सोमवार, 27 मार्च 2017

यह प्रेम वह प्रेम



चौदह फरवरी का खुमार एक दिन बाद भी हवाओं में था, फिजाओं में था। आज भी चौदह फरवरी की तरह मॉल में भीड़भाड़ थी। दिल्ली से सटे वैशाली और वसुंधरा के मॉल आज भी उसी तरह गुलाबी और लाल फूलों और गुब्बारों से भरे थे। हाथों में हाथ लिए न जाने कितने युवा दिल आज भी अपनी भावनाओं का इज़हार करने के लिए मॉल में टिके हुए थे। तो कुछ लोग अभी भी हां और न की ऊहापोह में थे। इन सब चमक और दमक से परे माला ऑटो का इंतज़ार कर रही थी। घर में उसका बेटा उसका इंतजार कर रहा होगा! सुबह से शाम तक ऑफिस और घर के बीच में उसका बेटा पिसा जा रहा था। आलोक तो हमेशा ही रात को दस बजे से पहले नहीं पहुँचता था। उसके लिए तो प्यार केवल आधे घंटे की घटना होती थी। माला के लिए प्यार शायद अभी कहीं दबा हुआ था। माला इस समय ऑटो का इंतजार कर रही थी, मगर इस मॉल के आगे या तो भरे हुए औटो आ रहे थे या फिर बड़ी बड़ी कारें।
“उफ, रोज़ का ही यह काम है!” माला ने अपने मन में मिस्मिसाते हुए कहा!
“का हुआ मैडम जी, टम्पू न मिला?” पीछे से ऑटो वाले ने उसे ऊपर से नीचे तक देखते हुए पूछा
वैसे तो माला इन नज़रों से रोज़ ही दो चार होती थी, मगर आज उसे बुरी तरह गुस्सा आ गया! वह पॉइंट नॉएडा और मोहननगर के बीच का पॉइंट था। यहाँ पर रोज़ ही इतनी ही भीड़ होती थी, और ये टैम्पू वाले, ये तो सवारियों को इंसान समझते ही नहीं हैं। उनके लिए तो बस दस रूपए की सवारी ही होती थी। माला इन शेयर्ड टैम्पू में बैठने से बचती थी, वह नहीं बैठती थी, शेयर्ड ऑटो का इंतजार करती थी। माला के शरीर को ऊपर से नीचे तक अन्दर तक चीर देने वाली नज़र से एक बाद फिर से उसने पीछे की सीट पर इशारा किया “मैडम जी, बैठ जाओ, ऑटो न मिलेगा आज! जब जो मिले उसी से काम चलाओ!”
माला का मन हुआ कि उसे दो थप्पड़ लगा दे, आखिर हद होती है, मगर उसे इन लोगों के रैकेट का भी पता था। ये सब देखने में जरूर गरीब लगें, मगर सम्बन्धों में अमीर होते हैं। उसे याद है एक दिन एक लड़की ने एक टैम्पू वाले को थप्पड़ मार दिया था, तो सभी बाकी टैम्पू वाले अपने साथी की तरफ ही मुड़ गए थे। उस दिन का बवाल देखने के बाद, माला बहुत डर गयी थी, और उसे यह भी पता था कि आलोक तो उसे बचाने नहीं आएगा!
जैसे जैसे समय बढ़ रहा था, माला की चिंता बढ़ती जा रही थी। बेटा अब बेचैन होने लगा होगा!  माला को इस बेचैनी में आईलवयू कहता आलोक याद आता था।
लव, माला को हंसी आई! कितना भ्रामक शब्द है! ऑटो की आवाज़ से वह चौंक कर वर्तमान में आई! अब माला की आँखें मॉल के प्रवेश द्वार पर अटकने लगी थीं। कई लड़कियों ने छोटी ड्रेस भी पहन रखी थी और उनके कमर में हाथ डाले उनके बॉयफ्रेंड बिना किसी डर या संकोच के इधर से उधर सफर कर रहे थे। कुछ जोड़े मॉल में ही चुम्बन लीला में लीन थे।
“देख लो, ये हाल है आज की लड़कियों के? न जाने कैसे ये किसी का घर बसाएंगी?” माला के बगल में खड़ी हुई औरत ने मॉल के अंदर जाती हुई लड़कियों को देखकर कहा
“रहने दीजिए न, और जो घर की परवाह करती हैं, उन्हें क्या मिलता है?” माला ने उस महिला के अनर्गल हस्तक्षेप का जबाव देते हुए कहा। माला ने कंधे उचकाते हुए अपने आधे घंटे के प्रेम को याद करके कहा।
“जीने दीजिए न उन्हें अपनी ज़िन्दगी, आप और हम कौन होते हैं!” माला ने मोबाइल पर समय देखते हुए कहा। अब तो बात उसकी बर्दाश्त से बाहर हो रही थी, उसने सोचा कि थोडा आगे जाकर ही किसी ऑटो का इंतज़ार करे या फिर टैम्पू में ही चली जाए!
उस मोड़ पर इधर उधर कहीं से भी कोई गाडी आ जाती है। वह मोड़ बहुत ही खतरनाक और तीखा है, न जाने कितनी बार वह भी गिरते गिरते बची है। और आज तो भीड़ भी थी, वह बहुत सम्हलते हुए आगे बढ़ी। तभी सामने से नॉएडा की तरफ जाने वाले टैम्पू ने उस सड़क पर जिस तरह से एंट्री की, “सेक्टर बांसठ, तिरेसठ वाले, दस रुपया सवारी”, उससे न केवल माला चौंकी, बल्कि सामने से आ रहा एक प्रेमी युगल भी चौंक गया और लड़की नीचे गिर गयी! उसके हाथों में जो गिफ्ट आदि थे, वे वहीं सड़क पर फैल गए! लड़का इतने वाहनों की भीडभाड से घबराकर पीछे बैठ गया जबकि लड़की को न केवल चोट आई थी, बल्कि उसकी छोटी ड्रेस फटकर और भी छोटी हो गयी थी। वह घबराकर अपने मित्र को देख रही थी, मगर उसे हर तरफ केवल वाहनों की आवाज़ ही दिख रही थी। उसे अपना वह मित्र कहीं नहीं दिखा, जिसका हाथ पकड़ कर शायद उसने कुछ लम्हों को जिया होगा!
“देखा!” माला को कोहनी से टोकते हुए उसी महिला ने कहा
“ये होता ही आज का प्यार! चला गया न! चलिए, हम लोग आगे चलते हैं, यहाँ तो भीड़ बढ़ेगी अब!” उस महिला ने कहा। माला अब थक चुकी थी। आलोक का घर देर से आने का मेसेज उसके मेसेजबॉक्स में झाँक रहा था। माला ने चाहा कि वह उस लड़की को एक थप्पड़ मारकर कहे कि प्यार व्यार कुछ नहीं होता!
जैसे ही वे लोग दस कदम आगे बढे, एकदम से किसी गाड़ी में ब्रेक लगने की आवाज़ के साथ एक  मानव स्वर भी सुनाई दिया “मार डाला!” माला ने नज़र उठाई! “उफ, ये आज क्या हो रहा है!” उसने झुंझलाते हुए अपने मन से कहा।
माला की आँखों के सामने एक टूटा रिक्शा और उसका घायल रिक्शेवाला पड़ा था। उसके पैरों में चोट थी, रिक्शा टूट गया था और सामने सफेद स्कोर्पियो से एक जोड़ा उतर रहा था। नॉएडा से सटे हुए वैशाली और वसुंधरा इलाके में आईटी बूम के बाद नवधनाढ्यों की संख्या बहुत ही बढ़ गयी है। माला को हालाँकि बहुत ही देर हो रही थी, मगर फिर भी रिक्शेवाले के पैरों से बहते हुए खून और उसके टूटे हुए रिक्शे को देखकर वह आगे कदम बढ़ा न सकी!
“अबे साले, तुझे मरने के लिए मेरी ही गाड़ी मिली, ये गाडी में जो खरोंच आई है, उसका खर्चा तेरा बाप देगा क्या?” गाडी से उतरते ही उस लड़के ने रिक्शेवाले से कहा
“मालिक, माफी, बहुत भीर हथी, जगह ही नहीं थी, फिर भी मालिक माफी दय दयो!” वह अपने दर्द को जज़्ब करते हुए माफी मांग रहा था।
माला को बहुत गुस्सा आया। उसने तुरंत ही सौ नंबर को फोन लगाया और सारी शिकायत करने के बाद मैदान में कूद पड़ी! “मैडम, ये आपके मतलब का नहीं है, जाइए आप यहाँ से?” एक दो ऑटो वालों ने उसे पीछे करते हुए कहा
“क्यों, मेरे बस का नहीं है! मैंने पुलिस को फोन कर दिया है और जैसे ही पुलिस आएगी, जनाब की सारी हेकड़ी निकल जाएगी!”  माला ने उसे गुस्से से देखते हुए कहा
“अरे, काहे मैडम जी! बाउजी की कौन्हू गलती नहीं है! वो तो हमाओ जी बलंस बिगर गाओ” रिक्शेवाले ने माला से हाथ जोड़ते हुए कहा।।
माला उसका दर्द महसूस कर पा रही थी, मगर चूंकि कोई बड़ा आदमी नहीं गिरा था, तो अस्पताल पहुंचाने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था। उस गाडी वाले से माला ने कहा “उसका रिक्शा टूटा है, आप उसे पैसा दीजिए”
“पैसा और मैं, मैं अठन्नी नहीं दूंगा उसे!” स्कोर्पियो वाले ने माला की मांग ठुकराते हुए कहा
धीरे धीरे भीड़ बढ़ने लगी थी और उस गाड़ी वाले पर उस रिक्शेवाले को दवाई के पैसे और रिक्शे की मरम्मत के पैसे का दबाव बढ़ने लगा था। पुलिस के आते ही बाकी तो सब तितर बितर हो गए मगर माला ने न डरते हुए पुलिस को सारी बात बता दी!
“माई बाप, माई बाप, जाए छोड़ द्यो,” पीछे से एक महिला स्वर आया
माला ने एकदम से मुड़कर देखा, सांवले रंग की मझोले कद की सीधे पल्ले की साड़ी पहने करीब बत्तीस बरस की एक औरत उसके पीछे खडी थी। उसके माथे पर लाल रंग की बड़ी गोल बिंदी थी और मांग में सिन्दूर भरा हुआ था। लाल चूड़ी और सस्ती पायलें भी उसकी ख़ूबसूरती को बढ़ा रही थीं।
“तुम कौन?” पुलिस वाले ने पूछा
“हम, जे रमैया के महरारू। साहब, हमें कुछो न चाहिए! रमैया ठीक ठाक है, और का  चाहिए! जैसें ही सुनी, वैसे ही जे घोल बनाय के लाए, अब जे घोल लगाय दियें जा पे, एक ठो टिटनेस का इंजेक्शन होय जाइये, बस जे ठीक! जाने चोट दई है, बाके पैसन से इलाज न कराइए, जाके बदले में हम दोय घर को काम और पकड़ लियें!, साहब, हमाए बच्चन को बाप है जे, हमाओ सुहाग, हमाओ पियार, बाके खून को सौदा नहीं”
और उसने अपने साथ आए बच्चों के साथ मिलकर उसका रिक्शा उठाया और धीरे से उसे दूसरे रिक्शे पर बैठाया। माला के पास आकर उसने हाथ जोड़े “मैडम जी, आपने बात तो सही कही, मगर आप खुद ही बताओ, जाने तुम्हारे पियार को चोट दई होय, बाके घर को पानी पिय ल्यो तुम? न हम तो न? हम खुद ज्यादा मेहनत करके जाकी चोट सही कर लियें! नमस्ते मैडम!”
उस औरत के जाते ही माला एक सोच में पड़ गयी? यह औरत, अनपढ़ औरत, गंवार औरत, जमाने के लिए घर में काम करने वाली औरत, मगर प्रेम की परिभाषा रचने वाली औरत! माला को अब इन मॉल की चमक दमक में बसा हुआ प्यार बहुत ही फीका लगने लगा था

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

रानी का कमाल



रिया की आँखों से आंसू बह रहे थे थोड़ी देर पहले ही उसे लग रहा था कि वह इस जंगल से बाहर नहीं निकल पाएगी, मगर जंगल में रानी को देखकर वह चौंक गयी थी और रानी के पीछे पीछे वह जंगल से बाहर निकल आई थे। उसने रानी से कुछ कहना चाहा तो रानी ने कहा “अभी समय नहीं है, दीदी और मैं अकेली थोड़े ही न आई हूँ, मैं तो मोती के साथ आई हूँ, मोती यहाँ तक लाया है!” रिया आँखों में आंसू भरे मोती और रानी को देख रही थी। जंगल में काँटों से फंसकर उसके कपडे भी फट गए थे और उसे ठण्ड भी लग रही थी, वह चल भी नहीं पा रही थी। रानी ने उसे सहारा दिया, वह धीरे धीरे रानी के साथ मोती के पीछे पीछे चल रही थी। रिया को सब कुछ याद आ रहा था।
वह अपने मम्मी पापा के साथ दिल्ली से आई थी। दिल्ली में कितनी सुविधाएँ हैं, कितने बड़े बड़े पार्क थे, कितने बड़े बड़े मॉल! और उसके पास कितने सारे गैजेट हैं! उसके पास खुद का एक लैपटॉप है। मगर पापा की पोस्टिंग इस छोटे कसबे में होने से उसे भी कुछ दिनों के लिए यहाँ आना पड़ा था। रिया को याद आ रहा है कि कैसे उसने यहाँ की हालत देखकर मम्मी पापा के सामने आंधी तूफान मचा दिया था, पापा को दिल्ली के मुकाबले में इस शहर में बहुत बड़ा घर मिला था, मगर रिया तो कुछ सुनने के लिए ही तैयार नहीं थी।
“मम्मी, पापा आप लोगों को यहाँ रहना है रहिये, मैं नहीं रहूँगी!” पंद्रह साल की रिया को जरा भी यह समझ में नहीं आ रहा था कि वह कितनी बड़ी जिद्द कर रही है। रिया का कहना था कि वह शुरू से ही बड़े शहरों में रही है, वह कैसे छोटे शहर में रह सकती थी। पापा की जिद्द थी कि वे बड़ी होती रिया को अकेली दिल्ली में नहीं छोड़ेंगे! वैसे भी रिया की इस साल दसवीं की बोर्ड की परीक्षा थी और उसके बाद पापा का स्पष्ट कहना था कि रिया उनके साथ ही रहेगी और रिया के लिए उन्होने वहां का सबसे अच्छा स्कूल भी खोज लिया था। अब रिया का विरोध करना बेकार था।
जंगल में चलते चलते रिया बार बार रानी का हाथ पकड़ रही थी। वैसे भी रिया का हाथ रानी ने बहुत मजबूती से पकड़ रखा था, और वह उसे भरोसा दिला रही थी कि वह उसे कुछ नहीं होने देगी। रिया ने उसकाहाथ बहुत मजबूती से पकड़ रखा था और उसे याद आ रहा था वह दिन जब वह पहले दिन अपने स्कूल गयी थी। दसवीं में उसके बहुत ही अच्छे ग्रेड आए थे तो पापा की पोस्ट और अपने ग्रेड के साथ उसे स्कूल में तुरंत ही एडमिशन मिल गया था। रिया को अपना दिल्ली वाला स्कूल याद आ रहा था, वहां की सहेलियां, दोस्त और वहां की कैंटीन, जहाँ पर खूब बढ़िया बढ़िया खाने को मिलता था, दिल्ली के मॉल की चमक, वहां की रंगीनियाँ! सब कुछ! और अब इधर! वह क्या करे? रिया के मन में चिडचिडापन बहुत बढ़ गया था। उसे न तो पापा का प्यार दिख पा रहा था और न ही और कुछ! इधर वह कुछ दिनों से देख रही थी कि जैसे ही वह अपना लैपटॉप खोलकर बैठती थी, एक छोटी लड़की रानी उसके पास आकर खड़ी हो जाती थी। उससे दो तीन बरस तो छोटी रही ही होगी और उसके साथ आ जाता था मोती।
पता चला वह वहां की आया की बेटी थी, किसी सरकारी स्कूल में पढने जाती थी और दोपहर का खाना खाकर वापस आ जाती थी। उसके साथ ही उसका कुत्ता  मोती आ जाता था। रिया लंच के समय में अपना लैपटॉप लेकर कोने में आ जाती थी और वहीं वह स्टडी मैटेरियल खोजने लगती। कुछ प्रोजेक्ट्स के लिए स्कूल में कक्षा 11 और 12 के बच्चों को लैपटॉप लाने की अनुमति थी।
रिया को रानी की मासूम और कुछ खोजती आँखें पसंद तो आने लगी थीं, मगर जैसे वह उसके लैपटॉप की तरफ हाथ बढ़ाती, रिया उसे झिड़क देती। रिया को एक तो वैसे भी यह शहर पसंद नहीं था, यहाँ उसकी कोई सहेली नहीं थी, और दूसरी तरफ ये रानी आ जाती थी उसे परेशान करने के लिए।
ऐसे ही एक दिन वह उसके घर भी पहुँच गयी थी।
“तुम?” रिया उसे देखकर चौंक गयी थी!
“हाँ दीदी!” रानी ने उसे नमस्ते करते हुए कहा
रिया को बहुत गुस्सा आया था, “तुम यहाँ क्या कर रही हो?”
“दीदी, मैं आपका कंप्यूटर देखने आई हूँ, उसमें आपने बहुत सारी तस्वीरें सेव की हैं न, वो देखनी हैं!” रानी ने उससे कहा
“वो क्या है न, मेरे मोती को भी देखना है!” रानी ने बहुत मासूमियत से कहा
पीछे से मोती ने भौंक कर उसका समर्थन किया
रिया का बस चलता तो उसे भगा देती, मगर उसने अपनी माँ को अच्छी बेटी होने का प्रोमिस किया था जिससे वह कक्षा 12 के बाद यहाँ से जा सके, तो उसने रानी को अन्दर बुला लिया और उसे अपने लैपटॉप पर खूब तस्वीरें दिखाईं। रानी की बड़ी बड़ी आँखें और बड़ी हो रही थीं, आश्चर्य से! उसने अपने साथ आए मोती से कहा “ले देख ले, कभी देखी थीं ऐसी तस्वीरें! रंग बिरंगी! जितने रंग तुमने होली में न देखे, उतने रंग दीदी ने हमें दिखा दिए! वैसे भी अब अगले ही महीने तो होली है!”
“लो रानी शरबत पी लो!” रिया ने उसे शरबत देते हुए कहा
“दीदी, आप होली खेलती हो?” रानी ने पूछा
“हाँ, दिल्ली में हम सब खूब होली खेलते थे, तुम्हें पता हम लैपटॉप पर भी रंगों के साथ खेल सकते हैं!” रिया ने उसे लैपटॉप दिखाते हुए कहा
“दीदी, वह कैसे?” रानी की आँखें फिर से चौड़ी हो गईं!
“रुको!” रिया ने लैपटॉप गोद में रखते हुए कहा
“देखो!” रिया ने पेंट तस्वीरों को पेंट में खोला और उसमें रंग भर कर दिखाए और उसके बाद उसने फोटो व्यूअर में में भी रानी को तस्वीरें दिखाईं!
“अच्छा दीदी, अब मैं चलूंगी, कल आऊँगी तो भी क्या आप दिखाओगी?” रानी ने उससे पूछा
रिया का मन हुआ उसे डपट कर भगा दे, मगर वह ऐसा कर न सकी। उसने मुस्करा कर कहा “ठीक है, तुम जब भी आना चाहो आ जाना”
रानी खुश होकर चली गयी और उसके पीछे पीछे उसका मोती भी!
तीन चार दिनों तक रानी रोज़ आई और रिया ने उसे पेंट, फोटो व्यूअर आदि पर खूब तस्वीरों में रंग भरना सिखाया! रिया के लिए ये बड़े ही मजेदार दिन थे और रानी के लिए, उसके लिए तो जैसे एक नई दुनिया ही थी। पढाई में कमजोर रानी केवल तीन चार बार में ही रंग भरना और हटाना सीख गयी थी।
रिया को होली का वह दिन याद है जब वह बाहर बैठी बैठी रानी के साथ मोबाइल पर खेल रही थी। पापा और मम्मी कोलोनी में गए थे और तभी कुछ लोग रंग लगाए हुए आ गए थे। रिया और रानी के मन में उन्हें देखकर डर की एक लहर दौड़ गयी और वे अन्दर की तरफ दौड़ीं! रानी के हाथ में रिया का मोबाइल था, रिया को उन लोगों ने पकड़ा और अपनी जीप की तरफ बढ़ने लगे! रानी भी उनकी तरफ दौड़ी मगर वे जीप में थे, रानी केवल उनकी फोटो ही खींच पाई! मोती लेकिन उनके पीछे पीछे गया। रिया को धीरेधीरे समझ में आ गया कि उसको किडनैप कर लिया है। उस शहर के बाहर निकलते ही छोटा सा जंगल था। रिया को रास्ता नहीं पता था और उसे ये भी नहीं पता था कि पापा उस तक कब तक पहुचेंगे।
इधर रानी ने जैसे तैसे रिया के मम्मी पापा को खोजा और उन्हें सारी बातें बताईं! रिया के पापा तुरंत ही पुलिस के पास जाना चाहते थे, मगर वे फोन आने का इंतज़ार कर रहे थे।
“अंकल मैंने उनकी फोटो ली है, पुलिस के पास जल्दी चलते हैं!” रानी ने रिया के पापा को फोन देते हुएकहा
“मगर बेटा ये तो सब रंगे हुए चेहरे हैं!” रिया के पापा ने फोटो देखते हुए कहा
“अंकल आप चिंता मत करिए, दीदी ने मुझे सिखाया है, फोटो से रंग हटाकर उसे सही करना!” रानी ने रिया के पापा से कहा “अंकल इन तस्वीरों को अगर आप लैपटॉप पर कर देंगे तो मैं जल्दी से इनका चेहरा आपके सामने ला दूंगी!”
छोटे शहर की नन्ही तेरह साल की बच्ची पर रिया के पापा को यकीन तो नहीं हुआ मगर फिर भी उन्होंने तस्वीरों को लैपटॉप पर ट्रांसफर कर दिया।
नन्हीं नन्हीं उंगलियाँ लैपटॉप पर तुरंत चलने लगीं, जैसे किसी पियानो पर किसी वादक की उंगली चल रही हों। पांच ही मिनट में नन्हीं रानी ने उन लोगों के चेहरे उनके सामने रख दिए।
“अंकल अब आप ये तस्वीरें फोन में ले लीजिए और पुलिस के पास चलते हैं!”
रिया के पापा इस नन्ही बच्ची का कमाल देखकर हैरान थे, इधर वे लोग पुलिस के पास गए और रानी के पास मोती आ गया। वह रानी की फ्रॉक खींचने लगा।
“अंकल आप लोग पुलिस स्टेशन जाइए, मोती उनके पीछे गया था वह शायद दीदी की खबर लाया हो!” रानी ने रिया के पापा से कहा
“बेटा, तुम अकेली कैसे?” रिया की मम्मी ने पूछा
“आंटी मैं अकेली कहाँ, ये मोती है न!” कहती हुई रानी मोती के साथ भाग गयी
रिया उन लोगों से बचकर जंगल में भटक गयी थी। उसके कपडे भी फट गए थे। मगर उसकी दौड़ने की आदत ने उसे उन लोगों की पहुचं से दूर ला दिया था। अब उसे सड़क चाहिए थी जहाँ से वह जा सके, मगर वह भटक गयी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था,तभी उसे रानी की आवाज़ सुनाई दी थी। उसकी जान में जान आई!।
“सम्हल कर दीदी! देखिये सड़क आ गयी और आपके मम्मी पापा भी” रानी ने उसे सम्हालते हुए कहा
रिया की सांस में सांस आई
“बेटा, तुम ठीक तो हो न!” रिया की मम्मी ने उसे गले लगाते हुए कहा
“मम्मी मैं तो ठीक हूँ, मगर आप लोग?” रिया ने मम्मी से चिपटते हुए कहा
“ये तुम्हारी रानी है न, इसने सब कुछ आसान कर दिया। इसने उन लोगों की फोटो खींचीं थी, और फिर उन्हें लैपटॉप पर सही किया, हम उन तस्वीरों को लेकर पुलिस स्टेशन पहुंचे। पुलिस वालों ने उन्हें तुरंत पहचान लिया और एक को पकड़ पर तुम्हारा पता चला कि तुम इधर की तरफ भागी थीं।” रिया की मम्मी ने रिया को और चिपटाते हुए कहा
“हाँ, मम्मी! ये रानी वाकई में ही रानी है!” रिया ने रानी को गले लगाते हुए कहा
“अब से रानी भी रिया के स्कूल में पढने जाएगी और इसकी सारी फीस मैं भरूँगा!” रिया के पापा ने रानी को गले लगाते हुए कहा
रानी और मोती आज पूरे शहर के नायक बन गए थे! और रिया को समझ आ गया था कि छोटे शहर में सब कुछ छोटा नहीं होता, बहुत कुछ अच्छा होता है। इस बार की होली, उसके लिए नए रंग लेकर आई थी।

सोनाली मिश्रा


गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

डेस्डीमोना मरती नहीं



उफ, आज फिर से नींद आने का नाम नहीं ले रही है। ये नींद भी कमबख्त हो चली है, न तो आती ही है और न जाती ही है। उनींदा सा हर क्षण रहता है। सामने वाले फ्लैट से फिर लड़ाई की आवाजें आ रही थी। मैं डेस्डीमोना   को पढ़ते पढ़ते घर से बाहर आ गयी थी। ये शेक्सपियर भी न, खुद तो चले गए और हमारे पास छोड़ गए हमारे जीवन में समाते हुए चरित्र। वाह, क्या क्या न कहते हैं, जियो शेक्सपियर जियो। डेस्डीमोना   मुझे आकर्षित करती है हमेशा। हर घर से एक डेस्डीमोना   झांकती है, वह ज़िंदा सी है, लगभग हर घर की खिड़की से झांकती है। अभी तो सामने वाले घर से ही आवाजें आ रही हैं। मेरा मन हो रहा है कि काश मेरे पास उड़ने वाली झाडू होती चुड़ैल वाली, तो मैं भी चली जाती उड़कर, उस घर में हैरी पॉटर में जैसे हम चुड़ैल देखते थे, पर वह झाडू मेरे पास नहीं है और मैं अभी अपने घर की बालकनी में खडी होकर डेस्डीमोना   को महसूस कर रही हूँ और बीच बीच में सामने वाले घर से आती हुई आवाजों को सुन रही हूँ, वह भी मुझे आकर्षित कर रही हैं, सोचती हूँ चली ही जाऊं। रात के बारह बज चुके हैं,  वैसे तो कॉलोनी का गार्ड  मुझे अब वापस भेजने के लिए आमदा है पर मैं नहीं जाना चाह रही, मैं अंगद के पैर की तरह एक ही तरह जैसे जड़ सी हो गयी हूँ, पर वह है कि मान नहीं रहा, उधर से आवाजें और तेज होती जा रही हैं “अरे, दुष्ट, एकदम वैश्या हो तुम, you are such a whore,” चटाक, चटाक उफ, लग रहा है, गृहयुद्ध हो रहा है, गृहयुद्ध कैसे? युद्ध में तो दो तरफा वार होते हैं, पर यहाँ पर तो शायद एक ही ओर से वार हो रहा है, जैसे डेस्डीमोना  झेलती थी, अपने पति के वार। ओथेलो भी तो इसी आदमी की तरह अपनी पत्नी को मारता था, तो वो क्या करती होगी? शेक्सपियर से परे अगर मैं चलूँ तो मैं बताऊँ, अगर इस औरत की तरह होती तो शायद वह अपना गाउन उठाकर अपने घुटनों के बल अपने पति के पैरों में बैठकर उससे क्षमा मांगती, जो शायद वह मांगती थी, वह उसे पापी, परपुरुष गामी कहता होगा और वह क्या रोकर ही केवल उसे अपनी तकदीर मान लेती होगी, पर ऐसा ही तो सीता ने भी किया था। हां संभवतया, राम ने स्वयं सीता के चरित्र पर शक नहीं किया था पर उन्होंने सीता को केवल चरित्र की ही परिभाषा के कारण जंगलों के हवाले कर दिया था। तो ऐसे में भला इस पुरुष की क्या बिसात? ये तो वही कर रहा है जो इसने देखा है। मैं भी न जाने अपने घर की बालकनी में खड़े खड़े रात को बारह बजे किन हवाओं में खो रही हूँ, एक हवा मुझे डेस्डीमोना  की ओर लेकर जा रही है तो दूसरी हवा मुझे हर उस स्त्री की ओर लेकर जा रही है जो शक का शिकार होती है। ये डेस्डीमोना, फिर से आ गयी कमबख्त, मुझे हंसी भी आ रही है, वह मेरी रूह में अन्दर तक समाई हुई है, वह मुझे कभी आकर अचंभित भी करती है, जैसे ही सामने वाले फ्लैट से किसी भी स्त्री के रोने की आवाज़ आती है वह मुझे उसी खिड़की पर आकर जैसे आवाज़ देती है, बोलती है “देखो, मैं आ गयी, इस बार मोटा गाउन नहीं पहने हूँ, इस बार मैं तुम्हारे यूपी और बिहार में जाकर देखो साड़ी पहनकर आ गयी हूँ, पर सुनो केवल चोला ही बदला है, मेरी पीड़ा अभी भी वहीं है और उसी तरह की है जब ओथेलो मुझे मेरे पिता के घर से लाते समय तो प्रेम से लाता है पर मुझ पर अधिकार के बाद वह मुझ पर छोटी छोटी बातों पर शक करता हुआ, मुझे ही मरने को सहर्ष तैयार हो जाता है”।
मैं एक पल को रुक जाती हूँ, अब मेरी हंसी गायब हो गयी है, अब डेस्डीमोना  छाने लगी है, जैसे भूत या आत्माएं किसी भी काया में प्रवेश करती हैं वैसे ही वह मुझमें प्रवेश कर रही है, मैं वह और वह मैं बनने सी लगी है, तभी मैं एकदम से किताब अपने हाथ से फ़ेंक देती हूँ, वह किताब में से झाँक कर कहती है, “तुम बच पाओगी” हा हा, अब वह हिंसक हो गयी है, खिड़की से आवाजें भी तेज हो रही हैं और डेस्डीमोना  का मेरे स्वामी, मुझे माफ करो कहना भी तेज होता जा रहा है। उफ, ये हिंसक हंसी! मैं दोनों ही तरफ से फांसी पा रही हूँ, अब मेरी आवाज़ घुट रही है, पर ये दोनों, ये दोनों तो जैसे जंगली बिल्ली की तरह लडती ही जा रही हैं, एक ओर वह खिड़की के अन्दर से माफ कर दो, अब बात नहीं करूंगी, अब मैं नहीं झाकूंगी, अब माफ करो”  बोलती जा रही है, और दूसरी ओर किताब के अन्दर से वह भी बोल रही है, और इतना बोल रही है कि मेरा मन हो रहा है किताब को उठाकर मैं उसे नाली में फ़ेंक दूं। ठीक है, शेक्सपियर जी, इतना खूबसूरत नाटक लिखे पर ऐसा भी नहीं कि वह पाठक का ही सर्वनाश कर दे। अब देखिये ये कैसे सर पर नाच रही है और अपन को भी नचाए हुए हैं। उधर गार्ड कह रहा है “मैडम, अभी कोई चोर घुस आएगा, आप प्लीज़ घर में जाएं” मुझे वह किताब के अन्दर से जीभ चिढा रही है, मैंने उससे कहा भी “नहीं, अब हिंसा कम हुई है” और इस बात पर वह अपना पेट पकड़ कर हंस रही है, मुझे बोलने का मौक़ा तो दे ही नहीं रही है, अब मेरे पति के खर्राटे भी दीवार तोड़कर बाहर आने लगे है। मुझे हंसी आई, और बहुत ही आश्चर्य हुआ कि अरे, देखो ये मर्द लोग कैसे सो लेते हैं, बेझिझक! एकदम बिना किसी परेशानी के। इन्हें मतलब नहीं होता कि घर के सामने कोई किसी को पीट रहा है, कोई मरे, जिए इन्हें मतलब ही नहीं। इन्हें मतलब नहीं होता कि घर के सामने कोई हिंसा का शिकार हो रहा है या फिर कोई प्रतिहिंसा का शिकार हो रहा है। उफ!
हां, तो किताब से फिर से झांकती है और मुझसे बात करती है मेरी डेस्डीमोना , अब मुझे वह बहुत ही टूटी हुई कातर सी दिखती है, जो मुझे आजकल लगभग हर ही स्त्री लगती है। कोई किसी भी तरह से टूटी है तो कोई किसी। पर हां, सब में एक बात कॉमन है कि उनके अस्तित्व को नज़रंदाज़ करने की हिंसा हो रही है। जैसे राम आदर्श पुरुष है, आदर्श बेटे हैं, आदर्श भाई हैं, आदर्श राजा हैं, पर पत्नी के अस्तित्व को नज़रन्दाज़ कर वे आदर्श पति न बन पाए। ऐसा क्यों होता है कि स्त्री का अस्तित्व दबाने की एक हिंसा होती है, जो हमारे सामने होते हुए भी हमें नज़र नहीं आती। कितना अजीब होता है कि एक पुरुष के लिए हर किसी का अस्तित्व महत्वपूर्ण होता है, हर किसी को वह महत्व देता है, पर वह केवल अपने जीवन से जुड़ी हुई सबसे महत्वपूर्ण स्त्री अर्थात पत्नी को ही महत्व नहीं देता, वह उसके अंगों पर अधिकार जमाना चाहता है, उसे चादर बनाकर ओढ़ना चाहता है, उसे बिस्तर की तरह बिछाता है पर न जाने क्यों एक नौकर की तरह उसके अस्तित्व को नकारता रहता है।  हां, तो शायद डेस्डीमोना  इसी हिंसा का शिकार हुई थी, या वह किसी छल का शिकार हुई थी, पर छल कोई भी हो, हारी तो एक पत्नी ही। वह जंघा की परिधि में होने वाले युद्ध में पराजित होने वाली प्रजाति हो जाती है, हां एक पत्नी के रूप में स्त्री शायद जंघा की परिधि वाले युद्ध हारती है तभी, तभी तो छली जाती है। नहीं नहीं वह जंघा की परिधि का युद्ध नहीं होता, शायद जंघा की परिधि पर वर्चस्व कायम करने वाला युद्ध होता है। वह निरंतर संघर्ष होता है। वह चरित्र का संघर्ष है, वह तथाकथित मर्यादा का चरित्र है। एक पत्नी के रूप में स्त्री निरंतर संघर्ष रत है, वह जूझती है, पर शायद इस स्थान के वर्चस्व के युद्ध को हार जाती है।
मेरे घर के सामने की खिड़की में वाकयुद्ध अब शांत होने लगा था, वह क्यों शांत हो रहा था, ये तो नहीं पता, पर अब घर की लाइटें बंद हो गयी थी, और जोर जोर से जो चीखें आ रही थी, शायद अब दबी सिस्कारियों में बदल गयी होंगी। अब शायद उस वर्चस्व का समय आ गया होगा जिसके कारण यह पूरा युद्ध हो रहा था। अब शायद वर्चस्व की चाह में उसकी देह को मसला जा रहा होगा या मसाला लगाकर मुक्त रूप से वह भोग लगा रहा होगा। हा हा, चलो सोचूँ, नींद तो आ नहीं रही, पर अब वह स्त्री सो जाएगी या अपने स्वामी को भोग लगाने के बाद जागकर मेरे साथ मेरी डेस्डीमोना  के साथ आएगी? शायद सो ही जाएगी, अपने मर्द को ओढ़ कर, ऐसी कायर औरतें अपने मर्द को ओढ़कर सोने में ही भरोसा करती हैं, वे जागती नहीं, वे सोती रहती हैं, नींद उनकी केवल तभी टूटती है जब उनके जीवन पर संकट आता है, जैसे डेस्डीमोना  की भी तन्द्रा तभी टूटी थी न जब उसे उसका पति मारने आया होगा, या उसे लगा होगा अब यह मेरे प्राण ले लेगा। ये रात के समय शोर मचाने वाली स्त्रियाँ ऐसे ही किसी समय जागती हैं, या तो जब उनके प्राण ही संकट में आते हैं या फिर तब जब उनपर कोई बाहर से लाकर बैठा दी जाती है, नहीं तो तब तक वे अपने पतियों को ही ओढ़कर सोने में दुनिया का सबसे बड़ा सुख मानती हैं।
अब मेरी भी आँखों में नींद आने लगी, डेस्डीमोना  ने कहा सोने जा रही हो, मैंने कहा “हां”। उसने कहा रुको थोड़ी देर और, जरा मेरे जैसी एक दो और गिनाओ।” अब बारी मेरे हँसने की थी, मैंने कहा “किस किस का किस्सा सुनाऊँ, सभी में तो तुम समाई हो” वह विजयी मुस्कान के साथ बोली “देखा मैंने कहा था न, युग कोई भी हो, बरस कोई भी हो, डेस्डीमोना  तो हर घर में होगी” मैंने उससे कहा “हां, पर अब डेस्डीमोना , को मारना इतना सरल नहीं रह गया है” “हैं वह कैसे, उसने कहा, अभी सामने वाले घर में तो तुमने देखा ही है, वर्चस्व का संघर्ष”, मैंने कहा “हां सही कह रही हो, पर अब उसे विद्रोह करना आ गया है, अब देखना, थोड़े दिन वह केवल उसकी यह मार खाएगी, उसे ओढ़ेगी और बिछाएगी, फिर उसकी ही आँखों के नीचे जो काले घेरों का स्थान है, वहां पर अपना एक कोना खोजकर उसमें अपनी जगह बनाएगी” वो बोली “चल झूठी, ऐसा भी होता है” मैंने कहा “हां, होता तो है, कहो तो एक उदाहरण दूं” वो बोली “दो न”। अब वह किताब से बाहर निकल कर जैसे मेरे बगल में पड़ी कुर्सी में आ गयी। और उसकी आँखों में एक उत्सुकता थी, वह जानना चाह रही थी कि इस युग की डेस्डीमोना  आखिर करती क्या हैं!
मैं उससे बात करती जा रही थी, जैसे कोई शराब पीकर अपनी ही रौ में बोलता रहता है वैसे ही। वह कुछ बढ़िया सुनना चाह रही थी और मैं भी उसे बढ़िया ही सुनाना चाह रही थी। उसने कहा “अब बोलो भी” मैंने कहा “सुन, शैम्पेन पीयेगी” वो बोली, तुम पियो” मैंने अन्दर जाकर एक ग्लास में अपने लिए शैम्पेन लिया और फिर उसके पास आई। मूढा उसकी कुर्सी के पास खींचा और कहा “देखो, हम लोगों ने रो रोकर आँखों के नीचे बहुत काले घेरे बना लिए हैं, जहाँ पर हमारे सपने मर गए थे” वो बोली “हां, और सपने ही क्यों मैं तो खुद ही मर गयी, मार डाला मुझे मेरे ही पति ने, जिसके कारण अपने पिता का घर छोड़कर आई, जिसके कारण मैंने पूरी दुनिया में अपने पिता को बदनाम किया और जिसके कारण मेरे पिता ने मुझसे सारे सम्बन्ध तोड़ लिए, उसी व्यक्ति ने मुझे मार डाला। उसने मेरे चरित्र पर लांछन लगाए, मुझे कुलटा, वैश्या, शरीर बेचने वाली, गैर ईसाई कहा। मैं तो ईसाई ही रही, मैंने क्या धर्म विरोधी काम किया”। उफ, सुनो, इस चरखी में ही हमें बांधा जाता है, कि तुम धार्मिक बनो, धर्म के अनुसार बनो।  पर हमारे धर्म में जो हमारे लिए कहा गया है, उसे हमारे सामने ही तोड़मरोड़ कर हमारी थाली में बचपन से परोसा जाता है और हमें उसे नाश्ते, खाने और रात के खाने में खूब मिला मिला कर पिलाया जाता है।  कि हम कहीं भाग न जाएँ, बिगड़ न जाएँ। सुनो, खूब मारपीट करने के बाद एक दिन तो ऐसा आया ही होगा जब तुम्हें भी लगा होगा कि तुम भाग जाओ, या खुद से बात करने का मन हुआ होगा? खैर तुम्हारा पता नहीं। हम स्त्रियों पर जब वर्चस्व की जंग तेज होने लगी और हमारी आँखों के नीचे काले घेरों का साम्राज्य बहुत ही बढ़ने लगा तो लगा कुछ तो ऐसा खोजा जाए जिससे न केवल यह वर्चस्व की जंग थमें बल्कि कुछ ऐसा भी हो जिससे हमारी आँखों को इस कालिमा से मुक्ति मिल सके। अरे पर ऐसा होगा क्या? हमें अपने हिस्से की ज़िन्दगी तो जीनी ही थी। सुनो, हमने सोचा कुछ करने का!
मैं रुक गयी, मैंने सोचा इसे बताऊँ क्या!, उसने मेरी बांह झकझोरी, “नशा हो रहा है क्या” मैंने कहा “न री, सोच रही हूँ कहाँ से शुरू करूँ!, हां तो जब हमारी आँखों के नीचे घेरे बहुत ही काले होते गए तो सोचा उन्हें सुनहरा किया जाए, तो हमने अपने हुनर को निखारना शुरू कर दिया। हमने स्लो डेथ मरने से मना कर दिया। हम बहुत युगों तक इस स्लो डेथ का शिकार हुए हैं, अब हमने इस हिंसा का प्रतिकार करने का मन बनाया। हमने उस संवाद हीनता को काट दिया, जो हमें अलग करता था दुनिया से, हमने अब संवाद करने का मन बनाया। हमने आँखों के नीचे के काले घेरों से ही संवाद शुरू किया, हमने पहले उन्हें विदा किया, फिर वर्चस्व की लड़ाई से स्त्री को जीतना सिखाया। स्त्री को जांघ की परिधि वाले वर्चस्व में स्वामिनी बनने के लिए कहा। हाँ ठीक है, अभी नहीं हो पाया है यह, पर शीघ्र ही यह होगा ऐसा मुझे लगता है। पर उसके लिए हमें, जरूरत थी, जरूरत थी भरी जेब की, भरी जेब से हम अपने इन कालेघेरों को सुनहरा कर सकती थी, ये हमने अहसास किया। तो हमने अपने हुनर को तराशना शुरू कर दिया।  सुनो, हमने घेरों के अन्दर ही जीना शुरू कर दिया, पर हां जो हम पर वर्चस्व करते थे उन्हें इस बात की भनक भी न लगने दी, कि आखिर ये काले घेरे सुनहरे कैसे होने लगे। वे हम पर वर्चस्व की एक लिप्सा में खुद से ही संघर्ष करते रहे और हम कुंदन बनकर और भी निखरते रहे। ठीक है, अभी कुछ स्त्रियाँ बिछा रही हैं, और ओढ़ भी रही हैं, उन्हीं के जिस्म को, जो उनपर वर्चस्व स्थापित किए थे, पर समय के साथ जैसे जैसे वे अपने हुनर को और प्रतिभा को पहचानेंगी वैसे ही वे अपना कोना कहीं और थोड़ी देर के लिए बना लेंगी, और तुम देखती रहना, यह दिन भी बहुत जल्द आएगा।”
तभी मेरी नज़र मेरे बगल की खाली कुर्सी पर गयी, “अरे डेस्डीमोना  कहाँ गयी”
वह कहीं कोने में रो रही थी, मैंने उसे छुआ तो बोली “अरे, ये  कोना तब नहीं बन सकता था, जब मैं अपने जीने के लिए संघर्ष कर रही थी, जब ओथेलो अपनी ही प्रिया पर रोज ही शक कर रहा था, जब पतिव्रता होते हुए भी मैं खुद के चरित्र पर लांछन खा रही थी, जब केवल एक रूमाल के कारण मेरे कोरी चुनरी पर दाग लग रहे थे। ओह, ये कोना तब क्यों किसी ने न बनाया?, तुम्हें पता, अगर कोई कोना तब बन गया होता तो शायद मैं भी बार बार अपने स्त्रीत्व को कसौटी पर परखने के लिए मजबूर न होती, शायद डेस्डीमोना  की किस्मत कुछ और ही होती”
मैंने उसके आंसू पोंछे, गले लगाया और कहा “सुनो, तुम एक बात भूल जाती हो, कि तुम्हें गढ़ा किसने था, और कब गढ़ा था, तुम्हें गढ़ा गया था घोर सामंतवादी युग में, जहां स्त्रियों का पुरुष की मर्जी के बिना सांस लेना भी गुनाह माना जाता था, और तुम अपने लेखक से उम्मीद करती हो तुम्हारे लिए कोई कोना खोजता। अरे वह न तो वह खुद ही ऐसा करता और न ही उसे कोई यह करने देता, तुम्हें पता उसे शायद ज़िंदा ही जला दिया जाता। चूंकि उसे अपनी जान से प्रेम था और तुमसे भी, तभी तो तुममे इतनी खूबियाँ डाली, कि आज तक तुमसे प्रेम है और तुम्हारे कारण तुम्हारे लेखक से हम प्रेम करते हैं। पर है तो वह सामंतवादी और पुरुष ही न!, तुमसे गलबहियां तो नहीं कर सकता न!, तुम्हें त्याग के रूप में ही अमर बना सकता था, पर स्वतंत्र नायिका के रूप में नहीं। समझो”
वह भी आंसू पोंछती हुई बोली “हां, ये सच है तब मैं शिकार हुई शक की, जांघ के वर्चस्व के संघर्ष की, पर अब जानती हूँ अब अगर गढ़ी जाऊंगी, तो तुम्हारे ही जैसी किसी भी स्त्री के हाथों, जो इस वर्चस्व में मेरा भी योगदान बताएगी। मैं अब शक के कारण मारी न जाऊं, इस बात का ख्याल रखना, अच्छा चलूँ, सुबह होने को है”
सुबह की पहली निशानी यानि आसमान पर हल्की गुलाबी रंगत छाने लगी थी, और डेस्डीमोना  किताब में पन्नों में समा गई, मैंने उससे कहा “वादा करती हूँ, अब कोई डेस्डीमोना  किसी भी कहानी में शक की बिनाह पर मारी न जाएगी, अब डेस्डीमोना  की आँखों पर काले घेरे न होंगे और अब डेस्डीमोना  के साथ वैश्या के शब्द न होंगे, क्योंकि अब डेस्डीमोना  का सृजन शायद किसी और नजरिए से होगा, अब स्त्री शायद डेस्डीमोना  को गढ़ेगी, अब डेस्डीमोना  कहानियों में चरित्र की बलि न चढ़ेगी, विदा डेस्डीमोना”
सामने के घर में हलचल होने लगी थी, और सूजी आँखों के साथ एक नई डेस्डीमोना  शायद जन्म लेने लगी थी, वह क्या करेगी? ये पता नहीं.................................।शायद जीना तो डेस्डीमोना  को खुद ही है, हाँ, कहानियों में जीने का जिम्मा मेरा है, पर खुद का जीवन जीना, ये तो हर डेस्डीमोना  पर ही निर्भर है। हाँ विदा डेस्डीमोना, फिर मिलना कहीं किसी मोड़ पर,

नया साल

फिर से वह वहीं पर सट आई थी, जहाँ पर उसे सटना नहीं था। फिर से उसने उसी को अपना तकिया बना लिया था, जिसे वह कुछ ही पल पहले दूर फेंक आई थी। उसने...