिला था वह उसे हतप्रभ करने के लिए काफी था. वह चाहती थी कि उसके मां ने आज से दस बरस पहले उसके कारण शादी न करने का फैसला किया था वह बदल लें और अब शेखर अंकल से शादी कर लें. शेखर अंकल की आँखों में माँ के लिए बहुत प्यार देखा है.
उफ अविनाश! तुम ही मेरे इस फैसले में मेरे साथ नहीं हो? उसकी आँखों से आंसू बह निकले!
“सब कुछ ठीक है न!” तान्या ने चाय का कप रखते हुए कहा
“हाँ, यार, सब ठीक है!”
“देख यार, अगर कुछ भी बात है मन में तो बता. अविनाश के यहाँ से तू जिस हाल में आई थी, वह मुझे डराने के लिए काफी था. तुझे पता है, ऐसा तो हाल तब भी नहीं होता जब मैं एक बोतल बियर चटका लेती हूँ!”
“तू भी न तान्या, बस  हर समय तुझे पीने की लगी रहती है!” अन्वी ने प्यार से झिड़का.
उसे तान्या का यही चुलबुला स्वभाव पसंद है. एक खदबदाते हुए कोल्डड्रिंक जैसी है तान्या. जो अपने प्यार से सबको समेटे रहती है. माँ के बाद वह केवल तान्या के नज़दीक है. वह तान्या को यह बात बताए या नहीं? वह समझ नहीं पा रही. आखिर माँ की शादी में अविनाश को समस्या क्या है? वह अविनाश को सोचती जा रही है और अपनी मंगनी की अंगूठी को घुमाती जा रही है जैसे बहुत कुछ सोच रही हो. ओह, ये क्या? अंगूठी ढीली थी, हां जैसे उसका और अविनाश का रिश्ता, एकदम ढीला, कहीं से कोई भी हिला सकता था.  ओह, वह क्या करे? वह क्या करे? उधर अंगूठी उसके हाथ से फिसलने ही वाली थी कि तान्या आ गयी.
“ओह, तो मैडम, कुछ सोच रही हैं?, इस सोच में अविनाश बाबू तो गए! बेचारे अभी गिर जाते!”
“क्या तान्या? मेरा मन अजीब है!”
“क्या हुआ मेरी जान, वोदका दूं तब बताएगी क्या या चाय से ही उलट देगी अपने मन की बात!”
“यार, तू जानती है कि मैं नहीं पीती!”
“तो पी ले, फिर तो तेरी शादी उस संस्कारी अविनाश से हो ही जानी है, तेरा आदर्श पति, फिर तो तू कोल्डड्रिंक में ही शर्माएगी, तो फिर ये हरी परी का क्या होगा?”
“ओह अविनाश!” वह रो पड़ी
“अरे अन्वी क्या हुआ? तू मान न मान कुछ तो हुआ है! अब तू मुझे बताएगी या मैं खुद अविनाश से पूछूं?”
“न वह फोन नहीं उठाएगा!”
“अरे ऐसा क्या?”
“सुन, तुझे पक्का याद है कि मैं यहाँ एक घंटे से हूँ?”
“हां यार!”
“चलूं फिर, माँ चिंता कर रही होगी?”
“पर हुआ क्या है?”
“कुछ नहीं, मेरी धन्नो सही है?”
“हां, वह वहीं पर खडी है जहां पर वह होती है”
“और चाबी?”
“वह भी वहीं, माने अपनी जगह दरवाजे पर”
“ओह, चल मैं चलूँ! माँ को भी पता नहीं था कि मैं अविनाश से मिलने जाऊंगी”
जैसे ही उस वन रूम अपार्टमेंट से बाहर निकली अन्वी, वैसे ही जून की लू ने उसका स्वागत किया. अन्दर तक हुलस गयी. पर उसकी यह जलन अविनाश के शब्दों की तुलना में बहुत हल्की थी, वह तो अपनी आत्मा को जलाकर आई थी. अविनाश के साथ की ठंडी दोपहर में, अपने मन की बात कहने पर जैसे उसे थप्पड़ सा लगा था,
“यू ब्लडी सेल्फ डिपेंडेंट औरतें?”
“अविनाश, ये तुम क्या कह रहे हो?” अन्दर तक कहीं चटकन को समेटते हुए उसने पूछा था
“और क्या, मतलब ये भी कोई बात होती है करने के लिए? कमाती हो तो क्या ऐसी फालतू बात बोलोगी?”
“मैंने क्या गलत कहा?”
“क्या गलत नहीं है?, अरे यार हमारे धर्म में ये चलता ही नहीं है जो तुम कह रही हो?”
“तो मना भी तो नहीं है हमारे धर्म में?”
“क्या मना नहीं है? यार किसी शादीशुदा औरत का दोबारा शादी करना मना है, वह भी तब जब उसका पति जिंदा हो और तलाक भी नहीं हुआ हो”
“तुम माँ को सुहागन मानते हो?, क्या केवल सिन्दूर लगाने से ही माँ सुहागन है? वाह,”
“चुप रहो यार!”
“अविनाश, समझो यार, मेरे जाने के बाद माँ अकेली रह जाएगी. क्या करेगी वह?”
“करेगी क्या, अगर मन हो तो तुम्हारे पास रहे और अगर मन है  तो तुम्हारे पापा के पास चली जाए. आखिर तुम्हारी माँ बीवी तो उनकी ही है न!”
“अविनाश, ओह, तुम भी? तुम भी माँ को केवल मेरे पापा की बीवी ही मानते हो. तुम उन्हें अलग नहीं देख सके, वेल एजुकेशन के बावजूद, तुम्हें पता है मेरी माँ दस साल से एक झूठे सिंदूर के साथ है, सरिता आंटी के पापा की ज़िन्दगी में आने के बाद वे कभी मेरे पास नहीं आए, शैली आंटी के बच्चों को वे अपने बच्चे मानते हैं, मुझे तो केवल नाम के लिए अपना नाम दिया है. अगर कहीं त्याग है तो वह मेरी माँ ने किया है, दस साल, दस साल अविनाश!”
“ये क्या दस साल दस साल लगा रखा है, आखिर अंकल ने आंटी को तलाक तो दिया नहीं है, तो फिर वह वहीं जाकर क्यों नहीं रह सकती?, आधे घर में वह रह लेंगी”
“छि अविनाश! आज तुमसे मुझे नफरत सी हो रही है, जो औरत को केवल आदमियों की एक पूंजी सोचता है. औरतें अलग होती है, उनका अस्तित्व अलग होता है”
“यही एटीट्युड रहा होगा, आंटी का तभी अंकल वापस नहीं आए कभी, एक अकेली लड़की जनी और दूसरा ये घमंड, अमा यार, ये तुम औरतें कैसे ऐसी हो सकती हो”
“अविनाश” वह रो पड़ी थी, उसे लग रहा था कि अविनाश उसे सम्हालेगा, मगर उसने उसे सम्हाला नहीं!
“अरे यार, तुम रो क्यों रही हो, क्या मैं तुम्हें छोड़ सकता हूं, बचपन से केवल तुम्हें ही प्यार किया है, याद करो, कैसे तुम्हारे साथ खेलता था”
अविनाश ने उसका मूड सही करने के लिए मजाक किया. पर वह अन्दर तक टूटने लगी थी. ओह, इस आदमी के साथ अपनी ज़िन्दगी बिताने जा रही है, ढीली अंगूठी उसकी गर्दन पर फंदा बनकर कसने लगी थी, वह अविनाश के शब्दों की रस्सी से खुद को बंधा हुआ पा रही थी, जैसे पापा ने उसके पैदा होने के बाद एक नई दुनिया बसा ली थी और एक बेटा न दे पाने के कारण माँ को कभी माफ नहीं कर सके थे, वैसे ही किसी छोटी बात पर अविनाश उसे भी छोड़ कर जा रहा है और वह माँ के कंधे पर सिर रखकर रो रही है. ओह, ओह! अविनाश, संस्कारों की बात करने वाला अविनाश, मॉडर्न वेशभूषा में भी परिवार को अपना सर्वस्व मानने वाला अविनाश, ऐसा था! उसकी माँ ने केवल उसके लिए कि उसे पिता का नाम मिलता रहे, तलाक नहीं दिया था और खुद एक छोडी हुई औरत का तमगा लगा लिया था. माँ को जब शैली आंटी के बेटा होने का पता चला था तब से वे मुक्त सी हो गयी थी, ऐसा लगता था जैसे उनके दिल पर एक बोझ था वह भी हट गया था. माँ को कभी रोते हुए उसने नहीं देखा था, पापा के जाने के बाद तो बिलकुल ही नहीं. जब वह बारह बरस की हो गयी थी और उसके सामने माँ पांच बार तीन तीन महीने गर्भवती होकर गर्भपात का शिकार हुई, तो जैसे घर में शमशान जैसी मुर्दानगी छा गयी थी. ऐसे में शैली आंटी से शादी का प्रस्ताव आने पर माँ ने सहर्ष अनुमति दे दी थी. अपने शरीर के साथ और चीराफाड़ी करने के पक्ष में माँ नहीं थी और नहीं थी वह ऐसे आदमी के साथ रहने में जो केवल बेटा न होने देने के कारण उनके शरीर के साथ हर दूसरे साल प्रयोग करता था. माँ, ने केवल यह घर माँगा था और उसकी शादी तक तलाक न लेना. ये दोनों ही शर्तें पापा और शैली आंटी को मंजूर थी. कैसा रहा होगा माँ का दर्द. उसे याद है जब भी वह पापा के बारे में पूछती तो माँ उसे पापा के पास जाने के लिए कभी मना नहीं करती थी, लेकर जातीं और जब शैली आंटी के गर्भवती होने की सूचना मिली तो माँ ने उनका बहुत ख्याल रखा. माँ ऐसा क्यों करती थी? अन्वी कभी पूछ नहीं पाई? माँ ने हमेशा दिया, और अपनी ज़िन्दगी से समझौता करने से बची. माँ का यह निर्णय पापा को भी परेशान करता था. पर वे खुश थे, अपनी नई ज़िन्दगी में, शैली आंटी के साथ. माँ हमेशा मुक्त होने की बात करती थी, ये कैसी मुक्ति थी, माँ उधार में हंसती थी, ये किसका उधार था? माँ हमेशा कहती “बस.........”
वह माँ की इस बस में उलझ जाती! आखिर यह बस क्या था? वह बेचैन रहती, अजीबो गरीब तरह से बेचैन रहती. कभी कभी इधर से उधर चक्कर काटती, बोलती, “मुक्ति दे दो प्रभु, मुक्ति दे दो”, ओह, माँ की मुक्ति की अवधारणा उसे समझ में नहीं आई थी. जिस दिन शैली आंटी के बेटा होने की खबर सुनी, माँ ने मेरे सिर पर हाथ फिराया और कहा “ओह, मुक्ति! आखिर तुम आ ही गयी”
उस दिन उसने माँ के चेहरे पर अजीब खुशी देखी जैसे बुद्ध के चेहरे पर ज्ञान बोध होने के बाद आई होगी. माँ का चेहरा देखकर उसे लगता कि वह एक लम्बा सफर तय करके आई हैं और आराम करना चाहती हैं. उसे माँ में बुद्ध की शांति देखकर लगता कि इस शांति का आखिर कारण क्या है? बेटा शैली आंटी के हुआ और मुक्ति माँ को? उसने कई बार पूछना चाहा, पर माँ ने हमेशा कहा “समय के साथ तुम्हें पता चल जाएगा, कुछ सवालों के जबाव हमेशा समय में होते हैं” माँ ऐसी ही थी. अविनाश को वह बहुत पसंद करती थी,जब से उन दोनों का एडमिशन इंजीनियरिंग में एक साथ हुआ था. उन तीन चार सालों में अविनाश न केवल उसके बल्कि माँ के भी नजदीक आया. नौकरी करते हुए माँ को अब बीस बरस हो चले थे. उसकी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरे होते ही माँ ने अविनाश को लेकर उसका मन टटोला और उसकी तरफ से हां पाकर, माँ ने पापा से बात करके अविनाश के घर रिश्ता भेजा था. पारिवारिक संरचना के बारे में थोड़ी सी झिझक के बाद हां हो गयी थी. उसे याद है अविनाश ने उसकी माँ की तरफदारी करते हुए अपने माँपिताजी से कैसे बात की थी. अविनाश ने कहा था
“जो भी हुआ, उसमें अन्वी की माँ की क्या गलती है?’
“बेटा नहीं जना है उसने!, उसकी बेटी भी बेटियाँ ही देगी!”
“ओफो माँ, आप लोग भी कैसी बात करते हैं! आज के जमाने में! लड़के और लड़की में फर्क है क्या?”
“देख लो बचवा, अब बाद में हमसे न कहना कि चेताया न था, देखो हमें तो चाहिए ही चाहिए बेटा एक, अब तुम देख लो”
“ओहो माँ, ऐसा कुछ नहीं होगा!”
पापा ने ईमानदारी से सब कुछ बता दिया था, शैली आंटी ने भी बढ़ चढ़ कर इस सगाई में हिस्सा लिया था, आखिर उन्हें तो इस दिन का बरसों से इंतज़ार था. कुछ महीनों के बाद उनका असली गृह प्रवेश होना था. उसकी शादी की तैयारी करते करते माँ खो जाती, वह उस घर को देखती. हर कमरे में झांकती. उसके बचपन की छाँव बिलोती, फिर चाबी में बंद कर उन सबको अन्वी को ही दे देती.
“ओहो माँ, ये घर मुझे नहीं चाहिए, तुम रहना यहाँ”
“न अन्वी, ये तुम्हारा घर है. तुम्हारे पापा से मैंने ये घर तुम्हारे नाम पर करवा लिया था. अब तुम्हारी शादी हो तो मैं इस कर्ज से मुक्त होऊँ!”
“माँ, तुम कहाँ जाओगी?”
“अरे पागल, मैं! मैंने इंतजाम कर लिया है, हां, इतना बड़ा घर नहीं है, पर वन रूम सेट है. वहा पर मेरी जरूरत का सारा सामान होगा. तुम्हें भी दिखाऊंगी, आखिर मुझसे मिलने तो आओगी ही!”
उसे अपनी माँ का स्वाभिमान बहुत प्रिय था. उसी स्वाभिमान के कारण वह उसके पापा के साथ नहीं रही थी, ये घर उसका था, यह वह अविनाश के सामने भी कह देती थीं.
“ओ मैडम! कहाँ खो गईं?”
अतीत के सफर से बाहर वह निकल आई!
“देखो, यार तुम समझो, तुम्हारे पापा ने जो भी किया, वह अपने बेटे के लिए किया! अब अगर तुम्हारी माँ उन्हें बेटा दे देती तो क्या वे पागल थे दो दो गृहस्थियों का  बोझा उठाते? आखिर दो दो घर चलाना हंसी खेल तो है नहीं”
ये कौन से अविनाश से वह मिल रही थी. यह तो वह अविनाश नहीं था, यह तो कोई और ही था. उसके शरीर से आने वाली गंध तो वही थी, पर उसकी बातें? उसके विचार? ओह, ये कौन है? ये कौन है? वह पागल हो रही थी!
“यार, तुम न इमोशनल हो रही हो! तुम्हारी माँ कहीं भी रह लेंगी, इतने सालों से नौकरी कर रही हैं, पैसा तो होगा ही उनके पास, एक फ्लैट खरीद लेंगी, नहीं तो शैली आंटी के साथ रह लेंगी. आखिर शादी के बाद तुम्हें भी तो कोई मायका चाहिए होगा? ये घर तो हमारा होगा डार्लिंग! अब तुम्हें भी रस्में निभाने के लिए पापा मम्मी के पास ही जाना होगा न!”
ये अविनाश ही है, ओह! तभी माँ जब बोलती थी ये घर उसका है, तो अविनाश का चेहरा खिल जाता था! वह माँ के आगे बिछ बिछ जाता था. ये घर का चक्कर था क्या? उफ, ये क्या कह रहा है अविनाश! ये क्या कर रहा है अविनाश! उसे लग रहा था कि जैसे उसे बुखार चढ़ रहा है, वह अजीब से ताप का शिकार हो रही है. उस एसी में उसे लग रहा था कि वह जल रही है, उसके शरीर पर वही नीम्बू के पेड़ के कांटें चुभ गए हैं जो साइकिल सीखते समय उसके गिरने पर उसके शरीर पर चुभ गए थे और उसने बहुत ही मुश्किल से अपने हाथों पैरों से उन काँटों को निकाला था. उसके बाद जो जलन हुई थी वह नाइसिल से भी नहीं गयी थी. माँ को तो बताया ही नहीं था.
वैसी ही चुभन वह अपने गले में महसूस कर रही थी, उसके मुंह से एक भी शब्द नहीं निकल रहा था, ये उसका ड्रीम बॉय था. ओह अविनाश, ओह, वह रो रही थी. पर अविनाश तो जैसे कुछ समझ ही नहीं रहा था.
“देखो, तुम्हारे पापा की दूसरी शादी को तो लोग मान लेंगे, पर माँ! माँ की शादी? पागल हो क्या? मैं क्या मुंह दिखाऊंगा अपने घर वालों को? क्या कहूँगा कि ये मेरे नए ससुर हैं? अरे तुम समझ नहीं रही हो! अभी केवल तुम ही हो अपनी माँ की पूरी जायदाद की वारिस, उनकी शादी के बाद वह उनके नए परिवार में चली जाएगी! अबे पागल औरत, तू समझ क्यों नहीं रही है”
अविनाश की आवाज़ तेज हो रही थी. जब से उसने शेखर अंकल और माँ की शादी की बात की थी.
“वो, बुड्ढा ठरकी आदमी, तभी मैं सोचूँ तुम्हारे घर पर इतना क्यों आता है? आखिर तुम्हारी माँ पर डोरे डाल रहा है, बूढ़ी औरत बेटी की शादी के बाद अकेली हो जाएगी, और वह उसकी जायदाद पर अधिकार जमा लेगा”
अविनाश के चेहरे पर अजीबोगरीब भाव आ रहे थे.
“सुनो, यार, तुमने आज क्या रट लगा दी है, माँ और शेखर अंकल की शादी?”
अविनाश मैं तुम्हें कैसे समझाऊँ, मैंने माँ जैसी स्वाभिमानी औरत नहीं देखी है. हमेशा दिया ही है, लिया कुछ नहीं. अब उनके लिए करने का समय आया है तो क्या मैं उनके लिए इतना नहीं कर सकती?”
“नहीं कर सकती, सुना तुम नहीं कर सकती? एक औरत इस उम्र पर शादी नहीं कर सकती!, और अगर तुमने दोबारा ऐसा सोचा भी तो अपने लिए भी शेखर अंकल जैसा ही खोज लेना”
ओह अविनाश, तुम ऐसे निकलोगे? कभी सोचा नहीं था. गर्म दोपहर में वह न जाने कितनी देर तक वहीं खड़ी रही थी. और न जाने कैसे भावों के साथ वह पहुँच गयी थी तान्या के घर पर. न उसे अपना होश था और न ही खबर, वह कैसे जिएगी उस आदमी के साथ जिसके ऐसे विचार हैं? ओह, वह अपनी स्कूटी उठाकर चल पड़ी थी, और उसे होश आया था, तब भी क्या उसे होश आ पाया था? वह क्या करे? उस गर्म दोपहर को कैसे वह ठंडी शाम में बदले! एक तरफ उसकी उंगली में पड़ी अंगूठी है तो दूसरी तरफ उसकी माँ की जिंदगी, उस माँ की जिसने उसके लिए अपनी हर इच्छा त्याग दी, ऐसी ज़िन्दगी जी, जो उसकी नहीं थी! उसे लग रहा है माँ का अकेलापन, उसका इस घर से जाना, एक छोटे घर में माँ को बुढ़ापे की सीढियों की तरफ अकेले चलना. उसका अपनी नई ज़िन्दगी में प्रवेश और माँ? वह? उसका क्या? पापा और शैली आंटी का कानूनन एक होना! उसकी माँ क्या करेगी? और वह? ओह, अविनाश तुम ऐसे निकलोगे?
अपनी माँ और अपनी खुशियों में से माँ का पलड़ा उसे भारी लगने लगता! माँ, क्या करे वह, क्या करे?
आंसू पोंछकर वह घर की तरफ चली थी,
“अरे अन्वी, कहाँ थी? इतनी देर से अविनाश का फोन आ रहा है, तुम दोनों के बीच कोई लड़ाई हुई है क्या?”
“नहीं तो?”
“फिर तुम उसका फोन क्यों नहीं उठा रहीं?”
“बस ऐसे ही”
“माँ तुम मेरे बिना क्या करोगी? मेरे बाद तुम्हारा अकेलापन?”
“मैंने तुम्हें बताया है न, कि मैं एक वन रूम सेट में जाऊंगी, तुम्हें मेरी चिंता करने की जरूरत नहीं है”
“माँ, तुम्हें उस दिन वाकई मुक्ति मिलेगी न!”
“अन्वी!”
“माँ बोलो न”
“अन्वी, मेरी बच्ची! जाने दे इसे!”
“माँ, अब मैं जा रही हूँ तुम्हारे पास से हमेशा के लिए तो तुम्हारे अकेलेपन में कौन तुम्हें सम्हालेगा?”
“होंगी न तुम्हारी यादें!, जब भी याद आएगी तब तुम्हें याद कर लिया करूंगी, तुमसे बात कर लिया करूंगी! तुम कहाँ मुझसे इतनी दूर होगी?”
“माँ, मैं तुम्हारे मानसिक और शारीरिक दोनों ही अकेलेपन की बात कर रही हूँ. तुम्हें मैंने अकेले बहुत देख लिया है. शैली आंटी और पापा एक हैं, और तुम? तुम्हारे अकेलेपन के लिए कोई तो हो?”
“अन्वी, ये क्या लेकर बैठ गयी है. सच कहना यही बात करने तुम अविनाश के पास गयी थी न!”
“छोड़ो न माँ अविनाश को? मैं तुमसे बात कर रही हूँ, एक नहीं कई अविनाश मिलेंगे! पर तुम और तुम्हारा अकेलापन”
“क्या बोल रही है अन्वी, हे प्रभु ये लड़की क्या करके आई है? क्या करके आई है, बोल?”
“माँ आप शांत हो जाएं, कल शेखर अंकल आपके पास आएँगे, मैंने आपको और शेखर अंकल को एक दूसरे की परवाह करते हुए देखा है, आप दोनों की आँखों में एक तड़प देखी है, वह तड़प मुझे अन्दर तक सिहरा देती है. मैं चाहती हूँ माँ तुम दोनों अपनी जिंदगी एक साथ जियो! माँ तुम जियो न!”
“पागल लड़की, ये क्या कह रही है? मैं अभी अविनाश को फोन लगाकर बुलाती हूँ, तुम उससे यही बोलकर आई हो”
“माँ, कोई फायदा नहीं, अंगूठी वैसे भी ढीली थी, मेरे साइज़ की नहीं थी, कभी कभी हम समझ लेते हैं कि वह हमारे लिए होगा, पर हर अच्छी डिजाइन आपके हिसाब से हो, यह भी तो ठीक नहीं है, मैं उसे वह वापस कर आई हूँ. और माँ आज बहुत दिनों के बाद फ्री महसूस कर रही हूँ, उस लिफाफे में डिवोर्स के जो पेपर हैं जो आपको साइन करने थे, कर दीजिएगा, कल आ रहे हैं शेखर अंकल. माँ मैं अपने माँ पापा के हाथों विदा होना चाहती हूं. मैं मायका चाहती हूँ, मुझे अपने पापा और माँ के घर पर आना है. माँ, मुझे ये दे दो! माँ मुझे मेरा पूरा मायका दे दो न!”
“अन्वी!”
“माँ, ये पेपर साइन करके आपकी मुक्ति होगी, और शेखर अंकल के साथ आपका घर बसाना उस मुक्ति के बाद का दूसरा चरण होगा!”
“अन्वी, मेरी लाडो, इतनी बड़ी हो गयी”
“पर तुम्हारे लिए तो वही हूँ न!, तुम्हारी बार्बी”
“हां, लाडो”
माँ को बिना बताए अविनाश को मेसेज भेज चुकी थी “गेट लॉस्ट डियर, मैंने अपनी माँ की मुक्ति चुन ली है, अपना मायका बना लिया है.”
“शुक्रिया अविनाश, आज बरसों के बाद मुझे सही राह दिखाने के लिए”

अपने गले में एकदम से उभरे दर्द को दबाने के लिए शेखर अंकल से बात करने लगी थी वह....................

रविवार, 30 अक्टूबर 2016

डेस्डीमोना मरती नहीं



और वह चली गयी, क्या मैंने उसे रोकने की कोशिश की? क्या मैं उसे रोक सकती थी? शायद नहीं, पर वह थी कौन? एक चरित्र ही तो थी! जो किताब से निकल कर मेरे जीवन को एकदम तहसनहस कर गयी थी। वह ओस की पहली बूँद के जैसी निच्छल थी, पति के प्रेम का शिकार थी। और पति के प्रेम का शिकार न भी थी तो वह एक कालखंड का शिकार थी। वह शायद कुलीनता और सभ्यता के  सामंतवादी  विचारों का शिकार थी। वो तमाम पाखंडो से न बच सकी एक औरत थी, जो आज हर घर में मिल जाएगी।

कल की रात नींद नहीं आ रही थी। और  मैं सोच रही थी:
“ये नींद भी भारतीय क्रिकेट टीम हो चली है, चली तो  पूरी  टीम चली नहीं तो कोई नहीं। या फिर नौ माह के गर्भ जैसी, जिसका पता ही न चले कि अब दर्द, अब दर्द और दर्द का नामोनिशान  नहीं। ये नींद  तो आती ही है और न जाती ही है। उनींदा सा हर क्षण रहता है।“

रात में ही सामने वाले फ्लैट से फिर लड़ाई की आवाजें आ रही थी। मैं डेस्डीमोना को पढ़ते पढ़ते घर से बाहर आ गयी थी।
ये शेक्सपियर भी न, खुद तो चले गए और हमारे पास छोड़ गए हमारे जीवन में समाते हुए चरित्र।
वाह, क्या क्या न कहते हैं, जियो शेक्सपियर जियो। डेस्डीमोना मुझे आकर्षित करती है हमेशा। हर घर से एक डेस्डीमोना झांकती है, वह ज़िंदा सी है, लगभग हर घर की खिड़की से झांकती है। और जैसे इशारा सा करती है। अपने अस्तित्व को न भूलने के लिए हमें जिद्द करती है। पर अभी तो सामने वाले घर से ही आवाजें आ रही थी। मेरा मन हो रहा था कि काश मेरे पास उड़ने वाली झाडू होती चुड़ैल वाली, तो मैं भी चली जाती उड़कर, उस घर में। हैरी पॉटर में जैसे हम चुड़ैल देखते थे, पर वह झाडू मेरे पास नहीं है और मैं अभी अपने घर की बालकनी में खडी होकर डेस्डीमोना को महसूस कर रही हूँ और बीच बीच में सामने वाले घर से आती हुई आवाजों को सुन रही थी, वह भी मुझे अपनी तरफ खींच रही थी, मन में तो बहुत आया कि चली जाऊं! पर रात के बारह बज चुके थे, और कॉलोनी का गार्ड मुझे बार बार घर के अंदर जाने के लिए कह रहा था,
“मैडम, इश  शमय प्लीश घर में जाओ न!, हमारे गावों में कहते हैं, कि चुड़ैल पड़ जाती है पीछे 12 बजे के बाद!”
“अच्छा, अगर चुड़ैल पीछे पड़ जाती है तो तुम्हारे पीछे क्यों नहीं पड़ती? तुम तो रोज ही बाहर रात को 12 बजे से 5 बजे तक रहते हो?”
“ओ, मैडम जी, मैं तो आदमी हूं, चुड़ैल न औरतों के पीछे ही लगती है, हम तो वैसे भी आदमी है। हमारे पीछे आएगा तो पिटेगा नहीं”
“तुम चुड़ैल को मारोगे?”
“ओ मैडम जी, औरत जब सुनती नहीं बात तो पिटती ही है न!”
“हां, वैसे.................।”
उसने इधर उधर देखा और फुसफुसाया
“मैडम जी, औरत तो औरत है,क्या जिंदा क्या मरी? जब जिंदा न बिगाड़ पाती है कुछ, तो मर कर क्या बिगाड़ेगी”
“तुम लोग औरतों के लिए बहुत ही नियम कायदे बनाते हो?”
“अब छोड़िये मैडम जी, आपने देखा नहीं कैसे सामने वाले घर से चीख की आवाजें आ रही हैं, आप देखिये, अब अगर दिन भर का थका हारा मरद आएगा तो जरा  हाथ पैर दबा देने में क्या बुराई? जरा दो चार हाथ खा लेगी तो क्या हो जाएगा? अब वैसे भी दिन भर बैठकर खा खा कर मोटी ही तो होती रहती हैं, लुगाइयां”

“अच्छा अच्छा जाओ तुम!” मेरी रूचि उसके हिसाब से उसका नारीपुराण सुनने में नहीं थीएक तो मैं डेस्डीमोना को पढ़ रही थी और दूसरा मैं सामने वाले घर से आने वाली आवाजें सुनना चाह रही थी, रात को साढ़े बारह बजे किसी के घर में तो जा नहीं सकते पर सुन तो सकते हैं
“मैडम जी, जा तो रहा हूं, पर ध्यान रखना चुडैलें आदमियों से डरती हैं, औरतों को ही अपने कब्ज़े में करती हैं। आप जाओ अंदर!”
“ठीक है, अब तुम जाओ”
उसके चुड़ैल पुराण के बाद मैं फिर से आ गयी थी। मैं अंगद के पैर की तरह एक ही तरह जैसे जड़ सी हो गयी थी, पर वह है कि मान नहीं रहा था।
सामने से आवाजें और तेज होती जा रही थीं
“अरे, दुष्ट, एकदम वैश्या हो तुम, you are such a whore, such  a prostitute,”
चटाक, चटाक की आवाज़!
लग रहा है, गृहयुद्ध हो रहा है, गृहयुद्ध कैसे? युद्ध में तो दो तरफा वार होते हैं, पर यहाँ पर तो शायद एक ही ओर से वार हो रहा है, जैसे डेस्डीमोना झेलती थी, अपने पति के वार। ओथेलो भी तो इसी आदमी की तरह अपनी पत्नी को मारता था, तो वो क्या करती होगी? शेक्सपियर को अगर हटा भी दूं तो डेस्डीमोना अगर इस औरत की तरह होती तो शायद वह अपना गाउन उठाकर अपने घुटनों के बल अपने पति के पैरों में बैठकर उससे क्षमा मांगती, जो शायद वह मांगती थी, वह उसे पापी, परपुरुष गामी कहता होगा और वह क्या रोकर ही केवल उसे अपनी तकदीर मान लेती होगी, पर ऐसा ही तो सीता ने भी किया था।

हो सकता है कि राम ने खुद सीता के चरित्र पर शक नहीं किया हो, पर उन्होंने सीता को केवल चरित्र की ही परिभाषा के कारण जंगलों के हवाले कर दिया था। तो ऐसे में भला इस पुरुष की क्या बिसात? ये तो वही कर रहा है जो इसने देखा है। मैं भी न जाने अपने घर की बालकनी में खड़े खड़े रात को बारह बजे किन हवाओं में खो रही थी, एक हवा मुझे डेस्डीमोना  की ओर लेकर जा रही थी तो दूसरी हवा मुझे हर उस स्त्री की ओर लेकर जा रही थी जो शक का शिकार होती है। ये डेस्डीमोना, फिर से आ गयी कमबख्त, मुझे हंसी भी आ रही है, वह मेरी रूह में अन्दर तक समाई हुई है, वह मुझे कभी आकर अचंभित भी करती है, जैसे ही सामने वाले फ्लैट से किसी भी स्त्री के रोने की आवाज़ आती है वह मुझे उसी खिड़की पर आकर जैसे आवाज़ देती है, बोलती है “देखो, मैं आ गयी, इस बार मोटा गाउन नहीं पहने हूँ, इस बार मैं तुम्हारे यूपी और बिहार में जाकर देखो साड़ी पहनकर आ गयी हूँ, पर सुनो केवल चोला ही बदला है, मेरादर्द तो अभी भी वही ही है और उसी तरह का है जब ओथेलो मुझे मेरे पिता के घर से लाते समय तो प्रेम से लाता है पर मुझ पर अधिकार के बाद वह मुझ पर छोटी छोटी बातों पर शक करता हुआ, मुझे ही मारने को सहर्ष तैयार हो जाता है। शादी के बाद तो सुना है भरोसा जम जाता है, पर मेरे मामले में उसने क्यों अपने दोस्त पर भरोसा किया? तुम तो पढ़ रही हो न मुझे?, कुछ बोलती क्यों नहीं?”

वह पागल होकर चीख रही थी, मैं क्या करती? अब उसके लेखक ने ही उसके पति से उसे मरवा दिया तो मैं क्या कर सकती थी? अगर मैं लिखूँगी तो कोई डेस्डीमोना तो मैं उसके पति को दोषी ठहराऊँगी, पर क्या ऐसा संभव है? सामने वाला घर भी तो अपनी बीवी को मारने के लिए दोषी है पर क्या फायदा हो रहा है? नहीं, वह भी तो खूब गालियां दे रहा है। समय बदलने के बाद भी मैं नई डेस्डीमोना बनने से भी नहीं रोक सकती हूँ। मैं रोकना चाहती हूँ। बात करना चाहती हूँ, पर कैसे करूं? उफ,

मैं एक पल को रुक गई, अब मेरी हंसी गायब हो गयी है, अब डेस्डीमोना छाने लगी है, जैसे भूत या आत्माएं किसी भी काया में प्रवेश करती हैं वैसे ही वह मुझमें प्रवेश कर रही है, मैं वह और वह मैं बनने सी लगी है, तभी मैं एकदम से किताब अपने हाथ से फ़ेंक देती हूँ, वह किताब में से झाँक कर कहती है,
“क्या तुम कभी डेस्डीमोना होने से बच पाओगी और कब तक बचोगी?”

न जाने क्यों वह एकदम से हिंसक हो गयी। खिड़की से आवाजें भी तेज हो गईं और मेरे ज़ेहन में जहां डेस्डीमोना का “मेरे स्वामी, मुझे माफ करो कहना” भी जहां तेज होता जा रहा है वहीं उस औरत का “माफ कर दो, मुझे माफ कर दो।”
मैं अब क्या करूं दो कालखंडों के एक ही दर्द को कैसे खुद में भरूं?
उफ, ये हिंसक हंसी! मैं दोनों ही तरफ से फांसी पा रही हूँ, अब मेरी आवाज़ घुट रही है, पर ये दोनों, ये दोनों तो जैसे जंगली बिल्ली की तरह लडती ही जा रही हैं, एक ओर वह खिड़की के अन्दर से
“माफ कर दो, अब बात नहीं करूंगी, अब मैं नहीं झाकूंगी, अब माफ करो”  बोलती जा रही है, और दूसरी ओर किताब के अन्दर से वह भी बोल रही है, अपने चरित्र पर शक करते हुए अपने पति ओथेलो को एक अजीब सी निगाह से देख रही है, वह एक अविश्वास से देख रही है। आखिर क्यों उसके पति को उस पर भरोसा नहीं है और क्यों भरोसा खो रहा है?
“औरत पर भरोसा क्यों नहीं करता आदमी?” अचानक से उसने मुझसे पूछा था,
“ओह, पता नहीं”
मैं उसकी इस हिंसा से डर गयी थी और इतना डरी कि मैंने सोचा कि किताब को उठाकर मैं उसे नाली में फ़ेंक दूं।
“ठीक है, शेक्सपियर जी, इतना खूबसूरत नाटक लिखे पर ऐसा भी नहीं कि वह पाठक का ही सर्वनाश कर दे। अब देखिये ये कैसे सर पर नाच रही है और अपन को भी नचाए हुए हैं।”

उधर गार्ड कह रहा है “मैडम, अभी कोई चोर घुस आएगा, आप प्लीश घर में जाएं”
मुझे वह किताब के अन्दर से जीभ चिढा रही है, मैंने उससे कहा भी
“नहीं, अब अविश्वास से होने वाली हिंसा काफी कम हुई है। अब पति अपनी पत्नी पर फालतू में शक नहीं करता” और यह कहकर मैंने अपना सिर नीचे कर लिया, मैं इससे ज्यादा झूठ नहीं बोल सकती थी। तभी मैंने देखा कि इस बात पर वह अपना पेट पकड़ कर हंस रही है, मुझे बोलने का मौक़ा तो दे ही नहीं रही है, अब मेरे पति के खर्राटे भी दीवार तोड़कर बाहर आने लगे है। मुझे हंसी आई, और बहुत ही आश्चर्य हुआ कि अरे, देखो ये मर्द लोग कैसे सो लेते हैं, बेझिझक! एकदम बिना किसी परेशानी के। इन्हें मतलब नहीं होता कि घर के सामने कोई किसी को पीट रहा है, कोई मरे, जिए इन्हें मतलब ही नहीं। इन्हें मतलब नहीं होता कि घर के सामने कोई हिंसा का शिकार हो रहा है या फिर कोई प्रतिहिंसा का शिकार हो रहा है। उफ!

हां, तो किताब से फिर से झांकती है और मुझसे बात करती है मेरी डेस्डीमोना , अब मुझे वह बहुत ही टूटी हुई कातर सी दिखती है, जो मुझे आजकल लगभग हर ही स्त्री लगती है। कोई किसी भी तरह से टूटी है तो कोई किसी। पर हां, सब में एक बात कॉमन है कि उनके अस्तित्व को नज़रंदाज़ करने की हिंसा हो रही है। जैसे राम आदर्श पुरुष है, आदर्श बेटे हैं, आदर्श भाई हैं, आदर्श राजा हैं, पर पत्नी के अस्तित्व को नज़रन्दाज़ कर वे आदर्श पति न बन पाए। ऐसा क्यों होता है कि स्त्री का अस्तित्व दबाने की एक हिंसा होती है, जो हमारे सामने होते हुए भी हमें नज़र नहीं आती। कितना अजीब होता है कि एक पुरुष के लिए हर किसी का अस्तित्व महत्वपूर्ण होता है, हर किसी को वह महत्व देता है, पर वह केवल अपने जीवन से जुड़ी हुई सबसे महत्वपूर्ण स्त्री अर्थात पत्नी को ही महत्व नहीं देता, वह उसके अंगों पर अधिकार जमाना चाहता है, उसे चादर बनाकर ओढ़ना चाहता है, उसे बिस्तर की तरह बिछाता है पर न जाने क्यों एक नौकर की तरह उसके अस्तित्व को नकारता रहता है। 

सच है शायद डेस्डीमोना  इसी हिंसा का शिकार हुई थी, या वह किसी छल का शिकार हुई थी, पर छल कोई भी हो, हारी तो एक पत्नी ही। वह जंघा की परिधि में होने वाले युद्ध में पराजित होने वाली प्रजाति हो जाती है, हां एक पत्नी के रूप में स्त्री शायद जंघा की परिधि वाले युद्ध हारती है औरत, तभी तो छली जाती है। नहीं नहीं वह जंघा की परिधि का युद्ध नहीं होता, शायद जंघा की परिधि पर वर्चस्व कायम करने वाला युद्ध होता है। वह निरंतर संघर्ष होता है। वह चरित्र का संघर्ष है, वह तथाकथित मर्यादा का चरित्र है। एक पत्नी के रूप में स्त्री निरंतर संघर्ष रत है, वह जूझती है, पर शायद इस स्थान के वर्चस्व के युद्ध को हार जाती है।

मेरे घर के सामने की खिड़की में वाकयुद्ध अब शांत होने लगा था, वह क्यों शांत हो रहा था, ये तो नहीं पता, पर अब घर की लाइटें बंद हो गयी थी, और जोर जोर से जो चीखें आ रही थी, शायद अब दबी सिस्कारियों में बदल गयी होंगी। अब शायद उस वर्चस्व का समय आ गया होगा जिसके कारण यह पूरा युद्ध हो रहा था। अब शायद वर्चस्व की चाह में उसकी देह को मसला जा रहा होगा या मसाला लगाकर मुक्त रूप से वह भोग लगा रहा होगा।

पर उसकी चीखों से मेरी नींद तो गायब हो चुकी थी, और रात की चादर और स्याह हो चुकी थी। मुझे तो नींद तो आ नहीं रही, पर घर के सामने वाली औरत क्या करेगी?  सो जाएगी या अपने स्वामी को भोग लगाने के बाद जागकर मेरे साथ मेरी डेस्डीमोना  के साथ आएगी? शायद सो ही जाएगी, अपने मर्द को ओढ़ कर, ऐसी कायर औरतें अपने मर्द को ओढ़कर सोने में ही भरोसा करती हैं, वे जागती नहीं, वे सोती रहती हैं, नींद उनकी केवल तभी टूटती है जब उनके जीवन पर संकट आता है, जैसे डेस्डीमोना  की भी तन्द्रा तभी टूटी थी न जब उसे उसका पति मारने आया होगा, या उसे लगा होगा अब यह मेरे प्राण ले लेगा। ये रात के समय शोर मचाने वाली स्त्रियाँ ऐसे ही किसी समय जागती हैं, या तो जब उनके प्राण ही संकट में आते हैं या फिर तब जब उनपर कोई बाहर से लाकर बैठा दी जाती है, नहीं तो तब तक वे अपने पतियों को ही ओढ़कर सोने में दुनिया का सबसे बड़ा सुख मानती हैं।

अब तक मेरी भी आँखों में नींद आने लगी थी, डेस्डीमोना  ने कहा सोने जा रही हो, मैंने कहा “हां, पर तुम्हारे साथ बात भी करने का मन है”।
उसने कुछ अचरज से पूछा ”अच्छा एक बात तो बताओ?”
“हां, बोलो”
“हम घर से भागी लड़कियों की गलती क्या होती है?”
“ओह, ये तो बहुत अच्छा सवाल पूछा तुमने!”
उसने इधर उधर देखा, फिर कान में फुसफुसाया
“तुम्हें पता, जैसे ही लड़की घर से भागती है, वह चरित्रहीन साबित हो जाती है, है न!”
“हां, ऐसा ही है!”
“पर क्यों”
“पता नहीं”
“मैं अपने पिता की लाड़ली, एक रोमांचक सफर पर जीवन जीने वाली, मैं, अपने जीवन का एक एक क्षण जीने वाली, अपने पिता और बाद में अपने पति को समर्पित आदर्श लड़की, चरित्रहीन हो गयी!”
वह मायूस लग रही थी.
“छोड़ो, ये किस्सा!”
“अच्छा एक बात बताओ, कभी तुमने ड्रिंक लिया है?”
“ड्रिंक! खुलकर केवल अपने से बात करते हुए, अपने आप से किस्से कहानी कहते हुए?”
“शायद नहीं!, ये तो अपवित्रता और चरित्रहीनता की निशानी है न?”
“अपवित्रता, चरित्रहीनता, तो क्या तुम्हारे प्रिय ओथेलो चरित्रहीन थे?, अपवित्र थे?”
“ओहो, ये परिभाषाएं तो औरतों तक ही हैं न!”
“तुम ये सब मानती हो?”
“क्या मेरे न मानने से सच बदल जाएगा?”
“अच्छा सुनो, तुम्हें क्या लगता है कि सामने वाले घर में लड़ाई क्यों हो रही होगी? अगर तुम होती तो क्या होता?”
“तुम्हारे पति सो जाते हैं न समय से, इसलिए तुम इतना बोल पाती हो! नहीं तो अभी तुम भी यहीं होतीं?”
मैं सिमट गयी खुद में! खर्राटे बाहर तक आ रहे थे, पर मैं कैसे उसे बताती कि कुछ हिंसा तो मैं भी झेलती हूं. वैश्या का ताना तो मैं भी खाती हूं, और क्यों? उसे क्या बताऊं? अभी कल ही तो जम कर बहस हुई थी व्हाट्सएप पर, कि वैश्या कम से कम पैसे के बदले शरीर तो देती है, बीवी तो वैश्या से भी गयी गुजरी होती हैं, घर चलाने का पैसा भी पति देता है और उसे बदले में कुछ नहीं मिलता. मिलते हैं तो बच्चों की फरमाइशें, ये ला दो, वो ला दो. और बीवी के नखरे. यू आर अटर फेल्योर! ओह, मैं सब कुछ याद करने के पक्ष में नहीं थी, मैंने उससे एक बार फिर आँखें चुराईं!
“तुम कुछ कह नहीं रही हो?”
“मैं क्या?”
“यही कि तुम्हें पति अच्छा मिला है, इसलिए तुम अपने पंखों को इतना फैला पाती हो?”
मैंने अपने हाथों को देखा, अपने सपनों की उड़ानों को देखा और फिर मेसेज बॉक्स में आए मेसेज को! उफ, मैं क्या थी? क्या मैं वह थी जो उसकी जुबान कह रही थी या मैं वह थी जो मेरे पति ने मुझसे कहा था या मैं वह थी जो न किसी ने देखा था और न महसूस किया था. कई बार मैं सोचती, हम औरतें कहाँ कुलीनता का शिकार होती रही हैं. हम औरतें हमेशा ही न जाने किस किस का विषय रही हैं, पर हाँ, सारा संघर्ष जंघा क्षेत्र पर वर्चस्व के लिए ही होता है. हम ऐसे समाज में कैसे जिंदा रहते हैं?
“क्या हुआ?” उसने कुरेदा
मैंने ख्यालों को परे झटकते हुए कहा “मैं तुमसे बात कर रही हूं और तुम मेरी ज़िन्दगी के बक्से को खंगाल रही हो? मेरे बक्से में तुम्हें कुछ नहीं दिखेगा?”
“क्यों वहां भी वही अँधेरा है जो मेरी ज़िन्दगी में था?”
वह अपनी ज़िन्दगी के बक्से को मेरे साथ क्यों मिला रही थी, मैं नहीं थी तैयार इसके लिए, मैं तो उसकी ज़िन्दगी में झांकना चाह रही थी कि आखिर उसके साथ ऐसा क्यों हुआ होगा? क्या दुनिया की हर जगह पर हर काल खंड में औरतों के साथ यही होता है कि चरित्र के आधार पर कभी घर से निकाला जाता है, कभी तलाक दिया जाता है. ऐसा क्यों?
पर शेक्सपियर ने ऐसा क्यों किया? इतनी प्यारी गोरी, सुंदर डेस्डीमोना को एक तो प्यार करा दिया काले से और फिर उस काले मूर से उस मक्खन मलाई पर संदेह का डाका डलवा दिया!
“अच्छा तुम बताओ?”
“क्या?” उसने पूछा
“तुम्हें उससे प्यार क्यों हुआ था?”
“ओथेलो से”
“हां! जबकि वह तुमसे तो हर लिहाज़ से कमतर ही था”
“ओह, ऐसा नहीं था!”
“मतलब?”
“वह काला था, और तुम एकदम मक्खन की लोई, वह शक्की था और तुम एकदम उसके लिए समर्पित, उसे तुम्हारे हाथ से खाना खाने में एतराज था पर तुम्हें तो उसके हाथों से मरने में भी कोई एतराज न हुआ. अच्छा वह तुम्हें मारना क्यों चाहता था?”
“अरे, ये मुझे क्या पता? मैं तो अपने मालिक की बांहों में बहुत खुश थी. उसने मुझे क्यों मारना चाहा, पता नहीं!”
“फिर भी?”
“तुम्हें पता?” उसका चेहरा खिला और मुझे लगा कि वह बहुत कुछ बताएगी.
“हां, कहो!”
“तुम्हें पता मैंने जब अपनी मर्जी से शादी का फैसला किया था तो सोचा था कि एक बहादुर आदमी की बाहों में पिघल जाऊंगी और जब एक नया संसार हमारे सामने आएगा तो हम कितना कुछ रचेंगे. कितना सुंदर होगा. हमारे बच्चे इस रंगभेद की दुनिया में एक नयी मिसाल बनेंगे! पर!”
“पर, ये कुछ नहीं हो सका न? अरे छोड़ो यार ये दुनिया, मर्दों की है. हमने उन्हें जन्म दिया, उन्हें अपना रक्षक कहा, पति और प्रेमी के रूप में अपना शरीर दिया. और उन्होंने हमें हर समय मारा, हर कालखंड में मारा”
“हां, पर मैं आज किताबों से झाँक कर हर किसी से पूछती हूं कि मेरा कसूर क्या था? मेरे महान लेखक ने न जाने कितने महान ग्रन्थ लिखे, कितने नाटक लिखे, उन्होंने अपने नायक को महान बनाने के लिए मुझपर ऐसा अत्याचार क्यों किया? पूरे नाटक में मैंने त्याग किया, अपने पिता के घर पर सबसे दुलारी मैं, जब पिता को पता चला कि मैं ओथेलो के साथ भाग आई तो उन्होंने कहा कि उसने मुझपर काला जादू कर दिया है. मैं अपने पिता के सामने मुंह न खोलने वाली लड़की, कैसे एक काले के साथ भाग सकती हूं.”
“सच ही तो है, हम अपने घर में पिता के सामने मुंह नहीं खोलती, जिसके साथ पली बढ़ी होती हैं, माने अपना भाई वह भी मालिक बन जाता है, और पर्दों की तहों के बीच अगर किसी से प्यार हो जाए, तो शादी के बाद वह एकदम मालिक बन जाता है. बिस्तर से लेकर कब्र तक वह हर क्षण हमारा मालिक बना रहता है.”
“सच कह रही हो और हम गुलामों की बात भी कभी सुनी जाती है. मैं अपने मालिक के सामने अपनी जान की भीख मांगती रही, मैं उससे बोलती रही मुझे न मारे, कम से कम मेरी गलती तो बताए, पर उस पर तो एक रूमाल के कारण इतना शक का काला रंग भर गया था कि वह मेरी मासूम और सफेद आँखों पर उसे बिलकुल भी भरोसा न हुआ. शायद आदमी ऐसे ही होते हैं?”
“हां, शायद वह समय ही ऐसा था कि तुम पर शक करने के बाद तुम्हें मारकर खुद को मारकर नायक महान बनता, उसकी महानता के किस्से गाए जाते, ओह, बेचारा षड्यंत्र का शिकार हो गया. वह समय ही अलग था! औरतों को मरना ही था, क्या करती जीकर? एक तो पति शक कर रहा था और दूसरा अगर वह मर जाता तो तुम्हारा क्या होता? क्या तुम दूसरी शादी करती?”
“ओह, दूसरी शादी?”
“पर मैंने तो तन मन और वचन सबसे केवल अपने स्वामी को ही प्यार किया था”
“पति स्वामी होता है?”
“हां, तुमने पढ़ा नहीं क्या कि मरते समय मैंने उससे क्या कहा था”
“हां, पढ़ा था, तुम माई लार्ड लार्ड कह कह कर अपनी जान की भीख मांग रही थी, यहाँ तक कि तुमने उससे कुछ घंटों तक जिंदा रहने और अपनी बेगुनाही साबित करने की मांग की थी. सच में यहाँ पर शेक्सपियर अन्याय कर गया तुम्हारे साथ, कम से कम तुम्हारे पति को तुम्हारे मुंह से बेगुनाही तो सुनवा देता?”
“हां, चलो पर अब क्या हो सकता है? मुझे जाना पड़ा! पर आज भी हालात कहाँ बदले हैं, तुमने देखा न, तुम्हारे सामने वाले घर में क्या हुआ?”
“हां, पागल लड़की थी, सरेंडर कर दिया, अब देखो सुबह कैसी आएगी. जैसे कुछ हुआ ही न हो! ये हम औरतें दर्द छिपाना कितना अच्छा जानती हैं?”
“हां, अच्छा तुम ड्रिंक करती हो?”
“हां, तुम पियोगी? मैं चली वाइन लेने!”
“मैं नहीं पियूंगी, आदत नहीं!”
“ओह, यू ऑर्थोडॉक्स गर्ल”
मैंने अन्दर जाकर एक ग्लास में अपने लिए वाइन लिया और फिर उसके पास आई। उस समय जैसे उसकी आँखों में मैं एक इतिहास की औरतों के साथ होते हुए अन्याय की एक तस्वीर देखी. वो क्या कहना चाह रही होगी. आसमान में बादल छा रहे थे और अब बिजली भी लुकाछिपी करने लगी थी. पता नहीं वह बिजली देखकर सहम रही थी. और उसका मन भी मेरी तरह भीगने का हो रहा था.
“देखो, बारिश”
“हां,”
“सुनो!” वह बोली
“मैं तो मर चुकी, मर जाने दो, पर तुम तो जियो, आज का लेखक तो शेक्सपियर जैसा नहीं न कि वह तुम्हें मारे, ये जो बूंदें हैं, उन्हें गिर जाने दो खुद पर खो जाओ तुम भी”
“हां, मैं वाइन पियूंगी”
“तुम पियो, मैं अपने जैसी बदशक्ल मुर्दाओं को धोकर ताजा करूंगी, मैं क्यों मरूं?”
मैंने उसकी आँखों के नीचे काले घेरों को सुनहरा होते देखा, वे वैसे ही सुनहरे हो रहे थे जैसे एक दिन मेरे विद्रोह के बाद मेरी आँखों के नीचे सुनहरी रोशनी छा गयी थी.
“मैं धर्म की चरखी से मुक्त होना चाहती हूं” वह अपने नीले गाउन को निचोड़ते हुए बोली
“मैं भी” मैंने कहा “तुम्हें पता इस चरखी में ही हमें बांधा जाता है, कि तुम धार्मिक बनो, धर्म के अनुसार बनो।  पर हमारे धर्म में जो हमारे लिए कहा गया है, उसे हमारे सामने ही तोड़मरोड़ कर हमारी थाली में बचपन से परोसा जाता है, धर्म में हमारे पक्ष में क्या कहा गया है, क्या उसे बताया जाता है? बस हमें केवल पुरुषों के हिसाब से तोड़मरोड़ कर परम्पराओं का तडका लगा प्रसाद दिया जाता है और हमें उसे नाश्ते, खाने और रात के खाने में खूब मिला मिला कर पिलाया जाता है।  कि हम कहीं भाग न जाएँ, बिगड़ न जाएँ। घुट्टी बनाकर पिला दिया जाता है. सब कुछ एक काढ़े की तरह”
“हां, पर अब मुझे आज़ाद होना है!” वह अपने गाउन का निचला हिस्सा हटाती जा रही थी, उसका नीचे जमीन छूता गाउन अब घुटने तक रह गया था.
“मैं दो बार मारी गयी, एक बार स्लो डेथ मरी, और एक बार तलवार से मारी गयी, पर तलवार से मारा जाना बहुत सहज रहा, क्योंकि उसमें मुझे पता था कि क्या होने वाला था, स्लो डेथ मुझे नीला कर रही थी, हर अंग नीला हो गया था, एकदम जहर से भरा” वो फिर वही हिंसक हंसी पर उतर आई. अब मैं उसकी आँखों में गुस्से और नफरत के भावों को देख रही थी. वह पानी को अपनी आँखों से पी रही थी,
“हर तरफ आग, शक की आग, हर तरफ खंजर, शक का खंजर, मेरे स्वामी, मेरे स्वामी, और स्वामी का मुझे वैश्या कहना,  हर तरफ कोई आवाज़ नहीं, बस केवल शक का कोहरा, शक की चादर, और उस चादर के अन्दर हर क्षण घुटती मैं, और मेरे मरने पर महानता का लबादा ओढ़े मेरे नायक, मेरा लेखक” वह हिंसक हो गयी, और पागलों की तरह नाचने लगी वह आधी गायब हो रही थी, केवल उसका शरीर मुझे दिख रहा था, उसके पैर गायब हो गए थे, वह कठपुतली जैसी दिख रही थी.
अरे, हम औरतें तो हर युग में कठपुतली ही रही हैं, मैं उसके पैर खोज रही थी. मन बोला क्या करेंगी हम औरतें पैर लेकर, अपने मन से दो कदम तो चल नहीं सकती, पैर का क्या होगा? हंस सब कठपुतली ही तो हैं, वह कठपुतली थी अपने लेखक की, जो लेखक ने कहा, वह उसने कहा, उसने किया, खड़ी हो गयी तलवार के सामने. ओह, बूंदे, अचानक से मुझे वे बूँदें तेज़ाब की बूँदें लगने लगी, जो उसे जला रही थी, उसका एक एक अंग जैसे गल गल कर बूंदों के साथ बहने लगा. ओह, मैं क्या करूँ? मैं उसे कैसे बचाऊं? उन बूंदों पर मेरा कोई बस नहीं चल रहा था, ओह, वह गल गल कर बह रही थी और बह रही थी कुलीनता में तराशी हुई हम औरतों की कहानियां, चरित्रहीनता के आरोप में घर छोड़कर जाती गर्भवती सीता, पांच पतियों के बावजूद अपने चरित्र की हिफाजत के लिए कृष्ण को पुकारती हुई द्रौपदी, गुलाम से प्यार करने के एवज में अपनी जान की कीमत चुकाने वाली रजिया सुल्ताना, या अभी सामने वाली औरत जो “prostitute” की उपाधि पा रही थी, और मैं खुद और मेरी यह नायिका, सब एक एक बूँद बनकर गल गल कर मेरी आँखों के सामने बह रही हैं.
मेरी छोटी सी बालकनी एकदम से जैसे एक समंदर में बदल गयी, बादल गरज रहे थे, बिजली   भी  तांडव कर रही है और यह जैसे समंदर मेरे वाइन के गिलास से होकर मेरे अन्दर जा रहा है, मैं उस दर्द के समंदर को पी रही हूं.
“नहीं नहीं, जाओ यहाँ से, मैं बर्दाश्त नहीं  कर पा रही हूँ”
“माँ, बारिश हो रही है, आप चीख क्यों रही हैं?” मेरा आठ साल का बेटा मेरा पजामा थामे खड़ा है बालकनी में, बारिश से आसमान धुल चुका है, और मैं क्या कर रही हूं, वहीं खड़ी हूँ. ओह, मैं उन लम्हों को याद कर रही हूं, वो क्या थी. सामने वाले घर की खिड़की भी शांत है तो क्या वह सब सपना था? नहीं इतना जीवंत सपना नहीं हो सकता! अभी अभी तो मेरे साथ थी, हम लोग उसकी ज़िन्दगी को जी रहे थे!
मेरे कानों में अचानक से फुसफुसाहट होती है “मैं कहां जाऊंगी, यहीं रहूँगी, हर औरत में, तुम में, उस सामने वाली में, क्योंकि न तो औरत बदली है और न ही पुरुष की आदतें! तुम्हारा पति जब तुम्हें वैश्या बोलेगा तब तुम नहीं हर औरत गाली खाएगी, पर सुनो अब समय बदलना चाहिए, है न!, कोई कोना होना चाहिए न हमारे हंसने रोने के लिए. और हर ऑनर किलिंग के लिए प्रश्न तो उठना ही चाहिए. हमें आज़ादी  तो चाहिए ही होगी”
रात का दो बज चुका था. मैंने भी उसके कान में कहा
“हां, एक कोना तो होगा. सुनो, तुम्हें गढ़ा गया था घोर सामंतवादी युग में, जहां स्त्रियों का पुरुष की मर्जी के बिना सांस लेना भी गुनाह माना जाता था, और तुम अपने लेखक से उम्मीद करती हो तुम्हारे लिए कोई कोना खोजता। पुरुष तो नख शिख तक हम पर अधिकार मानता है। और जैसे ही वह स्वतंत्र औरत गढ़ने लगेगा वैसे ही वह अपनी सत्ता के लिए एक प्रतिद्वंदी न पैदा कर लेगा? उसे बंद कमरे में गहनों से पगी हुई औरत चाहिए, इतने गहने कि वह उनमें ही दब कर रह जाए”
“हां,” अब वह अद्रश्य रहकर बात कर रही थी.  
“और तुम्हारा लेखक, कैसे कोई ऐसी औरत गढ़ सकता था जो स्वतंत्र हो, जो कमाए, जो अपने पति के सामने मुंह खोलने का साहस करे। अरे वह न तो वह खुद ही ऐसा करता और न ही उसे कोई यह करने देता, तुम्हें पता उसे शायद ज़िंदा ही जला दिया जाता। चूंकि उसे अपनी जान से प्रेम था और तुमसे भी, तभी तो तुममे इतनी खूबियाँ डाली, कि आज तक तुमसे प्रेम है और तुम्हारे कारण तुम्हारे लेखक से हम प्रेम करते हैं। पर है तो वह सामंतवादी और पुरुष ही न!, तुमसे गलबहियां तो नहीं कर सकता न!, तुम्हें त्याग के रूप में ही अमर बना सकता था, पर स्वतंत्र नायिका के रूप में नहीं। समझो”

वह भी आंसू पोंछती हुई बोली “हां, ये सच है तब मैं शिकार हुई शक की, जांघ के वर्चस्व के संघर्ष की, पर अब जानती हूँ अब अगर गढ़ी जाऊंगी, तो तुम्हारे ही जैसी किसी भी स्त्री के हाथों, जो इस वर्चस्व में मेरा भी योगदान बताएगी। मैं अब शक के कारण मारी न जाऊं, इस बात का ख्याल रखना, अच्छा चलूँ, सुबह होने को है”

सुबह की पहली निशानी यानि आसमान पर हल्की गुलाबी रंगत छाने लगी थी, और डेस्डीमोना  किताब में पन्नों में समा गई, मैंने उससे कहा “वादा करती हूँ, अब कोई डेस्डीमोना  किसी भी कहानी में शक की बिनाह पर मारी न जाएगी, अब डेस्डीमोना  की आँखों पर काले घेरे न होंगे और अब डेस्डीमोना  के साथ वैश्या के शब्द न होंगे, क्योंकि अब डेस्डीमोना  का सृजन शायद किसी और नजरिए से होगा, अब स्त्री शायद डेस्डीमोना  को गढ़ेगी, अब डेस्डीमोना  कहानियों में चरित्र की बलि न चढ़ेगी, विदा डेस्डीमोना”
सामने के घर में हलचल होने लगी थी, और सूजी आँखों के साथ एक नई डेस्डीमोना  शायद जन्म लेने लगी थी, वह क्या करेगी? ये पता नहीं...............................

शायद जीना तो डेस्डीमोना को खुद ही है, हाँ, कहानियों में उसे जिंदा रखने का जिम्मा मेरा है, पर खुद का जीवन जीना, ये तो हर डेस्डीमोना  पर ही निर्भर है। हाँ विदा डेस्डीमोना, फिर मिलना कहीं किसी मोड़ पर,

विदा डेस्डीमोना, तुम आकर समय समय पर मुझे और सबको बताती रहना कि स्त्री चरित्र को सामंतवादी रचेगा तो क्या करेगा और अगर मैं कभी रच पाई? पता  नहीं ये भविष्य के गर्भ में, अभी के लिए जाओ, बहुत तुम अकेली हो, तुम्हारे दर्द में तुम्हारे साथ मैं भी नहीं........................


सोनाली मिश्रा 



नया साल

फिर से वह वहीं पर सट आई थी, जहाँ पर उसे सटना नहीं था। फिर से उसने उसी को अपना तकिया बना लिया था, जिसे वह कुछ ही पल पहले दूर फेंक आई थी। उसने...